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Tag: श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी

कलयुग
कविता

कलयुग

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** आज के युग मे मानो कलियुग प्रगट हो गया है, लगता है कोई बुरा समय एक आकर लेकर दुनिया पर छा गया है ! चारों ओर अशांति विद्रोह और भय व्याप्त हो गया है, विचारों में जहर और व्यवहार में आक्रोश हृदय में घर कर गया है ! गलत को सही साबित करने की कला आ गई है, झूठ को सच का मुखौटा पहनने का हुनर आ गया है ! पाप-पुण्य के मायने बदल गए हैं हर इंसान स्वार्थी हो गया है ! कलयुग कोई तिथि या युग नहीं जब अनाचार- मन और विचारों में मे व्याप्त हो जाए, वही कलयुग अवतरित हो जाता है ! ये मन के पापों की एक अवस्था है, जो सब कुछ तहस नहस कर देता है, पाप समाज में नहीं इंसान के भीतर जन्म लेता है और वही विचार कर्म बनते है ! कलयुग की स्तिथि से हमको स्वयं से ही बाहर निकलना होगा, करुना और प्रेम का मार्ग पकड़ना होगा, ...
कभी  तो थक जाया करो
कविता

कभी तो थक जाया करो

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** थक गई हो क्या, नहीं यू ही लेट गई हूँ, क्या चाय बना दूँ!! कभी थकती नहीं वो दिनरात जूझते-जूझते ! बच्चों की नींद की निगरानी करती बिना खटपट काम निबटाती ! स्कूल, ऑफिस से आने पर गर्म-गर्म भोजन, नास्ता परोसती क्या कभी थकती नहीं होगी? दिन में सबके आराम के पलों मे कपड़े तहाती, इस्त्री कर सब की अलमारियों में सजाती, अम्माँ क्या चाय मिलेगी कि पुकार पर, चौके में दौड़ जाती, कभी तो थकती होगी !! इतना आसान कहाँ होता है उसको खुद की मन की करना , सारे प्रलोभन छोड़ने पड़ते होंगे! इनको ना कहने की आदत नहीं होती इनके सपनों में भी दूध उबल कर गिरता होगा, इनकी आँखों की पलकें भी घर के दरवाजों पर बिना झपके लगी होती हैं कि शायद कोई मेहमान आता होगा ! सपने में भी इनको चैन नहीं मिलता है! हे नारी त...
कहाँ गई तुम दीदी
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कहाँ गई तुम दीदी

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** घर के नींव की ईंट थी दीदी तुम सहसा पतझड़ी हवा ने बिखेर दिए हर ईट इस घर की, विरान कर गई वो आंगन जिसमें तुम्हारी मुस्कुराहटें खिलखिलाती थी!! हम एक वृक्ष से उत्पन्न पत्ते, नहीं जानते थे, कहाँ जाते है शाख से टूटकर धरा पर सूखे पत्ते सा कर गई जीवन हम सबका, नहीं समझ पाये तुम्हारा यूँ चले जाना आजतक !! जिंदगी के हर उतार-चढाव की साथी थी तुम, आज भी आंखों की नमी हो तुम, मेरी हंसी में कौन हॅसेगा साथ मेरे, दुःख में कैसे मुस्कराते हैं, सिखाती थीं तुम !! तुम्हारा चले जाना पिताजी सह ना सके , टूट कर बिखरे हम अब तक जुड़ ना सके थोड़ा तो ठहर जाती साथ हमारे माँ को कैसे ऐसे छोड़ गई तुम ?? आज भी हर एक के हृदय में बसी हो तुम, मुझे पता है मेरे आसपास ही हो तुम, बार बार दिल कहता है कहीं से लौट ...
अर्द्धनारीश्वर
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अर्द्धनारीश्वर

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** रूप लिया अर्द्धनारीश्वर का, शिव-शक्ति कहलाते, शिव प्रारम्भ शक्ति है ब्रह्मांड तभी तो अर्द्धनारीश्वर कहलाते!! आधा भाग नर का, आधा बना नारी का, शिव बिन शक्ति अधूरी- शक्ति बिन शिव अधूरे हो जाते!! प्रश्न एक कौंधा मन मे बार बार, पुरुष का रूप लेकर जो करते नारी सा शृंगार, कौन हैं ये लोग, क्यों दर दर पाते तिरस्कार!! घर घर आशीर्वाद पहुंचाते, बधाई के गीत गाते, फिर भी समाज से बहिष्कृत हो स्नेह को तरसते! आसान नहीं इनका जीवन, हर मोड़ पर चुनौतियां आती, तिल तिल दम तोड़ते, शिव शक्ति का सृजन ये, किन्नर कहलाते! अर्द्धनारीश्वर जब घर-घर पूजे जाते ईश्वर की ही रचना हैं ये, फिर क्यों अधूरे कहलाते?? प्रश्न बड़ा है समाज के ठेकेदारों से मेरा, क्यों नहीं इनको हम अपनों जैसा अपनाते??? प...
कैसा वो दिन था
कविता

कैसा वो दिन था

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** कैसा वो दिन था, प्रारम्भ का अंत था, प्रचंड पराक्रम था, कर्म अखंड था। सनातन की रक्षा हेतु चढ़ा वो धर्म की सूली पर प्राण दिए अपने, स्वाभिमानी बलिदानी था! ना स्वयं की चिंता ना घर-बार की खबर कोई, दृढ़ संकल्प लिए गा रहा पवित्र राम नाम था। नमन है, प्रणाम है, कोटि कोटि वंदन है युवक था, बालक था, बुजुर्ग भी पर भगवा था। शौर्य- वीरता, पराक्रम का अद्भुत वो पल था, ना भुला सके इतिहास कभी, वो ज्वलंत क्षण था। ६ दिसंबर १९९२ का दिन था धर्म के दाग को सेवकों ने स्वयं के रक्त से धोया था। नमन तुम्हें हे बालक यशवर्धन तू यज्ञ था, कितनों की आहुतियों से खड़ा हुआ ये आज का मंदिर है। अवध था, अवध है, जय श्री राम का ब्रम्हांड में जय घोष था। भारत के लाल थे कैसा वो जोश था। अमर हुए, इतिहास ब...
देह  से परे
कविता

देह से परे

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** काया से परे, एक स्त्री के भूगोल को जान पाए हो कभी ? उसके भीतर उलझी हुए सडकों को कभी समझ पाये हो क्या ? एक खौलता हुआ इतिहास है भीतर उसके, क्या पढ़ पाये हो कभी!! नहीं समझ पाये आज तक उसको रसोई और घर-परिवार से परे भी एक दुनिया है उसकी, पुरुष से परे क्या उसकी जमीन समझा सकते हो उसको ? सदियों से तितर-बितर हुई ढूंढ रही अपने घर का पता बता सकते हो उसे ? कभी विस्थापित कभी निर्वाचित हुई उसके सम्मान को समझा सकते हो समाज को? उसकी दहलीज पर पड़े मौन शब्दों को जाना है कभी ? इस कुरुक्षेत्र में कई बार छली गई उसके मर्म की अनुभूति तुमको हुई है कभी ? उसकी पीठ पर पड़े अनगिनत गांठों को टटोला है तुमने, नहीं ना .....? वो कहना चाहती है" "इस देह से परे भी स्त्री की एक दुनिया है!! पर...
स्वयं से स्वयं की पहचान
कविता

स्वयं से स्वयं की पहचान

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** हो तिमिर घना, अधीरता नही स्वयं पर विश्वास हो, क्योंकि अमावस की रात मे भी निर्वाण घटित होता है कीचड़ कितना भी हो, कमल भी वहीं खिलता है दिया मिट्टी का ही हो रोशनी भरपूर देता है वो धरती का हिस्सा होता है! ईश्वर की कोई भाषा नहीं होती उस तक पहुचने का एक ही सेतु होता है , मौन का, मौन रह साधना का मौन रह कर्म करने का ! बुद्ध, महावीर या कोई संत नहीं बनना है स्वयं को अंगीकार कर स्वयं से स्वयं की पहचान कराना है ! इस राह में कुछ भी प्राप्त नहीं होता जो मिलेगा वही "स्वयं" को सार्थक करेगा, बहुत कुछ खो जाएगा, चिंता, महत्वाकांक्षा, भय, लालच, इर्ष्या, द्वेष, बेचैनी, साथ-साथ, अमूर्त दुनिया का फैलाव भी जो इंसान स्वयं बनाता है जिसमें सारा जीवन व्यतीत होता है! जिस दिन स्वयं को जानकर ...
मुझमें मेरा विश्वास जिंदा रहने दो
कविता

मुझमें मेरा विश्वास जिंदा रहने दो

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** जिसको जो भी कहना है, उसे कहने दो थोड़ा बाकी है जीवन सूकून से अब रहने दो! बेमतलबी रिश्तों के कच्चे धागे टूट जाने दो जिस राह पर ले जाए वक़्त उस राह पर चलने दो! बहुत मुश्किल होता है सबके सांचों में खुद को ढालना, थोड़ा सा ही सही मुझमे "मैं" जिंदा रहने दो! सीख लिया है सबक जीवों की मुस्कराहट में मुस्कराने का, लोगों को मेरी मुस्कान से जलन होने दो! हँस के जीना है हर हाल में, परिभाषा है जीने की, हर ओर यही किस्सा अब मशहूर होने दो! यूँ ही नहीं मिट जाएगा अस्तित्व मेरा , मुझमें ये विश्वास मेरा जिंदा रहने दो!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार) निवासी...
नारी के दो मन
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नारी के दो मन

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** एक नारी के दो मन की कहीं व्याख्या नहीं मिलती !! एक मन जो सब कुछ चुपचाप सहन करता है, तो दूसरा विद्रोह करने को आतुर ! एक मन छोड देना चाहता है सबकुछ, क्योंकि वो जानता है सब निरर्थक है, दूसरा मन लालायित होता है सब सुविधाएं भोगने हेतु ! एक मन सदैव झुका रहता है, करुना, ममता और परवाह में, दूसरा मन निश्चिन्त-मस्तमौला बन चलना चाहता है ! कभी-कभी ये दोनों मन शांत हो जाते हैं, भीतर ही भीतर संवाद करते हैं ! एक मन दूसरे को मौन साधने को कहता है, बोलने से बिखराव का भय दिखाता है, दूसरा मन मंद मंद ध्वनि में अपनी व्यथा कहना चाहता है ! वो पूछना चाहता है, कितनी पीड़ाओं से और गुजरना होगा, सब कुछ सम्भालने के लिए?? स्वयं के अस्तित्व को खो जाने का डर भी बताना चाहता है ! वह शांति और प्रकृति ...
प्रेम करना सीखें
कविता

प्रेम करना सीखें

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** प्रेम निभाना सीखें प्रेम तो हर कोई कर लेता है, प्रेम का अर्थ समझे बिना प्रेम व्यर्थ है ! इस जीवन के सफर में सब कुछ पीछे छूटता जाता है, केवल स्मृतियाँ ही शेष रह जाती हैं , समय के साथ ये स्मृतियां भी धुंधली पड़ने लगती हैं , मानो रेत की गहराई में दब कर कहीं गुम हो जाती हैं ! बाकी बच जाता है, रिक्तता-मौन, जो बचा खुचा प्रेम भी सोख लेती है ! मौन का अर्थ अहंकार नहीं होता, कभी-कभी भावनाओं की थकान होती है, टूटते विश्वास और थकते दिल की गवाही होती है, निःशब्द अन्तराल के बाद वेदनाओं की बहती कहानी होती है!! मौन इतना गहरा हो जाता है, जहां से शब्द टकरा कर वापस लौट आते हैं एक प्रतीकात्मक प्रतीक्षा रह जाती है, अंतहीन प्रतीक्षा, जहां प्रेम के लौटने की कोई आहट नहीं आती!! परिचय ...
साकार रूप लेता सपना
कविता

साकार रूप लेता सपना

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** एक दिन मैं यूँ ही सड़क पर गुजर रहा था, रास्ते पर कुछ गिरा पड़ा था, बीमार, भूख-प्यास, से निढाल, सड़क के आध बीच लगा जैसे मेरा स्वप्न पड़ा हो !! एक श्वान था, जीवित किन्तु मरणासन्न स्थिति में! आत्मा सहित अपनी श्वास की तरह समेत लिया स्वयं में!! उस दिन बहुत कुछ गिरा मेरे अस्तित्व से मोह- माया, राग-द्वेष, क्रोध- अहंकार, तमाम संपत्तियां भी मेरे जेब से गिरी थी, मेरी गृहस्थी भी गिरी थी उस दिन!! मेरे पास था नन्हा जीवन जिसकी आंखों में मुझे मेरे सपने दिखाई दे रहे थे, ममता- करुणा, स्नेह से भरे जीवन जीने का स्वप्न! उसी दिन मैंने ईश्वर से ऋग्वेद के चरवाहों की करुणा-स्नेह और संरक्षण मांगा जीवों के जीवन के लिए ! धरती से बस अपने शरीर जितनी जगह मांगी, प्रकृति माँ से हल जितनी शक्ति से जुट स...
जगत पालनहार माँ
कविता

जगत पालनहार माँ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** शक्ति का स्वरूप हैं माँ हम सब की भक्ति का रूप हैं माँ मुक्ति का धाम हैं माँ हर जीव के जीवन का आधार है माँ !! माँ के नौ रूप निराले करुणा, ममता, मिले अपार दया-प्रेम से सुशोभित है रूप सभी रूप अद्भुत साकार!! विध्वंस किया सब असुरों का ज़न-ज़न का कल्याण किया धरा, गगन, नदियां, उपवन अद्भुत अनुपम उपहार दिया, निज स्वार्थ वश अंधे होकर हमने इनका तिरस्कार किया!! माता की सवारी है सिंह, मयूर, गर्दभ, गजराज, हंस और मृग गजराज, वृषभ और गौ माता सारे जीवो से सजा स्वरूप!! सारे जीवों में जब वास है इनका तब क्यों होता इनका दोहन, इनका भक्षण इनका शोषण?? कैसे हम भक्त कहलाते हैं, कैसी भक्ति, कैसा पूजन??? चहुँ ओर मचा है हाहाकार हर घर मे आया है काल हे माँ तुम ही हो पालनहार करो दया दृ...
मैं जब भी जाऊंगी
कविता

मैं जब भी जाऊंगी

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** जब भी जाऊंगी, कोई प्रश्न अधूरा नहीं छोड़ूगीं, पूर्ण विराम लगा कर जाऊँगी! अर्धविराम रिश्तों को जीवित नहीं रहने देता है, जीवन मे समर्पण होना चाहिए! प्रेम जीवन का आदि और अंत दोनों होता है! प्रेम में अधूरेपन की कोई जगह नहीं होती उसमे पूर्ण समर्पण होना चाहिए, अपने आराध्य के प्रति संपूर्ण समर्पण! दिल मे कोई दुविधा नहीं, मन मे कोई प्रश्न नहीं, प्रेम स्पष्ट निर्णय होना चाहिए! शांत भाव से भीतर ही मिट जाना, फिर शब्दों मे कोई ठहराव नहीं होता! कोई अपूर्णता नहीं छोड़कर जाऊँगी, प्रेम की परिभाषा पूर्ण करके विदा होऊँगी!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवा...
मेरी बूढ़ी अम्माँ
कविता

मेरी बूढ़ी अम्माँ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** सुघड़ता और संस्कारों की बुलन्द इमारत हैं बूढ़ी अम्मा, भोजन, पापड़ और अचार बनाती, बिना नाप जोख के अद्भुत स्वाद, दिलाती। जो घर के सारे काम, एक साथ करते हुए, सारे प्रबंधन को मात देती उनके हर काम में सुघड़ता दिखती! फिर भी नहीं कही गई कोई कहानी कोई किस्से उनके लिए, जिसने अपने हाथों के स्वाद से, अपने व्यवहार से, पीढ़ी-दर-पीढ़ी को तृप्त किया और सँवारा है ! बल्कि उन बूढ़ी होती काया पर आधुनिक न होने का प्रश्न चिन्ह लगाया है !! सभी को खुश रखना, सदा सबका आभार जताते रहने में सारी उम्र बिता दी ! समय ऐसा भी आया नहीं कोई और अम्मा, उन बूढ़ी अम्मा के पद चिन्हों को ग्रहण करना चाहती, नहीं आत्मसात करना चाहती उनके सद्गुण भरे आचरण को, क्यूँ की इनकी योग्यता की कोई डिग्री, कोई प्रमाणपत्र नही...
जीव की करूण पुकार
कविता

जीव की करूण पुकार

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** आया पावन गणेश चतुर्थी का त्यौहार, सबको मिले जीवन मे खुशियां अपार! हम भी चाहें थोड़ा सा स्नेह, हे गणपति करो हम पर ये उपकार!! शिव-शक्ति के पुत्र कहलाते, सर्वप्रथम पूजे जाते, मूषक तुम्हारा वाहन होता सहनशीलता का संदेश है देता! गजराज बन पूजे जाते, पर्व ''त्यौहार" में सजाये जाते, फिर क्यों जंजीरों में जकड़े जाते, ये कैसी श्रद्धा कैसी पूजा हम सब भी ये समझ न पाते?? मानव करते क्रूर आघात, इतनी घृणा और अत्याचार, तड़पते घुटते, तिल-तिल मरते, नित प्रतिदिन होता हमारा तिरस्कार, अब तुम ही करो गणपति हमारा उद्धार!! अहंकार, द्वेष, घृणा से परे, एक सुन्दर दुनिया है हमारी, घोर विपदा हम पर है आई क्यूँ हमारे अस्तित्व पर बन आई! अब तुम ही हो हमारे खेवनहार हे गणपति तुम ही करो दुःख का निस्तार!! नही...
सहचर
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सहचर

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** मैं चाहूँ और कोई आ जाए, बिना कुछ पूछे, बिना कोई सवाल किए मात्र इसलिए कि हमने चाहा है! जब कि सच्चाई है कि हमने खुद को कभी वक़्त नहीं दिया, खुद से खुद की कोई बात नहीं की! जीवन के अकेलेपन में मेरी आत्मा में मेरा अस्तित्व बिखर रहा होता है बिना कोई शोर बिना कोई आवाज किए!! क्या कोई स्नेह से मुझे सहला सकता है क्या कोई मेरे सिरहाने बैठ कर मुझमे मेरा विश्वास जगा सकता है?? मुझे सूकून से अपने सानिध्य में सुला सके ये आभास करा कर कि सब अच्छा होगा! क्या कोई ऐसा कर सकता है? हैं, मेरे चार पंजों वाले सहचर, हमारी गतिविधियों से हमारा सुख-दुख समझ सकते हैं, बिना स्वार्थ हमारी पीड़ा, मन का शोर बांट लेते हैं, उनके साथ उनके निस्स्वार्थ प्रेम में हम सूकून से सो सकते हैं!! परिचय :- श...
अब स्वीकर करो हमको
कविता

अब स्वीकर करो हमको

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** अब स्वीकर करो हमको जीने का अधिकार मिला है, हम करते हैं स्नेह तुमसे ... आक्रमक नहीं है हम, असीम ... अनंत प्रेम, मानव से फिर क्यूँ प्रहार होता हम पर!! सदा निवेदन रहा हमारा हमे आजादी से जीने दो! खुली हवा में हम सबको स्वच्छंद किलोल करने दो!! शीतल मलय बन समा पाए तुम्हारे हृदय स्थल में, इतनी सी अभिलाषा है मन मे हमको भी थोड़ा स्नेह दे दो!! हम हैं निश्छल-कोमल, पावन मृदुलता से भरे हुए, बस एक बार अपने दिल मे थोड़ी सी जगह देदो!! यह क्रोध नफरत का सैलाब जो तुमसे होकर हम पर गुजरता है, उसको स्नेह के बंधन मे अब तो बंध जाने दो !! स्नेह-करुणा पाकर तुमसे जी उठें हम इस जग में, माणिक्य मोतियों की भाँति हमको भी समाज मे सजने दोl मैं ऋणी रहूँगा आजीवन, अविराम, तुम्हारा कर्म बनकर, दुआ ही दुआ दे...
उस पार
कविता

उस पार

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** क्या होगा मृत्यु के बाद उस पार जब बुझ जायेंगें आँखों के दिए क्या उजाला दिख पाएगा उस पार?? जब धड़कने शांत हो जाएंगीं, जितना जीवन जी लिया, क्या उतना ही मरना होगा, क्या जिया जीवन साथ ले जाना होगा उस पार?? क्या कर्म किया क्या धर्म था, यह सब भी निभाना होगा उस पार? क्या यात्रा की तैयारी कर जाना होगा जैसे जीवन भर सहेजते रहे, बटोरते रहे, समान बांधते रहे जरूरी चीजों के हर यात्रा पर कुछ जरूरी बाँध कर ले जाना होगा उस पार?? बही खाता, हिसाब-किताब में जीवन बिताया कुछ थोड़ा खुद मरे कभी कोई निर्दोष मरा ये सारी वसीयत भी ले जाना होगा उस पार?? सच-झूठ, राग द्वेष की परिभाषा नासमझ बन समझता रहा ये जीवन क्या इसका अर्थ समझ आएगा उस पार? जीवन के बाद मृत्यु तय है किसकी जीत होगी किसकी हार जीत परमा...
जीवों की आजादी
कविता

जीवों की आजादी

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** खुश हो लो फिर आज आजाद देश मे आजाद हो तुम, दर्द, भूख, गुलामी से अब भी तड़प रहे हैं हम!! तुम जैसे ही जीव हैं हम, तुम जैसा ही है जीवन, क्यूँ हमको नित आहत करते हो क्यूँ कैद में हमको रखते हों?? जिव्हा को क्षणिक स्वाद मिले हम सबका रक्त बहाते हो, कैसे मानव हो तुम, किस मानवता का धर्म निभाते हो???? शनि राहु केतु के डर से हमे पूजने आते हो कभी श्वान, काग, की रोटी, कभी गाय को ढूंढा करते हो! स्वार्थ सिद्ध के लिए ईश्वर को भी धोखा देते हो, मंदिर, पूजा- हवन के बाद हमारा भक्षण करते हो?? सर्कस और चिड़िया घरों जैसे कारावास में हमको रखते हों मन बहले तुम मानव का, कोड़े हम पर बरसाते हो, दर्द और पीड़ा से भरे हम, फिर भी हमको तुम हँसाते हो!! सदियाँ बीत रही पिंजरे में कब खुली हवा में उड़ पाएंगे, आज...
बचपन की मस्ती
कविता

बचपन की मस्ती

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** माँ का आंचल पिता के कंधों का सफर कितना प्यारा था, किस्से कहानियां का दौर था, ऐसा अनमोल बचपन हमारा था! छोटी सी बात पर रूठना-चिल्लाना था, फिर कट्टी कर खुद ही मान जाना था! वो सुनहला सफर था बचपन सुहाना था! आंगन में नीले अम्बर तले नानी कहानियां सुनाती थी, भूत के झूठ-मूठ के किस्से से वो भी डर जाती थी ! छपाक-छपाक बारिश में कीचड़ उड़ाते मिट्टी और कीचड़ का उबटन लगाते ना माँ के डांट की चिंता ना पापा के गुस्से की फ़िकर थी, स्कूल की छुट्टी का उत्सव मनाते थे!! वो बचपन की मस्ती, मासूमियत की बस्ती थी, सराबोर बारिश में खुद को भिगोते मिट्टी से सने कपड़ों में थके माँ की गोद में ही सो जाते थे, अम्माँ की लोरी पापा भी गुनगुनाते थे! पेड़ों की डालों का झुला बनाते, गिल्ली-डंडे और ...
मायका केवल एक घर नहीं होता
कविता

मायका केवल एक घर नहीं होता

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** मायका केवल एक घर नहीं होता वो एक ऐसी जगह होती है, ऐसा ठिकाना जहाँ एक बेटी खुद को 'बस बेटी' समझ सके।" मायका वो अहसास होता है जहां बेटियाँ खुद से जुड़ सकें, जिन सपनों को उनकी आँखों ने देखा था उसको पूरा कर सकें! जहाँ वो बिना किसी संकोच या औपचारिकता के, मनचाहे आरामदायक कपड़े पहन सकें… जहाँ दिन की शुरुआत घड़ी के अलार्म से नहीं, बल्कि माँ-पिता की मीठी शुभ प्रभात से हो… जहाँ नींद अधूरी नहीं रहती, और सुबह की कोई आपाधापी नहीं होती, चाय की गर्म प्याली उसका इंतजार करती! मायके का दरवाज़ा उनके लिए दुनिया का सबसे सुरक्षित कोना होता है जहाँ वो सूकून से अपने भविष्य के सपने बुन सकती हैं! जहाँ न उन्हें कोई किरदार निभाना होता है, न किसी की उम्मीद पर खरा उतरना होता है। वहाँ वो रिश्तों में ...
सावन में भीगी मेरी गौशाला
कविता

सावन में भीगी मेरी गौशाला

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** सावन की बारिश में भीगी गौशाला, पीपल, नीम, बरगद की शाला, झूमे हर जीव बन के मतवाला, अद्भुत निराली, अनुपम गौशाला!! उन्मुक्त पवन के झोंके निराले, सारे जीव लगते है बड़े न्यारे! रिमझिम बरखा की पड़ती फुहार, नन्हें गौ वंशों की रूनझुन बयार! सावन की सोंधी मिट्टी की खुशबु, चूल्हे पर सेंकते भुट्टे की सुवास, अभावों के बीच भी सौंदर्य है अपार खुशियाँ बरसती यहाँ अपरम्पार! हरी भरी खेतों की क्यारी निराली, सावन की सोंधी खुशबु से फैली हरियाली! गौशाला का जीवन है कितना पावन, हर एक जीव में मिलता अपनापन!! बरसती यहां सिर्फ करुणा और स्नेह, यहाँ आके सबको मिलता है प्रेम! माटी की जड़ में जहाँ बसते हैं रिश्ते, देवी-देवता यहां हर रंग-रूप मे बसते! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश क...
वैराग्य का मौन
कविता

वैराग्य का मौन

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** थक चुकी है वो मग़र, ना रिश्तों के बोझ से ना जिम्मेदारियों से वो थकी है खुद के भीतर के शोर से ! उसे कोई शिकायत नहीं, कोई प्रश्न नहीं, सूख चुकी है उसके भीतर की नदी जो निर्मल बहा करती थी अब वो स्थिर शांत हो गई है ! कुछ पल चाहती है जिंदगी से सिर्फ अपने जीवों लिए उन पलों में वो जी भर के उनको प्यार करना चाहती है, उनके चेहरे की मुस्कान बनना चाहती है ! कभी पत्नी, कभी माँ, कभी बेटी बनकर जो निभाये थे कर्तव्य उसने, मित्र बनकर जोड़ा था टूटे दिलों को उसने धूमिल पड़ चुके है उनके रंग और रिश्तों की चमक, नहीं है शेष कोई उल्लास कोई अभिलाषा उसकी !! ढूँढ रही है कुछ ऐसे पल जिसमें" वो "केवल वो "रहे, ना "किसी की" ना "कोई" बन जीना चाहती है ! अब ना आँसू बचे थे, ना मुस्कराने की कोई चाहत, बस है...
वो एक पवित्र आत्मा है
कविता

वो एक पवित्र आत्मा है

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** इस से अद्भुत पल और क्या हो सकते हैं, दिल की गहराइयों के साथ, अपने पालतू सहचर के साथ प्यार से घिरे रहना ! इन शांत क्षणों में कोई शर्त नहीं कोई निर्णय नहीं केवल एक पवित्रता और विश्वास का आभास! वो विश्वास जो कभी डगमगाता नहीं वो ऐसा साथी जो बदले में कुछ मांगता नहीं! वो ऐसा साथी जो हमे सब्र की परिभाषा सिखाता है, सिर्फ, प्यार बांटना जानता है ! उससे बंधी स्नेह की डोर कभी कमजोर नहीं पड़ती, वो रिश्तों में ठहराव जानता है, हमसे हमारी पहचान कराता है, वो इंसान से कहीं कई गुना अनमोल है, क्योंकि वो एक "जानवर" है, वो पवित्र आत्मा है !! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोम...
सपने में स्वप्न देखती हूँ
कविता

सपने में स्वप्न देखती हूँ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** सपने में स्वप्न देखती हूँ, एक दृश्य जिसमें पीड़ा, घुटन और विरक्ति, कहीं कहीं उन्माद है, गहरी खामोशी है ! मैं मेरे विचारों से टकरा रही हूँ ! सपने में जो भी साथ दे, मैं खुद को उसका आभारी समझूँगी, सपनों का विचारों का द्वंद बढ़ता जा रहा है, फिर भी मैं भयभीत नहीं हूँ, हारी नहीं हूँ ! किसी प्रकाश की चाहत है, मुझे खोने का, टूटने डर नहीं है ! अचानक सपने में उम्मीद की किरन से भर उठती हूँ, एक प्रार्थना के शब्द कानो में फुसफुसा रहे है, क्यूँ स्वयं के अस्तित्व को गले लगाना मोह में उलझना, अचानक जाग जाती हूँ, पुनः विचारों में उलझ जाती हूँ, स्वयं से प्रश्न पूछती हूँ, ये स्वप्न था या कोई दुःस्वप्न क्या है ये स्वयं का अस्तित्व, क्या है मोह?? स्वप्न अधूरा है, या अर्थ? सोच को दृढ़ ...