
डॉ. उपासना दीक्षित
गाजियाबाद उ.प्र.
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समझो दुःखों का अंत
पढो़ नव जीवन का मंत्र
आ गया आनंद रुपी पवन
छा गया श्रृंगार का सृजन
जब बसंत छा जाये
तुम आओ द्वार हमारे
मैं दरवाजा खोलूँ
हर बन्धन को छोडूँ
तुम कुर्सी को खिसकाकर
तकिये को तनिक टिकाकर
बैठो हर चिंता छोड़े
आलस को तन पर ओढ़े
मैं भी सटकर यूँ बैठूँ
गृहकाज की चिंता छोडूँ
खिड़की को खोल सलीके
लूँ मस्त पवन के झोंके
हो चाय की प्याली रखी
यादों की भाप उड़े यूं
तुम याद करो तरुणाई
हो मेरे साथ पुरवाई
पीले फ़ूलों की आभा
है प्यार तुम्हारा जागा
तुम हौले से मुस्काओ
बसंत के दूत बन जाओ
न जागे तीव्र भावना
हो केवल प्यारी भावना
तुम समझो और मैं समझूँ
कैसा है बसंत का आना
तुम हम बनकर रह जाओ
हम तुम बनकर रह जायें
तुम मन का बसंत सम्भालो
मैं तन का बसंत सम्भालूँ
घर की दीवारें बोलें
मन के दरवाजे खोंले
अनुभव की सर्द हवाऐं
बसंत के रंग नहायें
तुम हमको देख निहारो
मैं तुमको देख निहारूँ
बासन्ती फूलों की आभा
न पतझड़ जिसमें समाया
मन का उल्लास जगाकर
चहुंँओर बसंत बुलायें
बस अन्त न हो खुशियों का
ऐसा ऋतुराज मनाये
परिचय :- डॉ. उपासना दीक्षित
जन्म – ३० दिसंबर १९७८
पिता – स्व. ब्रजनन्दन लाल मिश्रा
माता – स्व. श्यामा मिश्रा
शिक्षा – एम. ए हिन्दी, पी. एच. डी
निवासी – गाजियाबाद उ.प्र.
शोध विषय – धूमिल की कविता में युग चेतना
प्रकाशन – शोध समीक्षा मूल्यांकन, शोध सरिता, शोध मंथन, इन्नोवेशन द रिसर्च काॅन्सेप्ट, समकालीन हिन्दी कविता एक अंतर्यात्रा, जनसंचार माध्यम पत्रकारिता परिप्रेक्ष्य एंव सम्भावनायें, कोरोना काव्य संग्रह आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशन।
संप्रति – अस्सिटेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, इंग्राहम इंस्टीट्यूट गर्ल्स डिग्री कॉलेज, गाजियाबाद उ.प्र.
घोषणा पत्र – मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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