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ईरान–इजराइल, अमेरिका युद्ध पर
कविता

ईरान–इजराइल, अमेरिका युद्ध पर

महेश बड़सरे राजपूत इंद्र इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** वो आवाजें! मलबे के नीचे, दबे हुए लोगों की, क्या नहीं पहुंच पाती हैं, ओ आकाओं तुम्हारे कानों तक? पर क्या? ये अहसास नहीं तुम्हें, कई माँ–बाप और विधवाऐं, भाई–बहनें और उनके टूटे सपने, टूटी इमारतें कोस रहे हैं आसमानों तक। सिसकियों से, चीखों–चीत्कारों से, लेना देना नहीं मासूम पुकारों से, शिकारियों की जिद ने ही पहुंचाया है हजारों जिंदगियों को कब्रस्तानों तक। तुम्हारा घमंड! छेड़ गया युद्ध प्रचंड, विश्वास हुआ खण्ड–खण्ड, प्रतिशोध की ज्वाला अखण्ड, पहुंची निर्दोषों के आशियानों तक। तुम्हारा लोभ! ले ही आया विक्षोभ, है चारों तरफ शोक ही शोक, सूना घर, सूनी गलियाँ, सूने रास्ते, सुने ताफ़िला घर और मस्जिदों तक। ओ! हुक्मरानों! दिल की आंखें खोलो, दिल की गहराइयों से शुभ शुभ बोलो, और जो तड़पते–...