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होली-परंपरा, प्रतीक और वर्तमान की वैचारिक चुनौती
आलेख

होली-परंपरा, प्रतीक और वर्तमान की वैचारिक चुनौती

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** होली भारतीय सांस्कृतिक जीवन का केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की परीक्षा भी है। रंगों की उन्मुक्तता, सामूहिक उल्लास और लोक परंपराओं की जीवंतता के बीच यह पर्व हर वर्ष हमें यह प्रश्न पूछने के लिए विवश करता है कि क्या हम अपने मूल मूल्यों के प्रति उतने ही प्रतिबद्ध हैं, जितने अपने उत्सवों के प्रति? बदलते सामाजिक परिदृश्य, तीव्र होती वैचारिक प्रतिस्पर्धा और डिजिटल माध्यमों की प्रभावशाली उपस्थिति के बीच होली का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठा है। पौराणिक कथा में हिरण्यकशिपु का अहंकार, प्रह्लाद की दृढ़ आस्था, होलिका का छल और अंततः भगवान नरसिंह का न्याय- ये घटनाएँ केवल धार्मिक आख्यान नहीं है, ये सत्ता और सत्य के शाश्वत संघर्ष का रूपक हैं। हिरण्यकशिपु उस मानसिकता का प्रतीक है, जो शक्ति के मद में असहमत...