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Tag: चित्रलेखा व्यास

हिंदी से मेरी बातचीत
कविता

हिंदी से मेरी बातचीत

चित्रलेखा व्यास कानोड़, उदयपुर (राजस्थान) ******************** मैंने पूछा- “हिंदी! कहो, क्या तुम्हें कभी राष्ट्रभाषा कहा जाएगा?” वह मुस्कुराई- “नहीं, अभी तो मेरे हिस्से में बस प्रतीक्षा का वनवास है।” मैंने फिर पूछा- “फिर तुम्हारा भविष्य क्या है, कहाँ तक जाएगी तुम?” बोली- “जहाँ तक अपनी मिट्टी की गंध को संजोए मनुष्य जाएगा, मैं भी वहीं रहूँगी।” संस्कृत की गोद से निकली, प्राकृत की गलियों में पली, अपभ्रंश की देहरी लाँघकर, जन-जन की वाणी बनी, कबीर की साखी और तुलसी के मानस में ढलकर। पर सत्ता के गलियारों में पराई चमक ने जब अपना सिंहासन सजाया, तब अपने ही घर में मुझे कभी-कभी मौन, उपेक्षित और विस्मृत पाया। मैंने पूछा- “हिंदी, तुम बीच राह में कहाँ गुम हो गई थीं?” वह बोली- “गुम नहीं हुई थी, तुम्हारी ज़ुबानों पर चुपचाप जीवित थी।” “तुमने मुझे बाज़ार में छोड़ा...
समझौता
कहानी

समझौता

चित्रलेखा व्यास कानोड़, उदयपुर (राजस्थान) ******************** विंध्याचल की पहाड़ियों पर उस दिन धूप कुछ फीकी-सी थी। मंदिर की सीढ़ियों के बाहर लाजो चुपचाप बैठी थी। सामने घंटियाँ लगातार बज रही थीं- टन...टन...टन... हर एक घंटी की आवाज़ जैसे उसके भीतर उतरकर किसी बंद दरवाज़े को खटखटा रही थी। लाजो मिर्जापुर की रहने वाली थी। उम्र बहुत नहीं थी, मगर आँखों में जाने कितने मौसम उतर चुके थे। वह मंदिर के बाहर बैठी उन घंटियों को सुनते हुए सोच रही थी- क्या ईश्वर के घर में भी किसी लड़की की इच्छा की कोई आवाज़ पहुँचती है? तभी मंदिर के भीतर से पुजारी ने उसे आवाज़ दी। “बेटी, दर्शन कर लो।” वह उठी। माथे पर आँचल खींचा और माँ विंध्यवासिनी के सामने जा खड़ी हुई। आँखें बंद कीं तो मन में कोई प्रार्थना नहीं थी, केवल एक प्रश्न था- “माँ, मेरी जिंदगी का रास्ता मुझे चुनने दोगी?” दर्शन करके वह गंगा किनारे च...