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Tag: डॉ.आभा माथुर

कैसे बताऊँ …?
संस्मरण

कैसे बताऊँ …?

डॉ. आभा माथुर उन्नाव (कानपुर) ********************  न जाने मुसीबतें स्वयं मुझे ढूंढ लेती हैं या मैं उन्हें बुला लेती हूं. यह घटना १९६५ या १९६६ की है । मैंने १९६५ में लखनऊ विश्वविद्यालय से एम्.एड किया था. आगे एम .एड. करने की इच्छा थी परंतु लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.एड नहीं करना चाहती थी क्योंकि लखनऊ विश्वविद्यालय से एम्.एड. करने वालों को अधिकतर तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण होते देखा था। इसी ऊहापोह में एडमिशन का समय निकल गया। मैंने अगले वर्ष एम्.एड करने का मन बना लिया था, तभी एक परिचित लड़की मेरे पास आई। उसने बताया कि एक जूनियर हाई स्कूल उसी वर्ष हाई स्कूल कक्षाएं चालू करना चाहता था। परंतु उन्हें ऐसी शिक्षिका नहीं मिल रही थी जो ट्रेंड भी हो और उसके पास बी.ए. में अंग्रेजी विषय भी हो। बता दूं कि वह छोटा नगर अर्थात बदायूं था। उस जमाने में वहां केवल इंटरमीडिएट तक कॉलेज उपलब्ध थे। अतः अच्छ...
दादी का गांव
कविता

दादी का गांव

डॉ. आभा माथुर उन्नाव (कानपुर) ******************** सुबह हो गई मीठी-मीठी लाली छाई चारों ओर चीं-चीं, चूं-चूं, काँव-काँव का सारे नभ में छाया शोर आशु उठा अँगड़ाई लेकर जल्दी उसे नहाना है नाश्ता कर बस्ता लेकर जल्दी स्कूल जाना है तभी उसे आ गई याद कल दीदी की कही बात कल से गर्मी की छुट्टी है एक मास की छुट्टी है मन उड़ गया सैर करने लगा गगन में मन उड़ने "पक्षी चूँ-चूँ क्यों करते हैं? क्या यह हमसे कुछ कहते हैं?" उसने पूछा कौए भाई तुम काँव-काँव क्यों करते हो? जो कहना है स्पष्ट कहो, संकेतों में क्यों कहते हो?" कौआ बोला काँव-काँव आशु चलो दादी के गाँव गाँव में दादी रहती हैं राह तुम्हारी तकती हैं कल से गर्मी की छुट्टी है एक मास की मस्ती है आशु गया मम्मी के पास बोला "मम्मी सुन लो बात कल से गर्मी की छुट्टी है एक मास की मस्ती है दादी के घर जाना है नदी में ख़...
मेरी साइकिल, मेरा भविष्य
संस्मरण

मेरी साइकिल, मेरा भविष्य

डॉ. आभा माथुर उन्नाव (कानपुर) ******************** मैंने जिस शहर में बचपन व्यतीत किया वहाँ पर उन दिनों इण्टरमीडिएट तक ही विद्यालय थे। आगे की शिक्षा के लिये या तो प्राइवेट विद्यार्थी के तौर पर परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती थी या छात्रावास में रह कर अध्ययन करना होता था। मेरी बड़ी बहनों ने प्राइवेट बी.ए. किया था, शायद मैं भी वही करती परन्तु हाई स्कूल और इण्टरमीडियेट में मेरे अंक बहुत अच्छे होने के कारण यह निश्चय किया गया कि मुझे किसी संस्था से बी.ए. करवाया जाये। लखनऊ में मेरी एक बहन रहती थीं अत: लखनऊ में मेरी शिक्षा जारी रखने का निश्चय हुआ। लखनऊ जा कर वि.वि. में प्रवेश तो ले लिया पर बहन के घर से वि.वि. बहुत दूर था। पहले दो किलोमीटर तक रिक्शा से दूरी तय करने के बाद दो बसें बदलनी पड़ती थीं तब जा कर वि.वि. पहुँचा जा सकता था। इस सब में बहुत समय नष्ट होता था अतः साइकिल लेने का निश्चय किया...