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Tag: निर्मल कुमार पीरिया

तृष्णा
कविता

तृष्णा

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** खिलना चाहता हूँ मैं भी, पर गमलो में उगे पौधों, की तरह की नही, ख्वाहिश है जंगलों-सी फैलने की, ना कोई ओर ना छोर कोई, शांत योगी से, फुसफुसाते हवा सँग, उगना चाहता हूँ, बरगद की तरह, सुनता पंछियों की कलरव, झांकते नीड़ से पांखी, देते सुकू पथिक को, जो भर दे साँसे जहाँ में... चहचहाना चाहता हूँ, चिड़ियों की मानिद, जी भर, उड़ना चाहता हूँ, परिंदों के सँग, पींगें भरता, जमी ओ आसमा के, मिलन-रेखा तक... महकना चाहता हूं, फूल बहार की तरह नही, स्वच्छंद बेलो की तरह टेसू, कचनार ओ अमराइयों की तरह... बहना चाहता हूँ, पर नदी की नही, सागर ओ झरनों के मानिद, चट्टानों को चीरती, बन्धनों को तोड़ती उन्मुक्त, बेखौफ लहरों की तरह, थाह लेना चाहता हूँ, अंनत मन की गहराईयों तक... बरसना चाहता हूँ, पर बदली सा नही सावन की झड़ी सा, तपती धरा पर, बंजर जमी पर, सूखे अधरों पे, ...
प्रीत की पाती: प्रथम स्थान प्राप्त रचना
कविता

प्रीत की पाती: प्रथम स्थान प्राप्त रचना

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** व्योम भी भीगा भीगा था, हिय रोशनी, थी रही थिरक, कंपकपाते उन पलों में, मन-चंचल बूंदे,थी रही बहक, रति भी दोहरा रही थी, देव के तंग, वलय बाहुपाश में शीत-तपती, नील-निशा जब, प्रीत अग्न,थी रही दहक... अधरों के खिलने से तकती, श्वेत मोती माल चमक, रक्त कमल पंखुड़ियों के मध्य, मंदहास की महक, मयकदो की रागिनी सी, मनोवल परिहास की खनक, अँगप्रत्यंग खिल उठा जब, कांधे बिखरे संदली अलक... मृगनयनी बाणों ने छुआ, तप्त दहकते नीर मन को, पाषाण समदृश्य उर था जो, मोम सा पिघलने लगा, शब्दो का बंधन था पर, वाचाल दो नयन बतिया रहे, ओष्ठ जब लरजने लगे, ते निश प्रेम गान बहने लगा... ओस की अनछुई बूंदों को, ले मसि रचु, नव प्रीत गान, अवनी जो हैं प्रेम पटल सम, अंबर से झरता शब्द गान, बिन रचे ही काव्य हो तुम, शेष रही ना कोई व्यंजना, प्रीत ग्रन्थ तुम, बाचु मैं, रचे ना ...
सृष्टि के रुप
कविता

सृष्टि के रुप

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कभी रँगी मैं, श्वेत धवल से, कभी सजी, ओढ़ धानी रँग, पहन हरा, झूमी मैं उपवन, इतराई रही, ले फागुनी रँग... कभी महकू, अमराई से मैं, कभी बिखरु, बन गुलमोहर, कानन-कानन,चमक रही मैं, अंशु झलकी, ज्यो गजगौहर... तृण, तरु, लता, अनिल, हूं मैं, निर्झर की, कल कल निर्मल मैं, बनी कही, मैं किरीट धरा का, हूं, अवनि से अंबर तक मैं... मैं ही जननी, हूं पालक भी मैं, हूं सृष्टि और आदि अंनत मैं, नीलकंठ बन, सब सहेज रही मैं, वक्त थमा हैं, जो महक रही मैं... . परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हि...
प्रकृति का सौंदर्य
कविता

प्रकृति का सौंदर्य

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** आज हर्षित नीर नलीन हैं, दृश्य विमोहक, वास हैं, हो प्रमुदित, कर्णिकार पुष्पित, देख कामिनी रास हैं... पात पात कुहूकिनी झूमें, कुहू कुहू के राग पे, मधुप भी मचले हुए हैं, गुन गुन करते नाँद पे... स्वांग रचता मयुर अरण्य में, रमनी को रिझाने में, देख प्रतिबिम्ब, ज्यो लजाई, अंशु निर्मल दरपन में... निर्झरिणी आवेग प्रबल है, तोड़ बाँध, उर सारे, मिलन पि को बह निकली, भाव घुँघरु, बांध न्यारे... सुवास बिखरी हर दिशा में, मन उत्फुल्ल, बोधशून्य हैं, ढूंढ़ते सब, अपनी कस्तूरी, विराजे उर, ज्ञान शून्य हैं... . परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक ...
दूरिया : तुम्हारी फिक्र होती  हैं
कविता

दूरिया : तुम्हारी फिक्र होती हैं

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हैं दूरी चंद कदमों की, हवा का रुख सहमा हैं, जी लू मन भर संग तेरे, फिज़ाओ में जहर सा है... तबियत अब नही लगती, महकते इन नजारों संग, छू पाये ना कोई साया, अजब कैसी बेबसी हैं... सुहानी भोर की मधुरता, अब तो रास नहीं आती सरेशाम हैं सिमट जाते, तुम्हारी फिक्र होती हैं... . परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) की...
नव भोर की ओर
कविता

नव भोर की ओर

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** चमक रहा वो, देख! शीर्ष, हैं ज्योत्सना मुसकाई, महक रहा हैं धीर मेघपुष्प, चल वैतरणी पार लगाई... मचल उठा मन मयूर सा, नयन निहारें, विहंगम दृश्य, वारिधर भी रहे मचल हैं, थिरके अर्श, अंशु अदृश्य... मस्ती में झुमें हैं, तरुध्वज, जल-थल चर, विहंग सारे झुम रही सँग, मंद समीरण, तृण, टीप "निर्मल" पे वारे ... बिखर रही, रौशनी राहों में, नई उमंगें सँग भर बाहों में, तज तिमिर, बन नई चमक, जा निकल सँग नई राहो में उपमाएँ : शीर्ष-आसमा/ज्योत्सना-चाँदनी/धीर-शांत/मेघपुष्प-जीवन,जल/वैतरणी-ब्रह्म नदी/वारिधर-मेघ/अर्श-नभ/अंशु-किरण/तरुध्वज-ताड़,वृक्ष/चर-प्राणी विहंग -पँछी/समीरण-वायु/तृण,टीप-घास से शाख तक परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौ...
एक दिन वो मुस्कायेगी
कविता

एक दिन वो मुस्कायेगी

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हाँ! हूँ जानता मैं की, वो फिर से मुस्कायेगी, खिल उठेंगे, अधर कमल, नेह के सुर सजाएँगी. तब वो फिर मुस्कायेगी... अलसाई - सी भोर में, रश्मि चुनर लहरायेगी, तज खुमार, जलज खिले, वात अतर बिखरायेगी. तब वो फिर मुस्कायेगी... भृमर टटोले कुसुमरज, तित्तरी रँग उड़ाएगी, कोकिल कुहू के लता लता, पिहू पिहू राग सुनायेगी. तब वो फिर मुस्कायेगी... गोधूली रज से भीगी संझा, जब चितचोर सँग निहारेगी, निशि पिछौरी तब उर्वी ओढ़े मन ही मन जब लजाएँगी. तब वो फिर मुस्कायेगी... उजयारी में ताके, पी जब, जा वलय बंध समाएगी, हिय में उठे हिलोरें जब, नयन कमल कुम्हलायेगी. हाँ! तब तो वो मुस्कायेगी... . परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित औ...
दिखता हैं ख़ौफ़
ग़ज़ल

दिखता हैं ख़ौफ़

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** दिखता हैं ख़ौफ़ कितना, आज फिजाओं में, घोला जहर हैं किसने, बहती इन हवाओँ में... दूर से ही वो पूछते है, खैरियत कि कैसे हो? हैं झिझक ये के सी, हमसे मिलने मिलाने में... खुदगर्जी कहे उनकी, या समझें की बेबसी, दो कदम सँग ना आये, यु रिवाज निभाने में... हर शख्स आज हैं डालें, नकाब सा चेहरे पे, हया इतनी कब से हैं आईं, बेहया जमाने मे... इब्तिदा-ए-इश्क़ ये, मुक़ाम बाकी हैं "निर्मल", दम भर, जा गुजर, ना ज़ोर बेकस जमाने मे... . परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, हिंदी रक्षक मंच पर अपन...