गणतंत्र का नया व्याकरण
अभिषेक मिश्रा
चकिया, बलिया (उत्तरप्रदेश)
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न मैं शब्दों का सौदागर, न मैं कोई नेता हूँ,
मैं सदियों की ख़ामोशी का, गहरा सन्नाटा हूँ।
मैं वो पन्ना हूँ संविधान का, जो अब तक अधूरा है,
मैं वो सपना हूँ आज़ादी का, जो न आधा न पूरा है।
तुम जश्न मनाते ऊँचाई पर, मैं नींव की ईंटें ढोता हूँ,
तुम फहराते हो झंडा, मैं उम्मीदें लेकर बोता हूँ।
गणतंत्र तभी गरजेगा जब, कोई द्वार अंधेरे में न हो,
इन्साफ़ की पावन राहों में, कोई रुकावट घेरे में न हो।
अब इतिहास के बासी पन्नों पर, मैं स्याही नहीं बहाऊँगा,
मैं वर्तमान की मुट्ठी में, अपना भविष्य सजाऊँगा।
यही भविष्य अब भारत की, नई परिभाषा लिखेगा,
नभ की हर एक ऊँचाई पर, अब मेरा तिरंगा दिखेगा!
मेरा तिरंगा अब सिर्फ़ अम्बर का, शृंगार नहीं कहलाता,
ये महाशक्ति बन चुके भारत का, 'विजय-पत्र' है कहलाता।
केसरिया अब शौर्य की सीमा, तोड़ आगे बढ़ ...

