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ग़ज़ल

रहमत
ग़ज़ल

रहमत

मधु टाक इंदौर मध्य प्रदेश ******************** दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई बन कर खुशबू परिजात सी बिखर गई तेरी उल्फतों की जो रहमत हो गई है बूझते चिराग़ों में जैसे रोशनाई भर गई मुस्कुरा कर जो पूछ लिया हाले दिल तूने खारी आँखों में मीठी मुस्कान संवर गई हिज्र में संभल ना पाया था दिल मेरा उम्र मेरी फिर अश्कों में ही गुजर गई रूह मेरी बेशकीमती दास्तान बन गई जब लफ्ज़ बन तेरी ग़ज़लों में उतर गई दीदार में तेरे इक उम्र यूँ गुज़ार दी मैने राह तकती अहिल्या पत्थर में ठहर गई अश्क़ों के समंदर में खुद ही फना हो गई जल में जैसे मछली प्यासी ही मर गई चाहत मेरी क्यूँ आज अधुरी सी रह गई बीच हमारे"मधु"एक दूरी सी पसर गई परिचय :-  मधु टाक निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी...
इबादत
ग़ज़ल

इबादत

मधु टाक इंदौर मध्य प्रदेश ******************** तेरी खुशियों के हम तलबगार हो गये मुफ़लिसी में भी देखो खरीदार हो गये गुजरे जो कहीं से भी तू मेरे हमनवा चाँद सितारे देख खुद शर्मसार हो गये हवाओ ने जो की शरारत आँचल से जमी पर ही जन्नत के दीदार हो गये इश़्क जो इबादत है तो बंदिश कैसी क्यूँ हर कोई इश्क़ के पहरेदार हो गये छुड़ाकर जो दामन नजर से हो गये दूर हम अपनी ही वफाओ से बेकार हो गये सियासत में खेली मोहरे भी अजीब है कौम की ख़ातिर मासूम गद्दार हो गये उनके दिल में प्यार की शमा जली नहीं हम हैं कि आरज़ू की हदो से पार हो गये दिल के जज्बातों को लफ्जो की चाह नही हम उनकी खामोशी मे ही गिरफ्तार हो गये तेरी मोहब्बत में शबनमी आग सी है "मधु" करीब जो भी आये खुद ही अंगार हो गये परिचय :-  मधु टाक निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं ...
सई मानौ
ग़ज़ल

सई मानौ

प्रेम प्रकाश चौबे "प्रेम" विदिशा म.प्र. ******************** सई मानौ भौतई तंगी है। बड़ी मुसीबत आन पड़ी है। दादा की बरसी करने है, दादी सोइ बीमार डरी है। मुन्ना बे-रुजगार फिरइ रये, मोड़ी भी हो गई बड़ी है। घरवारी भी परेसान है, गुस्से में कुछ भी बकती है। दुश्मन पै भी न गुजरै बा, जौन दसा, हम पै गुजरी है। "प्रेम" बड़े मुश्किल दिन देखे, ऐसी बिपदा नही सही है। . परिचय :-  प्रेम प्रकाश चौबे साहित्यिक उपनाम - "प्रेम" पिता का नाम - स्व. श्री बृज भूषण चौबे जन्म -  ४ अक्टूबर १९६४ जन्म स्थान - कुरवाई जिला विदिशा म.प्र. शिक्षा - एम.ए. (संस्कृत) बी.यु., भोपाल प्रकाशित पुस्तकें - १ - "पूछा बिटिया ने" आस्था प्रकाशन, भोपाल  २ - "ढाई आखर प्रेम के" रजनी  प्रकाशन, दिल्ली से अन्य प्रकाशन - अक्षर शिल्पी, झुनझुना, समग्र दृष्टि, बुंदेली बसन्त, अभिनव प्रयास, समाज कल्याण व मकरन्द आद...
दूर मुझसे न जा
ग़ज़ल

दूर मुझसे न जा

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** ग़ज़ल - २१२ २१२ २१२ २१२ अरकान- फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन दूर मुझसे न जा वरना मर जाऊँगा। धीरे-धीरे सही मैं सुधर जाऊँगा।। बाद मरने के भी मैं रहूंगा तेरा। चर्चा होगी यही जिस डगर जाऊँगा।। मेरा दिल आईना है न तोड़ो इसे। गर ये टूटा तो फिर मैं बिखर जाऊँगा।। नाम मेरा भी है पर बुरा ही सही। कुछ न कुछ तो कभी अच्छा कर जाऊँगा।। मेरी फितरत में है लड़ना सच के लिए। तू डराएगा तो क्या मैं डर जाऊँगा।। झूठी दुनिया में दिल देखो लगता नहीं। छोड़ अब ये महल अपने घर जाऊँगा।। मौत सच है यहाँ बाकी धोका निज़ाम। सच ही कहना है कह के गुज़र जाऊँगा।। . परिचय :- निज़ाम फतेहपुरी निवासी : मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने...
तकदीर
ग़ज़ल

तकदीर

मधु टाक इंदौर मध्य प्रदेश ******************** नज़रे इनायत हो तो तकदीर संवर जायेगी आँखों के आईने में ये सूरत निखर जायेगी इक दफा जो दूर से तू पुकार ले मुझको जिस्म से फना होती रूह भी ठहर जायेगी इस तरह से न देख शोख नजरों से मुझको मेरी सांसो की चलती रफ्तार सुधर जायेगी कभी तो पेश आ गुलों की तरह मेरे हमनवा संग तेरे खारों की चुभन भी ईश्क़ कर जायेगी जब भी रिश्तों का ताना बाना खुल जायेगा घर के आँगन में फिर उदासी भर जायेगी इन्तजार में तेरे खुद को काँधे पे लिये बैठी हूँ इश्क के इस अंजाम से मौत भी डर जायेगी दिल पर लगी हुई चोट भी यकीनन गहरी है तसव्वुर से तेरे "मधु" लम्हा लम्हा भर जायेगी . परिचय :-  मधु टाक निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानिया...
जिंदगी की जद्दोजहद
ग़ज़ल

जिंदगी की जद्दोजहद

मनीषा व्यास इंदौर म.प्र. ******************** अभी तो जिंदगी की सुबह हुई ही है। फिर क्यों मै बहुत दूर नजर आया। अभी तो मुश्किलों से पीछा छूटा ही था। फिर सामने कोरोना नजर आया। वतन से मुहब्बत की थी या पलायन का अफसोस। मुझे हर मजदूर घर लौटता नज़र आया। दुनिया इमारतों की तरफ देखती रही। मुझे उसके पांव का छाला नज़र आया। जिदंगी डर है, मायूसी है, संघर्ष है, वीरानी है। पहली बार हर इंसान बेबस नज़र आया। माफ़ कर सकता है तो कर दे मुझ। मै खुदगर्ज हूं ये अब नज़र आया। तू ना लौटा तो क्या होगा मेरा ? मै इस बोझ से दबता नज़र आया। मै तेरी सुरक्षा की हर कोशिश करूंगा। बहुत देर से सही पर अब नज़र आया। भारत को आत्मनिर्भर बनाना है। यही सोचकर वो शहर वापस आया।   परिचय :-  मनीषा व्यास (लेखिका संघ) शिक्षा :- एम. फ़िल. (हिन्दी), एम. ए. (हिंदी), विशारद (कंठ संगीत) रुचि :- कविता, लेख, लघुकथा लेखन, पंजाबी पत्रिका ...
इश्क़ की पाकीज़गी
ग़ज़ल

इश्क़ की पाकीज़गी

मधु टाक इंदौर मध्य प्रदेश ******************** बिछड़ कर वो मुझे अभी भूले नही होंगे खतों को भी मेरे यूँ हीं जलाये नहीं होंगे इश्क़ की पाकीज़गी को न समझा कोई हीर रांझा के फिर अब किस्से नहीं होंगे ताउम्र गुजार दी है सितारों को गिनकर रात भर वो मेरी तरह जागते नहीं होंगे तस्सवुर से तेरे मुक्कदर की चादर बुनी गर्दिश में मेरे कभी यूँ सितारे नहीं होंगे दुआ रब से तुझे अब मंजिल मिल जाये तेरे कदमों के तले कभी छाले नहीं होंगे मिटा दे दिलों में जो रंजिशे मजहब की फिर कोई भी जमाने में पराये नहीं होंगे भंवरों सा तेरा हर फूल पर मचलना कैसा मोहब्बत के कभी सलीके सीखे नहीं होंगे शक के दायरे में इश्क़ पनप नही सकता बोई है नागफनी गुल वहाँ महके नहीं होंगे मुस्कुराहट वो जादू है जो दिलों को है जोड़ती सूखे दरख़्तों पे तो परिन्दे भी टिकते नहीं होंगे नदिया के सीने पर जो लहरों की है खामोशी अपने ही हिस्से के ...
हकीकत-ए-जहाँ
ग़ज़ल

हकीकत-ए-जहाँ

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** शिकवा उन्हें हैं कि, अब सजते नही बाजार, अब दौरे-ए-उम्र में, वो कशिश कहा से लाये... आती थी महक जिस, दरगाह से अबतल्क, क्यु न चादर-ए-गुल पर, लोबान चढ़ा आये... वक्त ही सिखाता है, फ़लसफ़ा ज़िन्दगी का, भरा है हाथ लकीरों से, कभी काम ना आये... माना कि हूँ इंसा, ओर गलतियाँ फ़ितरत मेरी, कोई उस ख़ुदा को भी, जरा शीशा दिख आये... इतनी भी बेतकल्लुफ़ी, ठीक तो नही हैं "निर्मल", दाम-ए-क़फ़स हैं कम, वो तिजारत ना कर आये . परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कह...
जाने है ये सफ़र कैसा
ग़ज़ल, गीत

जाने है ये सफ़र कैसा

विवेक रंजन 'विवेक' रीवा (म.प्र.) ******************** सूनी माँग सी राहों जैसा जाने है ये सफ़र कैसा, हर बस्ती वीरान मिली, नहीं खुशी का शहर देखा। नींद कुचलकर सुबह हुई और शाम ने भी पहलू बदले, कितनों की ही मौत हुई शमशान मगर बेखबर देखा। जहाँ पर खींचते हैं लोग जब तब लक्ष्मण रेखा, उसी दुनिया में हमने ज़िन्दगी को दर बदर देखा। रहते थे जो शीशमहल में घर उन्होंने बदल लिया, जब जब झाँका सीने में वहाँ फ़क़त पत्थर देखा। 'विवेक' झील के दरपन में लिखी प्रेम की इबारतें, मन कस्तूरी महक उठा जब उनको भर नज़र देखा। . परिचय :- विवेक रंजन "विवेक" जन्म -१६ मई १९६३ जबलपुर शिक्षा- एम.एस-सी.रसायन शास्त्र लेखन - १९७९ से अनवरत.... दैनिक समय तथा दैनिक जागरण में रचनायें प्रकाशित होती रही हैं। अभी हाल ही में इनका पहला उपन्यास "गुलमोहर की छाँव" प्रकाशित हुआ है। सम्प्रति - सीमेंट क्वालिटी कंट्रोल कनसलटेंट के रूप में ...
राजा बेटा
ग़ज़ल

राजा बेटा

प्रेम प्रकाश चौबे "प्रेम" विदिशा म.प्र. ******************** राजा बेटा, खूब कमा रये। पइसा कुजने कितै बिला रये। "मिडिल क्लास" की है जा रीती, एक कमा रऔ, सब घर खा रये। प्राइवेट में, पढ़ रये बच्चे, रही कसर, सो कोचिंग जा रये। गाड़ी, "मोबाइल", पोसाकें, नये-नये खर्चा, रोज सता रये। "प्रेम" रोत हैं, भीतर-भीतर, हम जानत कैसें, मुस्का रये? कुजने कितै=पता क्या ? बिला रये=समा जाना . परिचय :-  प्रेम प्रकाश चौबे साहित्यिक उपनाम - "प्रेम" पिता का नाम - स्व. श्री बृज भूषण चौबे जन्म -  ४ अक्टूबर १९६४ जन्म स्थान - कुरवाई जिला विदिशा म.प्र. शिक्षा - एम.ए. (संस्कृत) बी.यु., भोपाल प्रकाशित पुस्तकें - १ - "पूछा बिटिया ने" आस्था प्रकाशन, भोपाल  २ - "ढाई आखर प्रेम के" रजनी  प्रकाशन, दिल्ली से अन्य प्रकाशन - अक्षर शिल्पी, झुनझुना, समग्र दृष्टि, बुंदेली बसन्त, अभिनव प्रयास, समा...
चिंतन
ग़ज़ल

चिंतन

धीरेन्द्र कुमार जोशी कोदरिया, महू जिला इंदौर म.प्र. ******************** अतीत के चिंतन को टाल। प्याज है छिलके मत निकाल। जवाब मिले ये जरूरी नहीं, छोड़ ना, रहने दे सवाल। पत्ता पत्ता बिखरी ये ज़िन्दगी, जितना हो सके इसे सम्हाल। कोशिश कर पूरी जान लड़ा, फिर देख कुदरत का कमाल। धरा - धूल मस्तक चढ़ बैठेगी, किसी की इज्ज़त यूं न उछाल। जब मंजिल निकट हो तेरी, बहक न जाएं, कदम सम्हाल। खुशबू फैले जो प्यार की, जिन्दगी कुमकुम अबीर गुलाल। . परिचय :- धीरेन्द्र कुमार जोशी जन्मतिथि ~ १५/०७/१९६२ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म.प्र.) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत शिक्षा ~ एम. एससी.एम. एड. कार्यक्षेत्र ~ व्याख्याता सामाजिक गतिविधि ~ मार्गदर्शन और प्रेरणा, सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वास के प्रति जन जागरण। वैज्ञानिक चेतना बढ़ाना। लेखन विधा ~ कविता, गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, दोहे...
मैं भी लिख दूँ नाम कोई
कविता, ग़ज़ल

मैं भी लिख दूँ नाम कोई

विवेक रंजन 'विवेक' रीवा (म.प्र.) ******************** दिल तो करता है दिल पर मैं भी लिख दूँ नाम कोई, वो नाम ही बन जाये चेहरा हो आँखों में पैग़ाम कोई। जीवन की आपाधापी में बस संघर्षों का प्यार मिला, मन का मधुवन महक उठे ऐसी भी आये शाम कोई। वाइज़ भी था मैखाने में,साकी ! कई लुढ़के जाम दिखे, मदभरे नयन जब छलकेंगे पियूँ उसी का जाम कोई। कोई मसल गया मासूम कली मैंने उसको बेदर्द कहा, नज़र लग गयी है फूलों की अब कर ना दे बदनाम कोई। बिखरी ज़ुल्फ छनकती पायल पर विवेक क्यों तुम घायल, तुमने ही नहीं बनना चाहा था मजनूँ या गुलफ़ाम कोई। जिस रौशन मकसद की खातिर अँधियारी तुम राह चले, तुम चलो फ़क़त चलते ही रहो चाहे करता हो आराम कोई। . परिचय :- विवेक रंजन "विवेक" जन्म -१६ मई १९६३ जबलपुर शिक्षा- एम.एस-सी.रसायन शास्त्र लेखन - १९७९ से अनवरत.... दैनिक समय तथा दैनिक जागरण में रचनायें प्रकाशित होती रही हैं। अभी ह...
मत रोने की आदत रखिये
ग़ज़ल

मत रोने की आदत रखिये

प्रेम प्रकाश चौबे "प्रेम" विदिशा म.प्र. ******************** मत रोने की आदत रखिये। जीवन की कुछ, कीमत रखिये। हो सकता है, हाथ तंग हो ? दिल में मगर, मुहब्बत रखिये। उठी जीभ और चली लट्ठ सी, थोड़ी बहुत, शराफत  रखिये। बाद मौत के, ज़न्नत कैसी ? दुनिया को ही, ज़न्नत रखिये। "प्रेम" से पूछा, कब आओगे? बोले, जिस दिन दावत रखिये। . परिचय :-  प्रेम प्रकाश चौबे साहित्यिक उपनाम - "प्रेम" पिता का नाम - स्व. श्री बृज भूषण चौबे जन्म -  ४ अक्टूबर १९६४ जन्म स्थान - कुरवाई जिला विदिशा म.प्र. शिक्षा - एम.ए. (संस्कृत) बी.यु., भोपाल प्रकाशित पुस्तकें - १ - "पूछा बिटिया ने" आस्था प्रकाशन, भोपाल  २ - "ढाई आखर प्रेम के" रजनी  प्रकाशन, दिल्ली से अन्य प्रकाशन - अक्षर शिल्पी, झुनझुना, समग्र दृष्टि, बुंदेली बसन्त, अभिनव प्रयास, समाज कल्याण व मकरन्द आदि अनेक  पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक पत्र...
मेरी आरज़ू
ग़ज़ल

मेरी आरज़ू

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** ११२१२ ११२१२ ११२१२ ११२१२ अरकान- मु-त-फ़ा-इ-लुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन   मेरी आरज़ू रही आरज़ू युँ ही उम्र सारी गुज़र गई। मैं कहाँ-कहाँ न गया दुआ मेरी बे-असर ही मगर गई।। की तमाम कोशिशें उम्र भर न बदल सका मैं नसीब को। गया मैं जिधर मेरे साथ ही मेरी बेबसी भी उधर गई।। चली गुलसिताँ में जो आँधियाँ तो कली-कली के नसीब थे। कोई गिर गई वहीं ख़ाक पर कोई मुस्कुरा के सँवर गई।। वो नज़र जरा सी जो ख़म हुई मैंने समझा नज़र-ए-करम हुई। मुझे क्या पता ये अदा थी उनकी जो दिल के पार उतर गई।। मेरे दर्द-ए-दिल की दवा नहीं मेरा ला-इलाज ये मर्ज है। मुझे देखकर मेरी मौत भी मेरे पास आने में डर गई।। ये तो अपना अपना नसीब है कोई दूर कोई करीब है। न मैं दूर हूँ न करीब हूँ युँ ही उम्र मेरी गुज़र गई।। ये खुशी निज़ाम कहाँ से कम कि हैं साथ अपने ...
बहाना था
ग़ज़ल

बहाना था

कृष्ण कुमार सैनी "राज" दौसा, राजस्थान ******************** तिरे लब पर हमेशा ही कोई रहता बहाना था तुझे भी है मुहब्बत यह मुझे यूँ आज़माना था मुझे तुम मिल गये मानो सभी कुछ मिल गया मुझको तुम्हारा प्यार ही मेरे लिये जैसे खज़ाना था हमेशा की तरह बारिश में मिलने रोज़ आता था मुहब्बत का यक़ीं हर रोज़ यूँ तुमको दिलाना था जले हों लाख दिल सबके मुहब्बत देखकर मेरी मुझे कुछ ग़म नहीं था प्यार बस तुझ पर लुटाना था हवा से उड़ गए लाखों घरौंदे हम गरीबों के कभी जिन में हमारा खूबसूरत आशियाना था लगा है रोग सबको प्रेम का जिसका मदावा क्या मगर यह "राज" सबके सामने भी तो जताना था मदावा --इलाज परिचय :- कृष्ण कुमार सैनी "राज" निवासी - दौसा, राजस्थान आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर...
जिजीविषा
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जिजीविषा

वीणा वैष्णव "रागिनी"  कांकरोली ******************** रोज डर डर के, जिंदगी हर पल ऐसे जी रही थी मैं। तेज आंधी जब चली, तिनके को निहार रही थी मैं। कभी इधर उड़ा कभी उधर, ऐसे उड गिर रहा था वो, हर बार, एक नाकाम कोशिश किए जा रहा था वो, एक झोंका ऐसा आया, उसे उड़ता देख रही थी मैं। मिलती है सफलता, यहीं बैठे सब सोच रही थी मैं बरसों पड़ा था, गलती से आंगन के किसी कोने में, आज आसमान में, सपने सच होते देख रही थी मैं। सब्र फल मीठा, ये आज हकीकत होते देखा मैंने, वरना खो देता अस्तित्व, यही सोच डर रही थी मैं। मंजिल मिली होगी, या कहीं भटक गया होगा वो, यही प्रश्न दिमाग रख, अब परेशान हो रही थी मैं। जिजीविषा रख वो उड़ा, यह भी तो कम नहीं था। गिरेगा उठेगा मिलेगी मंजिल, खुश हो रही थी मैं। कहती वीणा धरा वो मरा, जो कुछ भी ना किया। हिम्मत मिली, आखिरी पड़ाव ऐसे लड़ रही थी मैं। . परिचय : कांकरोली निवासी वीणा वैष...
दिल अश्कों से जला गये
ग़ज़ल

दिल अश्कों से जला गये

विवेक रंजन 'विवेक' रीवा (म.प्र.) ******************** धुआँ दूर उठता रहा वो दिल अश्कों से जला गये, धुंध छटी तो फिर भी आँसू रुके नहीं छलछला गये। यादों के भीगे दर्पण में वो खुद को खोजते ही रहे, पलकें फिर से सजल हुईं और अक्स धुँधला गये। कैसे और भला किसको फूलों के हार दिये जायें, बाग़ेवफा में जाने क्यों सब गुलदस्ते कुम्हला गये। चुप रहने की ठानी थी जाने क्यों मौसम बदल गया, वो प्यार का इज़हार कर खामोश लब सहला गये। अपने तो सफर का सबब है मुख्तसर 'विवेक', उनकी राहों में फूल बिछाते हम काँटों पे चला करें। . परिचय :- विवेक रंजन "विवेक" जन्म -१६ मई १९६३ जबलपुर शिक्षा- एम.एस-सी.रसायन शास्त्र लेखन - १९७९ से अनवरत.... दैनिक समय तथा दैनिक जागरण में रचनायें प्रकाशित होती रही हैं। अभी हाल ही में इनका पहला उपन्यास "गुलमोहर की छाँव" प्रकाशित हुआ है। सम्प्रति - सीमेंट क्वालिटी कंट्रोल कनसलटेंट के रूप में वि...
मजबूरियां
ग़ज़ल

मजबूरियां

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** माना आपकी सल्तनत बड़ी है पर हमारे दम से ही तो खड़ी है आप,आप है, बराबरी कैसे किसकी ऊँचाई वक़्त से बड़ी है कई मजबूरियों से घिरा इंसान है खा ले चुपके से डांट जो पड़ी है कट रही है जिंदगी समझौतों पर खुद्दारी से घर की जरूरतें बड़ी है दिल दरक गया है कोई बात नही जज्बात से, पेट की आग बड़ी है क्यों नही लढ् लेता तू, धैर्यशील, जिंदगी रब के भरोसे पे खड़ी है . परिचय :- नाम : धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। सम्मान - हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिंदी रक्षक २०२० सम्मान आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाश...
दुआ नहीं आती
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दुआ नहीं आती

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** पास जब तक दुआ नहीं आती। रास कोई दवा नहीं आती। कौनसा फूल है बग़ीचे में, जिसको छूकर हवा नहीं आती। कुछ रही छेड़ छाड़ भी जिम्में, वरना यूँ ही क़ज़ा नहीं आती। है हिदायत ही दूर रहने की, क्यूँ कहें की वफ़ा नहीं आती। वक़्त भी शर्मसार है उनसे, जिनको ख़ुद पर हया नहीं आती। साथ मिलकर संभाल लो ऐसी, मुश्किलें हर दफ़ा नहीं आती। . परिचय :- नाम - नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी मे...
मरना अचल-अटल है
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मरना अचल-अटल है

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर म.प्र. ******************** जग में कोरोना के डर से ऐसा अदल-बदल है! सड़कों पर सन्नाटा पसरा घर में चहल-पहल है! अब सतर्क हो गया आदमी साये से भी डरता, अपने ही घर-आँगन में अब चलता संभल-संभल है! क़ुर्बत गुमसुम आज हुई दूरी ने जश्न मनाया, तीन-तीन फुट का अन्तर अब सबके अगल-बगल है! औरत हो या मर्द सभी के चेहरों पर है पर्दा, नज़र-नज़र दर्शन को तरसे हसरत विकल-विकल है! 'रशीद' कोरोना है कारण जाना एक दिवस है, जब तक जीवित रहें सुरक्षित, मरना अचल-अटल है! . परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•प्र•) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत शिक्षा ~ एम• ए• (हिन्दी और अंग्रेज़ी साहित्य), बी• एससी•, बी• एड•, एलएल•बी•, साहित्य रत्न, कोविद कार्यक्षेत्र ~ सेवानिवृत प्राचार्य सामाजिक गतिविधि ~ मार्गदर्शन औ...
दिखता हैं ख़ौफ़
ग़ज़ल

दिखता हैं ख़ौफ़

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** दिखता हैं ख़ौफ़ कितना, आज फिजाओं में, घोला जहर हैं किसने, बहती इन हवाओँ में... दूर से ही वो पूछते है, खैरियत कि कैसे हो? हैं झिझक ये के सी, हमसे मिलने मिलाने में... खुदगर्जी कहे उनकी, या समझें की बेबसी, दो कदम सँग ना आये, यु रिवाज निभाने में... हर शख्स आज हैं डालें, नकाब सा चेहरे पे, हया इतनी कब से हैं आईं, बेहया जमाने मे... इब्तिदा-ए-इश्क़ ये, मुक़ाम बाकी हैं "निर्मल", दम भर, जा गुजर, ना ज़ोर बेकस जमाने मे... . परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपन...
उनको जगाइये
ग़ज़ल

उनको जगाइये

विवेक रंजन 'विवेक' रीवा (म.प्र.) ******************** जन्नत का तसव्वुर ना अभी दिल में लाइये, दोज़ख में ही बस प्यार की शम्मा जलाइये। दिल में उमड़ते ज्वार कब रफ्तार पकड़ लें, तूफाँ मचल ना जाये सनम मान जाइये। वक़्त की गिरफ़्त में कैदी हों कब तलक, दिल को तो महका हुआ गुलशन बनाइये। रंजोगम के फैसले किस्मत पे छोड़िये, बस ज़िन्दगी है प्यार, यही प्यार पाइये। क़ाफ़िर तो है हर शख्स जो इंसान बना है, तनहा सी राहों में नये दीपक जलाइये। खोये हुए हैं लोग क्यों गुमनाम से ‘विवेक, ज़रा प्यार से पुकार कर उनको जगाइये। . परिचय :- विवेक रंजन "विवेक" जन्म -१६ मई १९६३ जबलपुर शिक्षा- एम.एस-सी.रसायन शास्त्र लेखन - १९७९ से अनवरत.... दैनिक समय तथा दैनिक जागरण में रचनायें प्रकाशित होती रही हैं। अभी हाल ही में इनका पहला उपन्यास "गुलमोहर की छाँव" प्रकाशित हुआ है। सम्प्रति - सीमेंट क्वालिटी कंट्रोल कनसलटेंट के रूप में विभिन्न ...
बेबसी सी हुई जिंदगी
ग़ज़ल

बेबसी सी हुई जिंदगी

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** बेबसी सी हुई जिंदगी इन दिनों। भूल ही हम गए शायरी इन दिनों। ख़ौफ़ इक सारी दुनियाँ में छाया हुआ, इस तरह कुछ हवाएँ चली इन दिनों। घर से निकले तो लोगों ने चमका दिया, यूँ नहीं ये सफ़र लाज़मी इन दिनों। शब अंधेरे उठाने को तैयार है, आग बरसा रही चाँदनी इन दिनों। लग रही हो हमारी जुबाँ तल्ख़ गर, है किसी से सिला न बदी इन दिनों। दूरियाँ ही सलामत रखेगी तुम्हें, ये रिवायत निभा लो सभी इन दिनों। . परिचय :- नाम - नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानिया...
शौहरत जमाना शहर
ग़ज़ल

शौहरत जमाना शहर

प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) (मुजफ्फरनगर) ******************** यह शौहरत जमाना शहर आपका है हर शै है नशीली असर आपका है तुम्हें हो मुबारक हसीं जामे उल्फत जो मैंने पिया वो जहर आपका है रूको या रखो दिल में मंजिल की हसरत कदम है तुम्हारे सफर आपका है पाने है दिल गर जो खोए हुए हैं उधर है हमारा इधर आपका है भटकते भटकते न मायूस होना जो आओ इधर तो ये घर आपका है पड़ा है कोई आपके आस्तां पर उठा लो उसे वो अगर आपका है ठुकरा दो चाहे गले से लगा लो "शाफिर" तो बस उम्र भर आपका है . परिचय :- प्रमोद त्यागी (शाफिर मुज़फ़्फ़री) ग्राम- सौंहजनी तगान जिला- मुजफ्फरनगर प्रदेश- उत्तरप्रदेश आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में ...
तुम्हे गर भूलना चाहूं
ग़ज़ल

तुम्हे गर भूलना चाहूं

दामोदर विरमाल महू - इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** तुम्हे गर भूलना चाहे तो अक्सर याद आते हो। हमे गर चोट लगती है तो क्यों आंसू बहाते हो। तुम्ही ने की है गर ये हंसी ज़िन्दगी मेरी बर्बाद, फिर क्यों मुझपे ये बदनुमा इल्ज़ाम लगाते हो। हम तो किया करते थे कोशिशें तुम्हे हंसाने की, तुम हो ज़ालिम जो मुझे हर एक पल रुलाते हो। तुमसे बिछड़े हुए कितने बरस बीत गए देखो, फिर क्यों तुम मुझे अपने ही पास... बुलाते हो। जब बचा ही नही कुछ तेरे और मेरे दरमियान, तो क्यों गैरो से अक्सर मेरी खैरियत मंगाते हो। बहुत देर की अपने आपको साबित करने की, अब फ़िज़ूल में क्यों इतना झूठा प्यार जताते हो। बुरे तुम नही थे बुरा तो दिल है तुम्हारा शायद, क्यों अपने अंदर तुम ये सब देख नही पाते हो। हम अंजान नही है तुम्हारी ज़िंदगी से समझे, पता है तुम अब भी औरों से दिल लगाते हो। . प...