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रचियता : केशी गुप्ता
झील के किनारे नीला बैठी हुई पानी की कल कल की मधुर आवाज का आंनद ले रही थी कि तभी पिछे से बंटी ने आवाज दी , नीला अब अंदर आ जाओ सूरज ढल चुका है और ठंड भी बड़ गई है . नीला और बटीं चार दिन के लिए नैनीताल घुमने आए थे. नैनी झील के पास ही होटल बुक किया था . बंटी की आवाज सुन नीला उछी और उसका हाथ थामें होटल की ओर चल दी . नीला और बंटी आज भी ये समझ नही पा रहे थे कि ऐसी क्या बात है दोनों के बीच जिसने उनहे चाहे अनचाहे अक दूसरे के इतने करीब कर दिया है कि उन्हे इब समाज की परवाह नही रही .
नीला शादि के 20 साल गुजर जाने के बाद भी प्रमोद के साथ ऱिश्ता जोड़ नही पाई थी . उसके और प्रमोद के बीच एक अजीब सी खामोशी थी , जिसने कभी उन्हे करीब होने नही दिया . कारण प्रमोद ही था शुरू से ही वह हर छोटी बात पर नीला से खफा हो कई कई महीन बात नही करता था . धीरे धीरे नीला उस सबकी आदि हो गई . अब उसे प्रमोद के होने या न होने से कोई फर्क नही पड़ता था . यही हाल बंटी की शादिशुदा जिंदगी का था, उसकी शादि को इस साल 25 वर्ष पूरे होने वाले थे मगर वह आज भी संगीता से जोड़ नही सका . शायद इन्ही हालातों ने नीला और बंटी को एक दूसरे से जोड़ दिया . मौका मिलते ही दोनों अपनी अन्जानी दूनिया में खो जाते . एक दूसरे के साथ वह खुद को पूरा महसूस करते थे पर समाज के दायरों के आगे मजबूर थे. अपनी खुशी के लिए बहुत सी जिंदगियों के साथ खेलना उन्हे गवारा नही था . इसलिए चोरी से मिले पलों को ही भरपूर जी लेते थे .
देखते देखते कई साल बीत गए . बंटी और नीला का लगाव उमर के साथ बढ़ता ही गया . शायद इस की वजह सामाजिक बंधन का न होना था . दोनो एक दूसरे से, दिल से दो स्वतंत्र व्यक्तियों की तरह जोड़ थे . जिसने उनके रिश्ते की ताजगी को बनाए रखा . फिर एक दिन नीला बहुत बीमार पड़ गई , बंटी चाह कर भी उस से मिल नही पा रहा था . आज उसे अपने सामाजिक रिश्ते के नाम की जरूरत महसूस हो रही थी . वह नीला से पूरे हक के साथ मिलना चाहता था मगर मजबूर था . अगले दिन नीला चल बसी और बंटी टूट गया . वह नीला के जनाजे को दूर से निहारता रहा और सोचता रहा क्या उसका और नीला का रिश्ता भी अधूरा रहा ? जिसके साथ उसे पूरा़ होने का अहसास होता था . आदमी सभी को खुश रखने के चक्कर में कभी पूरी ज़िदगी जी नही पाता कुछ अधुरापन रह ही जाता है .
लेखक परिचय :- केशी गुप्ता लेखिका, समाज सेविका
निवास – द्बारका, दिल्ली
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