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Tag: दिनेश शर्मा ‘डीन सा’

शतरंज के मोहरे की तरह हो गयी ये जिंदगी…
कविता

शतरंज के मोहरे की तरह हो गयी ये जिंदगी…

दिनेश शर्मा 'डीन सा' भीलवाड़ा (राजस्थान) ******************** बिछी हुई बिसात की तरह करते हुए नुमाइंदगी शतरंज के मोहरे की तरह हो गयी ये जिंदगी। मन का यह सुंदर सफेद घोड़ा चलता रहता है सदा ढाई चाल मचल-मचल कर खुद होता बेहाल। सिपाही बना संकल्प मन के घोड़े पर हुआ सवार करता है कोशिश चले सदा सीधा पर अपने ही टेढ़े पन से होता सब बेकार। इच्छा रूपी ऊंट को जिंदगी के इस अंतहीन रेगिस्तान में मिलता नही कोई जब सहारा केवल भागना ही विकल्प है यह सोचकर मन मसोस कर रह जाता बेचारा। गज बना देह का आलस्य हिलता डुलता कभी मचलता किये हो जैसे सूरा पान कभी है चलता अधिक है रुकता चल रहा मतवाली चाल। और जिसको थी इन्हें डालनी जंजीर ऐसा इक वो बुद्धि रूपी वजीर रख नही सका इन पर कोई अंकुश लगा विचरने खुद धरा के चारो कोनो में निरंकुश। शत्रु की तरह लगे ये सभी दिन-रात देने अपने जीवन दाता देह रूपी बादशाह को शह-मात। ऊंचे-नीचे, ख...
गुरु
कविता

गुरु

दिनेश शर्मा 'डीन सा' भीलवाड़ा (राजस्थान) ******************** गुरु है तो हर मार्ग सुगम है गुरु बिन ये जीवन दुर्गम है। पाया है जो सब कुछ हमने कर्म समर्पित सारे सपने। दाता गुरु के सिवा कौन है जग में गुरु सम ओर कौन है। ईश्वर के अवतार श्रेष्ठ भी राम कृष्ण से धर्म स्थापक। गुरु के बिना नही सम्भव था बन सकते दनुज कुल घातक। आरुणि, उपमन्यु, एकलव्य चन्द्रगुप्त से शिष्य महान। धौम्य, द्रौण, चाणक्य ही थे गुरुवर इनके श्रेष्ठ महान। गुरु 'समर्थ' की कृपा से ही शिवा हुए युद्ध प्रवीण। लौटाया गौरव भारत का मुगलो ने जो किया था क्षीण। रामकृष्ण की ज्ञान भक्ति का फैला अनुपम तेज पुनीत। बन कर विश्व शांति की वाणी विवेकानंद बने नवनीत। अपने सिख को बिना मोल के स्वार्थ त्याग सर्वस्व समर्पण। दीन हीन की सेवा में रत जीवन जीना जो सिखलाता। ऐसे गुरु के चरणों मे ही यह सारा त्रिलोक समाता। भारत देश यह पावन अपना गुरु शिष्य ...