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Tag: रामनारायण सुनगरिया

भटकन ही भटकन
आलेख

भटकन ही भटकन

रामनारायण सुनगरिया भिलाई, जिला-दुर्ग (छ.ग.) ******************** यह ऐसी स्थिति होती है कि कोई भी मृगमरीचिका की तरह दिग्‍भ्रमित होकर इधर-उधर डोलता रहता है। कुछ भी निर्णय लेने में अपने आपको अक्षम पाता है। किसी भी स्थिति में उसे विश्‍वास अपने घेरे में नहीं ले पाता। हर जगह अनिश्‍चय ही अनिश्‍चय प्रतीत होता है। किसी भी व्‍यक्ति, किसी भी सिद्धान्‍त, किसी भी परम्‍परा, किसी भी हालात इत्‍यादि पर वह स्‍पष्‍ट स्थिरता नहीं रख पाता है। इन अदृश्‍य बन्धनों में हम ऐसे जकड़ते चले गए। उन कारणों को ज्ञात करना आज अत्‍यावश्‍यक प्रतीत होता है तथा उन पर अंकुश लगाना हर विचारवान नागरिक का सामाजिक दायित्‍व हो गया है। आज जहॉं-जहॉं छोटे-बड़े स्‍वार्थपरक समूह गठित हो गए है, जो स्‍वलाभ के लिए समाज के शाश्‍वत मूल्‍यों को दीमक की तरह चाट रहे हैं। इनकी सक्रियता हर क्षेत्र में व्‍याप्‍त होती जा रही है। धर्मो के विशेषज...
सिस्‍टम
लघुकथा

सिस्‍टम

रामनारायण सुनगरिया भिलाई, जिला-दुर्ग (छ.ग.) ******************** सत्रह साल बाद। मोटे कॉंच के द्वार को पुश करता हुआ बैंक में प्रवेश करता हूँ, तो ऑंखें चौंधिया जाती हैं। सारा नज़ारा ही अत्‍याधुनिक हो चुका है। सबके सब अलग-अलग पारदर्शी केबिन में अपने-अपने कम्‍प्‍यूटर की स्‍क्रीन पर नज़रें गढ़ाये तल्‍लीनता पूर्वक व्‍यस्‍त हैं। किसी को किसी से कोई वास्‍ता नहीं। ऐसा लगता है बैंक की सम्‍पूर्ण कार्यप्रणाली स्‍वचलित हो गई है। कोई-कोई काम मेन्‍युअल हो रहे हैं। वह भी पूर्ण शॉंतिपूर्वक। मैंने प्रत्‍येक यंत्रवत् व्‍यक्ति को गौर से देखा—एक भी परिचित नहीं। सभी युवा एवं सुसम्‍पन्‍न लगते हैं। मेरी खौजी नज़रें एक केबिन पर चिपके चमचमाते नेम प्‍लेट पर पड़ी—हॉं यही है चीफ मैनेजर सभ्‍य, सौम्‍य व आत्‍मविश्‍वासी प्रतीत होता है। मैंने अपनी एप्‍लीकेशन को खोलकर पुन: पड़ा कहीं कोई कुछ छूट तो नहीं गया। सारान्‍स ब...