Wednesday, July 15राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

Tag: डॉ. संध्या शुक्ल ‘मृदुल’

बरखा का उपहार
कविता

बरखा का उपहार

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** मेघों से फिर अंबार भरा, रिमझिम हो रही फुहार। सकल धारा को है मिला, बरखा का यह उपहार। सोंधी माटी की खुशबू, फैल रही है चहुं ओर। जंगल में मंगल हुआ, थिरक रहे अब मोर। सारे बंधन को तोड़कर, नदिया बह रही स्वतंत्र। जल का विराट स्वरूप, दिखता यत्र तत्र सर्वत्र। रीते रीते सब भर गए, खेत और खलिहान। धान बुआई का फिर, शुरू हुआ अभियान। वर्षा की नन्ही बूंदों से, चहुंओर छाई हरियाली, कृषकों के घर आंगन में, फिरसे आई खुशियाली। प्यासी धरती की देखो, अब बुझ गई है प्यास। कुम्हलाए हुए वृक्षों में, फिर आई अब श्वास। दादुर औ पपीहा ने किया, फिर बरखा का आगाज धानी चुनरिया ओढ़कर, निखरी है वसुंधरा आज। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हि...
बरखा की आस
कविता

बरखा की आस

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** दिनकर की किरणों का, फैला चहुं ओर है ताप। गर्मी और उमस का है, झेल रहा मानव संताप। धरती का अंतस फटा। चुभ रहे हृदय में शूल। आसमां से नाता तोड़, बदरा गए रास्ता भूल। वृक्षों पर बैठे पंछी भी, रहे सभी हैं अकुलाय। अमवा की डाल-डाल, कोयल रही है बौराय। उमस भरे से दिन लगे, अब शीतल भई शाम। शीतल जल और पेय, भाने लगे अब आम। ताल तलैया सब सूखे, नदिया रही हैं सुखाय। गर्मी औ उमस से अब, जियरा रहा अकुलाय। गर्मी से नित बढ़ रही, वातावरण में है तपन। गर्म हवा लू लपटों से, तन में लग रही अगन। टूट रहा पल-पल अब, मानव मन का विश्वास। जेठ मास में है लग रही, अब बरखा की है आस। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति म प्र., ...
चलो चले भैया हम गांवों की ओर
कविता

चलो चले भैया हम गांवों की ओर

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** पीपल की छैंया और अमुआ की बोर, खटमिट्ठी अमिया ले आमराई से झोर, चलो चलें भैया हम गांवों की ओर। टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी जाए खेतों की ओर, कुहू कुहू गूंजे जहां कोयल का शोर, चलो चलें भैया हम गांवों की ओर। सुरभित सुहानी सी लगे जहां नित भोर, शीतल समीर बहती जहां चहुं ओर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। इठलाती बलखाती बहे नदी जिस ओर, ममता की छांव में सोंधी रोटी के कौर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। गूंजे गीता की वाणी गूंजे अजान चहुं ओर, मंदिर में गूंजे है घंटों का शोर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। प्रीति का पराग झलके जहां पोर पोर, संस्कृति के रंग जहां बिखरे चहुं ओर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय ...
मैं भारत की नारी हूं
कविता

मैं भारत की नारी हूं

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** फूलों से कोमल मैं दिखती, शोला और चिनगारी हूं। मैं भारत की नारी हूं।। घर आंगन को हूं महकाती, पावन उपवन क्यारी हूं। मैं भारत की नारी हूं।। सृष्टि की मैं सुंदर सुंदरतम कृति, लगती बड़ी ही प्यारी हूं। मैं भारत की नारी हूं।। सीता सति और सावित्री, इंदिरा और गांधारी हूं। मैं भारत की नारी हूं।। अबला नहीं मैं सबला हूं, हर नारी से भारी हूं। मैं भारत की नारी हूं।। सृष्टि की मैं ही हूं रचयिता, जगत जननी प्यारी हूं। मैं भारत की नारी हूं।। करुणा और त्याग की मूरत, संघर्षों से कभी न हारी हूं। मैं भारत की नारी हूं।। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति म प्र., जिला संयोजक- मध्यप्रदेश राष्ट्र भाषा प्रचार समिति मंड...
होली के रंग मस्ती के संग
कविता

होली के रंग मस्ती के संग

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** मौसम हुआ है फागुनी, फागों पर छाया शवाब। हरम मन में सजने लगे, फिर रंग-बिरंगे ख्वाब। हर कली को है चूमता, चंचल भ्रर सदाबहार। फिजाओं में है घुल रही, देखो अब बसंती बयार। गली-गली में हो रही, अब रंगों की बरसात। रंग-बिरंगे से दिन हुए, हुई मस्ती वाली रात। बहके बहके से कदम, हो गई नशीली चाल। भंग की मस्ती में अब, तन मन हुए हैं बेहाल। अंगारों सा दहक उठा, गोरी का तन है आज। सुध बुध है बिसराय के, भूल गई वो सब काज। भींग गई लहंगा चोली, भींग गई चुनरी आज। गोरी का घूंघट सरका, तज करके सारी लाज। मुखड़ों पर हैं सज रहे, अब इंद्र धनुषी ये रंग। हुलियारी टोली निकली, फिर से मस्ती के संग। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हिंदी से...
लो बसंत के दिन अब आए
कविता

लो बसंत के दिन अब आए

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** सरसों फूले टेसू महके, आम्र तरु मंजरी बौराए, लो बसंत के दिन अब आए। कोयल कूके मयूर है नाचे, भ्रमर कलि संग गुनगुनाए, लो बसंत के दिन अब आए। बासंती बयार सखि को, प्रिय का संदेश पहुंचाए, लो बसंत के दिन अब आए। हरियाली और पुष्पों से, प्रकृति का दामन भर जाए, लो बसंत के दिन अब आए। मदमस्त बसंत के मौसम में, सजनी साजन संग सुहाए। लो बसंत के दिन अब आए। चहुं दिशाएं सुरभित हो जाए, प्रकृति संग मानव हर्षाए, लो बसंत के दिन अब आए। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति म प्र., जिला संयोजक- मध्यप्रदेश राष्ट्र भाषा प्रचार समिति मंडला। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौल...