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Tag: विशाल त्रिवेदी “अल्पज्ञ”

शाल्मली: एक मौन सार्थकता
कविता

शाल्मली: एक मौन सार्थकता

विशाल त्रिवेदी "अल्पज्ञ" सेंधवा (मध्य प्रदेश) ******************** आकाश की नीलिमा को चुनौती देता, एक दरख्त खड़ा है नग्न शाखाओं पर सिंदूरी मशालें जलाए। उसे मलाल नहीं कि वह किसी के जूड़े की शोभा नहीं, न ही उसे दुख है कि देवताओं के चरणों तक उसका सफर नहीं पहुँचता। उसका सौंदर्य प्रदर्शन की वस्तु नहीं, वह तो एक 'होने' का उत्सव है। वह खिलता है तब, जब पतझड़ सब कुछ छीन लेता है, जब उम्मीद की टहनियाँ ठूँठ होने लगती हैं, तब वह रक्तिम आभा बनकर फूटता है- धैर्य का पर्याय बनकर। उसका धर्म किसी प्रशंसा का मोहताज नहीं, वह छाया नहीं देता, पर आश्रय देता है; वह खुशबू नहीं बाँटता, पर रंग भर देता है- उन रास्तों में, जिन्हें लोग 'सूखा' कह कर छोड़ देते हैं। उसकी सार्थकता उन पंछियों की चहचहाहट में है, जो उसकी ऊँचाई पर भरोसा करते हैं। सीखना हो तो सेमर से सीखें- कि समय पर ख...