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Tag: संगीता शुक्ला ‘स्वरा’

रोटी: “एक मुकम्मल दास्तां”
कविता

रोटी: “एक मुकम्मल दास्तां”

संगीता शुक्ला 'स्वरा' शहडोल (मध्यप्रदेश) ******************** तपते हुए सूरज का मंज़र है रोटी, मज़दूर के हाथों का ज़ेवर है रोटी। जो तोड़ता है दिन भर पत्थर, उसके पसीने का ही तेवर है रोटी। फटी हुई जेबों का मुक़द्दर है रोटी, सब्र की देहरी पर सबसे सादर है रोटी। तपती हुई भट्टी के बाहर है दुनिया, मगर चूल्हे की आग के अंदर है रोटी। छालों भरी हथेलियों की जुबानी है ये, थकी हुई आँखों का समंदर है रोटी। न सोने की चाहत, न चांदी की हसरत, गरीब के घर का तो कलंदर है रोटी। मिट्टी में दबकर जो सोना बनी है, मेहनत के बागों का अंबर है रोटी। महलों को क्या इल्म इसकी तपिश का, झोंपड़ी के लिए तो पैग़ंबर है रोटी। परिचय :  संगीता शुक्ला 'स्वरा' निवास : शहडोल (मध्यप्रदेश) संप्रति : साहित्यकार, मंचीय कवयित्री पुस्तक एकल संग्रह : स्वरा प्रवाहिनी चयनीत साहित्य अकादमी मध्य...
बस्ती का सच
कविता

बस्ती का सच

संगीता शुक्ला 'स्वरा' शहडोल (मध्यप्रदेश) ******************** यहाँ चेहरा नहीं, एक नकाब है, साज़िशों का ही अब हिसाब है। मुस्कुराना भी यहाँ एक आज़ाब है, नेक-दिली अब महज़ एक ख़्वाब है। पीठ का ज़ख़्म बहुत बेहिसाब है, दोस्त के हाथ में ही तेज़ाब है। हाथ मिलाना यहाँ अब खराब है, बगल में छिपा एक खंजर-ए-नायाब है। झूठी दुआओं का अपना शबाब है, हर शख़्स यहाँ बस एक सैलाब है। तू चुप रहकर देख 'स्वरा', यह जवाब है, दुनिया का सच अब खुली किताब है। परिचय :  संगीता शुक्ला 'स्वरा' निवास : शहडोल (मध्यप्रदेश) संप्रति : साहित्यकार, मंचीय कवयित्री पुस्तक एकल संग्रह : स्वरा प्रवाहिनी चयनीत साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश द्वारा, द्वितीय : मुक्तक संग्रह "स्वाति की बूंद", तृतीय संग्रह प्रकाशन पर- आचमन 'स्वरा' की, 23 सांझ संग्रह।। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिका...