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Tag: विजय गुप्ता “मुन्ना”

चेहरा भाव
दोहा

चेहरा भाव

विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** मानो कहकर सोचना, दे जाता अवसाद। जो सोचकर कहे सदा, मनमोहक हो नाद।। चेहरा भाव जानिए, अंतर्मन की चाल। कलम समझ तो अनवरत, भाषा मालामाल।। हाव_भाव गुण देन से, जीवन कुछ आसान। दोहरापन छिपा कहीं, कर लेते पहचान।। मुख से प्रकट कुछ करे, मन में रखे दुराव। भिन्न रूप अति सहजता, दिखता है स्वभाव।। पढ़कर भाषा अंग की, माना होती जीत। बचना हो जब गैर से, उसकी है ये रीत।। रिश्तों संग कटुता कभी, देती जब आभास। सहज ढंग परखो इन्हें, सुखद रहे आवास।। विभिन्न अर्थ नकारते, अपनी जिद की टेक। सदाचार ही खो गया, जो बन सकता नेक।। साफ झलकते भाव की, परख शक्ति ही शान। शब्द चयन आधार से, मृदु कुटिल पहचान।। गुण अवगुण दोनों रहें, जग मानव का सार। सहनशील हरदम नहीं, अवश्य करो विचार।। परख अनोखी चाहतें, संभव रहे बचाव। हर पहलू के रूप दो, गलत ...
क्रोध क्षमा की म्यान
कविता

क्रोध क्षमा की म्यान

विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** शब्द लघु हैं गुस्सा क्षमा, व्यापक है प्रभाव। एक म्यान में एक का, चलता है स्वभाव।। द्वंद्व इनमें ना रहे, गुण विशेष का ताज। अति दोनों की है बुरी, गुम हो जाती लाज।। सटीक व्याख्या क्रोध की, करना हो श्रीमान। भिन्न स्वरूप जांचिए, बहुत जरूरी ज्ञान।। गलत सदा अवमानना, जिद चले प्रतिकूल। छोटे बड़े काज जहाँ, वृहद लघु भी भूल।। बिन गलती या डांट से, ना पले व्यवहार। अनुशासन के नियम ही, देते हैं संस्कार।। जब गलती खुद आपकी, होता क्रोध फिजूल। अन्य किसी पर थोपना, अवश्य रहे निर्मूल।। संत ऋषि मुनि गण सभी, दिखलाते आवेश। सुंदर भविष्य के लिए, समय समय आदेश।। दुर्वासा परशुराम का, तप बल ही वरदान। खूबी बगैर क्रोध का, अनुचित है अरमान।। त्रेता युग में ’राम’ का, सागर से अनुरोध। अवमानना पयोधि की, तब भड़का था क्रोध।। करते रहो ...