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समझौता
कहानी

समझौता

चित्रलेखा व्यास कानोड़, उदयपुर (राजस्थान) ******************** विंध्याचल की पहाड़ियों पर उस दिन धूप कुछ फीकी-सी थी। मंदिर की सीढ़ियों के बाहर लाजो चुपचाप बैठी थी। सामने घंटियाँ लगातार बज रही थीं- टन...टन...टन... हर एक घंटी की आवाज़ जैसे उसके भीतर उतरकर किसी बंद दरवाज़े को खटखटा रही थी। लाजो मिर्जापुर की रहने वाली थी। उम्र बहुत नहीं थी, मगर आँखों में जाने कितने मौसम उतर चुके थे। वह मंदिर के बाहर बैठी उन घंटियों को सुनते हुए सोच रही थी- क्या ईश्वर के घर में भी किसी लड़की की इच्छा की कोई आवाज़ पहुँचती है? तभी मंदिर के भीतर से पुजारी ने उसे आवाज़ दी। “बेटी, दर्शन कर लो।” वह उठी। माथे पर आँचल खींचा और माँ विंध्यवासिनी के सामने जा खड़ी हुई। आँखें बंद कीं तो मन में कोई प्रार्थना नहीं थी, केवल एक प्रश्न था- “माँ, मेरी जिंदगी का रास्ता मुझे चुनने दोगी?” दर्शन करके वह गंगा किनारे च...