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बाहर फागुन बौराया है
कविता

बाहर फागुन बौराया है

विशाल त्रिवेदी "अल्पज्ञ" सेंधवा (मध्य प्रदेश) ******************** बाहर फागुन बौराया है, मलय-पवन लहराती है पर भीतर की अगन अनकही, पल-पल मुझे जलाती है रंगों की इस भीड़-भाड़ में, मैं तनहा खड़ा रहूँ निगाहों में जलती इस होली का, बोलो अब क्या करुँ? यादों की समिधा सुलगी है, नयनों के इस कुंड में धुआँ-धुआँ सा हुआ जा रहा, मैं सपनों के झुंड में भीग रही है दुनिया सारी, केसरिया बौछार से मैं अपनी रुलाई को अब, हँस कर कैसे सहूँ? निगाहों में जलती इस होली का, बोलो अब क्या करुँ? अबीर गुलाल उड़ाते चेहरे, लगते हैं सब बेगाने मौन खड़ा हूँ अधरों पर मैं, लिए हज़ारों अफ़साने कोरे रह गए मन के पन्ने, बिन तेरे अनुराग के राख हुए इन अहसासों को, कब तक चुनता रहूँ? निगाहों में जलती इस होली का, बोलो अब क्या करुँ? परिचय :- . विशाल त्रिवेदी "अल्पज्ञ" निवासी : सेंधवा (मध्य प्रदेश) सम्प्र...