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Tag: श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी

जीव की करूण पुकार
कविता

जीव की करूण पुकार

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** आया पावन गणेश चतुर्थी का त्यौहार, सबको मिले जीवन मे खुशियां अपार! हम भी चाहें थोड़ा सा स्नेह, हे गणपति करो हम पर ये उपकार!! शिव-शक्ति के पुत्र कहलाते, सर्वप्रथम पूजे जाते, मूषक तुम्हारा वाहन होता सहनशीलता का संदेश है देता! गजराज बन पूजे जाते, पर्व ''त्यौहार" में सजाये जाते, फिर क्यों जंजीरों में जकड़े जाते, ये कैसी श्रद्धा कैसी पूजा हम सब भी ये समझ न पाते?? मानव करते क्रूर आघात, इतनी घृणा और अत्याचार, तड़पते घुटते, तिल-तिल मरते, नित प्रतिदिन होता हमारा तिरस्कार, अब तुम ही करो गणपति हमारा उद्धार!! अहंकार, द्वेष, घृणा से परे, एक सुन्दर दुनिया है हमारी, घोर विपदा हम पर है आई क्यूँ हमारे अस्तित्व पर बन आई! अब तुम ही हो हमारे खेवनहार हे गणपति तुम ही करो दुःख का निस्तार!! नही...
सहचर
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सहचर

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** मैं चाहूँ और कोई आ जाए, बिना कुछ पूछे, बिना कोई सवाल किए मात्र इसलिए कि हमने चाहा है! जब कि सच्चाई है कि हमने खुद को कभी वक़्त नहीं दिया, खुद से खुद की कोई बात नहीं की! जीवन के अकेलेपन में मेरी आत्मा में मेरा अस्तित्व बिखर रहा होता है बिना कोई शोर बिना कोई आवाज किए!! क्या कोई स्नेह से मुझे सहला सकता है क्या कोई मेरे सिरहाने बैठ कर मुझमे मेरा विश्वास जगा सकता है?? मुझे सूकून से अपने सानिध्य में सुला सके ये आभास करा कर कि सब अच्छा होगा! क्या कोई ऐसा कर सकता है? हैं, मेरे चार पंजों वाले सहचर, हमारी गतिविधियों से हमारा सुख-दुख समझ सकते हैं, बिना स्वार्थ हमारी पीड़ा, मन का शोर बांट लेते हैं, उनके साथ उनके निस्स्वार्थ प्रेम में हम सूकून से सो सकते हैं!! परिचय :- श...
अब स्वीकर करो हमको
कविता

अब स्वीकर करो हमको

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** अब स्वीकर करो हमको जीने का अधिकार मिला है, हम करते हैं स्नेह तुमसे ... आक्रमक नहीं है हम, असीम ... अनंत प्रेम, मानव से फिर क्यूँ प्रहार होता हम पर!! सदा निवेदन रहा हमारा हमे आजादी से जीने दो! खुली हवा में हम सबको स्वच्छंद किलोल करने दो!! शीतल मलय बन समा पाए तुम्हारे हृदय स्थल में, इतनी सी अभिलाषा है मन मे हमको भी थोड़ा स्नेह दे दो!! हम हैं निश्छल-कोमल, पावन मृदुलता से भरे हुए, बस एक बार अपने दिल मे थोड़ी सी जगह देदो!! यह क्रोध नफरत का सैलाब जो तुमसे होकर हम पर गुजरता है, उसको स्नेह के बंधन मे अब तो बंध जाने दो !! स्नेह-करुणा पाकर तुमसे जी उठें हम इस जग में, माणिक्य मोतियों की भाँति हमको भी समाज मे सजने दोl मैं ऋणी रहूँगा आजीवन, अविराम, तुम्हारा कर्म बनकर, दुआ ही दुआ दे...
उस पार
कविता

उस पार

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** क्या होगा मृत्यु के बाद उस पार जब बुझ जायेंगें आँखों के दिए क्या उजाला दिख पाएगा उस पार?? जब धड़कने शांत हो जाएंगीं, जितना जीवन जी लिया, क्या उतना ही मरना होगा, क्या जिया जीवन साथ ले जाना होगा उस पार?? क्या कर्म किया क्या धर्म था, यह सब भी निभाना होगा उस पार? क्या यात्रा की तैयारी कर जाना होगा जैसे जीवन भर सहेजते रहे, बटोरते रहे, समान बांधते रहे जरूरी चीजों के हर यात्रा पर कुछ जरूरी बाँध कर ले जाना होगा उस पार?? बही खाता, हिसाब-किताब में जीवन बिताया कुछ थोड़ा खुद मरे कभी कोई निर्दोष मरा ये सारी वसीयत भी ले जाना होगा उस पार?? सच-झूठ, राग द्वेष की परिभाषा नासमझ बन समझता रहा ये जीवन क्या इसका अर्थ समझ आएगा उस पार? जीवन के बाद मृत्यु तय है किसकी जीत होगी किसकी हार जीत परमा...
जीवों की आजादी
कविता

जीवों की आजादी

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** खुश हो लो फिर आज आजाद देश मे आजाद हो तुम, दर्द, भूख, गुलामी से अब भी तड़प रहे हैं हम!! तुम जैसे ही जीव हैं हम, तुम जैसा ही है जीवन, क्यूँ हमको नित आहत करते हो क्यूँ कैद में हमको रखते हों?? जिव्हा को क्षणिक स्वाद मिले हम सबका रक्त बहाते हो, कैसे मानव हो तुम, किस मानवता का धर्म निभाते हो???? शनि राहु केतु के डर से हमे पूजने आते हो कभी श्वान, काग, की रोटी, कभी गाय को ढूंढा करते हो! स्वार्थ सिद्ध के लिए ईश्वर को भी धोखा देते हो, मंदिर, पूजा- हवन के बाद हमारा भक्षण करते हो?? सर्कस और चिड़िया घरों जैसे कारावास में हमको रखते हों मन बहले तुम मानव का, कोड़े हम पर बरसाते हो, दर्द और पीड़ा से भरे हम, फिर भी हमको तुम हँसाते हो!! सदियाँ बीत रही पिंजरे में कब खुली हवा में उड़ पाएंगे, आज...
बचपन की मस्ती
कविता

बचपन की मस्ती

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** माँ का आंचल पिता के कंधों का सफर कितना प्यारा था, किस्से कहानियां का दौर था, ऐसा अनमोल बचपन हमारा था! छोटी सी बात पर रूठना-चिल्लाना था, फिर कट्टी कर खुद ही मान जाना था! वो सुनहला सफर था बचपन सुहाना था! आंगन में नीले अम्बर तले नानी कहानियां सुनाती थी, भूत के झूठ-मूठ के किस्से से वो भी डर जाती थी ! छपाक-छपाक बारिश में कीचड़ उड़ाते मिट्टी और कीचड़ का उबटन लगाते ना माँ के डांट की चिंता ना पापा के गुस्से की फ़िकर थी, स्कूल की छुट्टी का उत्सव मनाते थे!! वो बचपन की मस्ती, मासूमियत की बस्ती थी, सराबोर बारिश में खुद को भिगोते मिट्टी से सने कपड़ों में थके माँ की गोद में ही सो जाते थे, अम्माँ की लोरी पापा भी गुनगुनाते थे! पेड़ों की डालों का झुला बनाते, गिल्ली-डंडे और ...
मायका केवल एक घर नहीं होता
कविता

मायका केवल एक घर नहीं होता

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** मायका केवल एक घर नहीं होता वो एक ऐसी जगह होती है, ऐसा ठिकाना जहाँ एक बेटी खुद को 'बस बेटी' समझ सके।" मायका वो अहसास होता है जहां बेटियाँ खुद से जुड़ सकें, जिन सपनों को उनकी आँखों ने देखा था उसको पूरा कर सकें! जहाँ वो बिना किसी संकोच या औपचारिकता के, मनचाहे आरामदायक कपड़े पहन सकें… जहाँ दिन की शुरुआत घड़ी के अलार्म से नहीं, बल्कि माँ-पिता की मीठी शुभ प्रभात से हो… जहाँ नींद अधूरी नहीं रहती, और सुबह की कोई आपाधापी नहीं होती, चाय की गर्म प्याली उसका इंतजार करती! मायके का दरवाज़ा उनके लिए दुनिया का सबसे सुरक्षित कोना होता है जहाँ वो सूकून से अपने भविष्य के सपने बुन सकती हैं! जहाँ न उन्हें कोई किरदार निभाना होता है, न किसी की उम्मीद पर खरा उतरना होता है। वहाँ वो रिश्तों में ...
सावन में भीगी मेरी गौशाला
कविता

सावन में भीगी मेरी गौशाला

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** सावन की बारिश में भीगी गौशाला, पीपल, नीम, बरगद की शाला, झूमे हर जीव बन के मतवाला, अद्भुत निराली, अनुपम गौशाला!! उन्मुक्त पवन के झोंके निराले, सारे जीव लगते है बड़े न्यारे! रिमझिम बरखा की पड़ती फुहार, नन्हें गौ वंशों की रूनझुन बयार! सावन की सोंधी मिट्टी की खुशबु, चूल्हे पर सेंकते भुट्टे की सुवास, अभावों के बीच भी सौंदर्य है अपार खुशियाँ बरसती यहाँ अपरम्पार! हरी भरी खेतों की क्यारी निराली, सावन की सोंधी खुशबु से फैली हरियाली! गौशाला का जीवन है कितना पावन, हर एक जीव में मिलता अपनापन!! बरसती यहां सिर्फ करुणा और स्नेह, यहाँ आके सबको मिलता है प्रेम! माटी की जड़ में जहाँ बसते हैं रिश्ते, देवी-देवता यहां हर रंग-रूप मे बसते! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश क...
वैराग्य का मौन
कविता

वैराग्य का मौन

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** थक चुकी है वो मग़र, ना रिश्तों के बोझ से ना जिम्मेदारियों से वो थकी है खुद के भीतर के शोर से ! उसे कोई शिकायत नहीं, कोई प्रश्न नहीं, सूख चुकी है उसके भीतर की नदी जो निर्मल बहा करती थी अब वो स्थिर शांत हो गई है ! कुछ पल चाहती है जिंदगी से सिर्फ अपने जीवों लिए उन पलों में वो जी भर के उनको प्यार करना चाहती है, उनके चेहरे की मुस्कान बनना चाहती है ! कभी पत्नी, कभी माँ, कभी बेटी बनकर जो निभाये थे कर्तव्य उसने, मित्र बनकर जोड़ा था टूटे दिलों को उसने धूमिल पड़ चुके है उनके रंग और रिश्तों की चमक, नहीं है शेष कोई उल्लास कोई अभिलाषा उसकी !! ढूँढ रही है कुछ ऐसे पल जिसमें" वो "केवल वो "रहे, ना "किसी की" ना "कोई" बन जीना चाहती है ! अब ना आँसू बचे थे, ना मुस्कराने की कोई चाहत, बस है...
वो एक पवित्र आत्मा है
कविता

वो एक पवित्र आत्मा है

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** इस से अद्भुत पल और क्या हो सकते हैं, दिल की गहराइयों के साथ, अपने पालतू सहचर के साथ प्यार से घिरे रहना ! इन शांत क्षणों में कोई शर्त नहीं कोई निर्णय नहीं केवल एक पवित्रता और विश्वास का आभास! वो विश्वास जो कभी डगमगाता नहीं वो ऐसा साथी जो बदले में कुछ मांगता नहीं! वो ऐसा साथी जो हमे सब्र की परिभाषा सिखाता है, सिर्फ, प्यार बांटना जानता है ! उससे बंधी स्नेह की डोर कभी कमजोर नहीं पड़ती, वो रिश्तों में ठहराव जानता है, हमसे हमारी पहचान कराता है, वो इंसान से कहीं कई गुना अनमोल है, क्योंकि वो एक "जानवर" है, वो पवित्र आत्मा है !! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोम...
सपने में स्वप्न देखती हूँ
कविता

सपने में स्वप्न देखती हूँ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** सपने में स्वप्न देखती हूँ, एक दृश्य जिसमें पीड़ा, घुटन और विरक्ति, कहीं कहीं उन्माद है, गहरी खामोशी है ! मैं मेरे विचारों से टकरा रही हूँ ! सपने में जो भी साथ दे, मैं खुद को उसका आभारी समझूँगी, सपनों का विचारों का द्वंद बढ़ता जा रहा है, फिर भी मैं भयभीत नहीं हूँ, हारी नहीं हूँ ! किसी प्रकाश की चाहत है, मुझे खोने का, टूटने डर नहीं है ! अचानक सपने में उम्मीद की किरन से भर उठती हूँ, एक प्रार्थना के शब्द कानो में फुसफुसा रहे है, क्यूँ स्वयं के अस्तित्व को गले लगाना मोह में उलझना, अचानक जाग जाती हूँ, पुनः विचारों में उलझ जाती हूँ, स्वयं से प्रश्न पूछती हूँ, ये स्वप्न था या कोई दुःस्वप्न क्या है ये स्वयं का अस्तित्व, क्या है मोह?? स्वप्न अधूरा है, या अर्थ? सोच को दृढ़ ...
दहेज
कविता

दहेज

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** जब तुम मेरे घर आना, अपने साथ थोड़ा दहेज जरूर ले आना !! कुछ अटैची, कुछ बक्से जिनमे भरे हो तुम्हारे बचपन के खिलौने, तुम्हारे बचपन के कपड़े, छुटपन की अठखेलियाँ और सहजता साथ ले आना !! तुम्हारी पवित्र मुस्कराहट को शृंगार की डिब्बे में भर लाना, अपने चेहरे की आभा और स्वयं की दृढ़ता भी साथ ले आना !! कुछ बक्सों मे अपने संस्कार अपनी संस्कृति साथ भर लेना! थोड़ा प्रेम और करुणा का आभूषण भी जरूर ले आना !! कुछ अटैची में अम्माँ-बाबुजी का आशीर्वाद और परिवार की खूबसूरत बातेँ उनकी यादें साथ में सहेज लाना !! अपना दुःख और अपनी तकलीफें, साथ ले कर आना, तुम्हारा हम कदम बन तुम्हारी पीड़ा आत्मसात कर लूंगा ऐसा भरपूर विश्वास मन मे ले कर आना !! सखी-सहेलियों की यादें, कुछ स्मृतियों के पन्ने भी रखना मत...
स्त्री तुम बुद्ध नहीं बन पाई
कविता

स्त्री तुम बुद्ध नहीं बन पाई

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** बुद्ध बनना कितना सरल, कितना कठिन, किन्तु स्त्री तुम कभी बुद्ध नहीं बन पाई ! अनेक दायित्व निभाती, तिल तिल मरती, फिर भी सब क्यों त्याग नहीं पाई स्त्री बुद्ध नहीं बन पाई !! सारे रिश्तों को छोड़कर, सारे बंधन तोड़कर, कर्तव्य अपना भूलकर, क्यूँ नही जा पाई, स्त्री तुम बुद्ध नहीं बन पाई !! करोडों बार अपमानित हुई, बार बार प्रताडित हुई, उजली तुम्हरी चादर फिर भी भी दागदार हुई, स्त्री तुम क्यों बुद्ध नहीं बन पाई !! संसार को तुमने जन्म दिया, फिर भी मूढ़ कहलाई , ज्ञान-ध्यान-तप की खातिर, घर-आंगन क्यों छोड़ नहीं पाई, स्त्री तुम बुद्ध नहीं बन पाई !! यशोधरा बनी, सीता बनी द्रौपदी और अहिल्या भी सच-शांत की पूजनीय प्रतिमा होकर भी स्त्री तुम बुद्ध नहीं बन सकीं!! परिचय :- श्रीमती क...
फिर वही बात
कविता

फिर वही बात

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** बहुत भुलाना चाहा, पर इनकी पीड़ा से मुक्ति की कल्पना, मुझे फिर उन्हीं अंधेरी गलियों में ले जाती है, जहाँ फिर से वही बातें दोहराई जाती हैं, फिर से वही क्रूरता का ताना बाना बुना जाता है, फिर वही निर्दयता पूर्ण व्यवहार की बातों का सिलसिला चलता है ! इनकी मासूमियत वहां एक बार फिर फ़ना हो जाती है ! फिर इनके लिए वही बेबसी, वही लाचारी, जिनमे ये मासूम रात-दिन दम तोड़ते हैं ! उस अंधकार में कोई रोशनी की किरन नहीं दिखती, कोई ऐसी ध्वनि कानो में नहीं पड़ती, जिसमें इनकी मासूमियत की बातें हों, जिनमे इनके लिए करुणा और ममता हो ! यहां बार बार वही गलतियाँ दोहराई जाती हैं, इन मासूमों के जीवन को संरक्षित करने की आशा क्षीण होती जाती है,! इंसानो की नगरी में मानो इंसान विवेकहीन हो गया है, स्वयं के लिए...
पिता दामाद से क्या कहता है…
कविता

पिता दामाद से क्या कहता है…

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** पहला व्यक्ति जिसने इस लाडली को गोद में लिया वो मैं था, तुम नहीं , पहला अधिकार मेरा था जब पहली बार मैंने इसके माथे को चूमा तुम्हारा नहीं ! पहली मुस्कान उसकी, पहले आंसू, उसके मैंने देखे, उसे अपनी नन्ही राजकुमारी कहा, वो मैं ही था, तुम नहीं ! दुनिया की सबसे सुन्दर बेटी की निश्छलता, निर्मलता, कोमलता मैंने देखी, प्यार, नाज़, और दुलार से पाला, सम्मान और कर्तव्य सिखाये सबसे पहला पाठ पढ़ाया, वो मैं ही था! उसे साहस-ताकत का अध्याय सिखाया, पूरे दिल से प्यार देकर पाला !! आज मैं तुम्हें वहीं सम्मान देता हूँ , जिस सम्मान के अधिकारी बने तुम इसके कारण! इसी प्यार-सम्मान, से उसे सवांरना, जो आज तक उसे मैंने दिया है, उसकी रक्षा करना ! दर्द क्या होता है वो नहीं जानती, तुम अब वो पुरुष बनोगे, जि...
थोड़ा सा प्यार बांटे
कविता

थोड़ा सा प्यार बांटे

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** कहते हैं बांटने से खुशी बढ़ती है और दर्द कम हो जाता है, तो चलो आज कुछ मुस्कराहटें बांटे, रिश्तों में थोड़ी सरसराहट बांटे! पसरा है जिनके जीवन मे सन्नाटा उनमे थोड़ी पवित्रता बातें, जीवों....में मुस्कान बांटे! जीवन जीने का खुशनुमा अंदाज ना जाने कहाँ खो गया द्वेष और दिखावा छोड़ थोड़ा सा प्यार बांटे! सब कुछ पाने की चाह में चैन-शांति कहीं गुम हो गई क्यों ना थोड़ा सा सुख बांटे! नीरस सी हो रही जिंदगी जिनकी उनमे थोड़ी शरारतें थोडा सी शुभकामनाएं बांटे!! प्रकृति ने उपहार दिए हमे, नभ-जल-थल, इन्द्रधनुषी रंगों से सजे पशु-पक्षी, इनमे थोड़ी करुणा-थोड़ी ममता इनको थोड़ा सम्मान बाटें!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्...
नारी और स्वतंत्रता
कविता

नारी और स्वतंत्रता

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** अखिल भारतीय कविता लिखो प्रतियोगिता विषय :- "नारी और स्वतन्त्रता की उड़ान" उत्कृष्ट सृजन पुरस्कार प्राप्त रचना शक्ति का नाम नारी, आज की आत्मनिर्भर नारी, कई रूप है उसके, मृत्यु भी उस से हारी ! आजाद देश की नारी है, किन्तु अबला कहलाती है, हर जिम्मेदारी अपनी बखूबी निभाती है !! सजग है सचेत है, सबल और समर्थ है, आधुनिक युग की नारी है सक्षम बलधारी है !! झुका सके ना उसको वो प्रचंड आसमान है, संघर्ष के शिलाओं का पूर्ण होता आकाश है!! स्नेह-प्रेम-ममता की ये तो भंडार है, हर युद्ध जीतने, अभियान उसका जारी है! चाहरदीवारी के हर बंधन तोड़, आज बनती युग निर्मात्री है, पथ है पथरीली, हर बाधा उससे हारी है !! टूटती है, बिखरती है, फिर से संवरती है, हर युग की नारी सम्मान की अधिकारी है !! स्वावलंबी बन जीवन ...
दो श्वानों की बातेँ
कविता

दो श्वानों की बातेँ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** एक घरेलु श्वान ने एक दिन, सड़क पर पड़े श्वान की दशा देखी! दुबला पतला शरीर खंडहर बन चुका था! उसकी दुर्दशा देख घरेलु श्वान को छटपटाहट हुई, उसने सड़क के श्वान से पूछा- कहाँ रहते हो?? ये कैसा हाल बना है तुम्हारा?? क्या यहाँ इंसान नहीं रहते?? सड़क का श्वान घिसटते पैरों से, आधा गला शरीर, उसके घाव से रक्त की बूंदे रिस रही थीं, आगे बड़ने की कोशिश करते हुए, अपने दर्द से भरे शरीर को समेटते हुए बोला- प्रत्येक दिन हमारी और हम जैसे हजारों कि जिंदगी मौत से आँख- मिचौली खेलती है, खाना- पीना हमारे भाग्य में नहीं होता है , कभी किसी दरवाजे पर आस लिए पहुंचते हैं , वहाँ डंडे की मार, दुत्कार और प्रहार मिलता है , कभी कहीं हमको जिंदा आग में जलाया जाता है , कभी आग से नहलाया जाता है ! इतना ही नहीं हमारे ...
कौन हैं ये लोग
कविता

कौन हैं ये लोग

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** कौन हैं ये वृद्ध लोग एक बूढ़ा आदमी एक बूढ़ी औरत! कहने को इनके पास कोई अपना नहीं होता, ये दूसरों के बच्चों में खुद की औलाद का बचपन ढूंढते हैं! ये वृद्ध लोग अक्सर रेलवे-स्टेशन और एयरपोर्ट पर नजर आते हैं कभी कोई इन्हें लेने या छोड़ने नजर आता है! ये सदैव बूढ़े और कमजोर ही दिखते हैं व्हील चेयर और लाठी इनका सहारा होते हैं! जब ये समर्थ और इनके हाथ भरे होते हैं, इनके आसपास लोग होते हैं, हाथ खाली होते ही बोझ बन जाते हैं! इनकी रफ़्तार धीमी होती है, जिंदगी की दौड़ में पीछे छूट जाते हैं! जीवन भर सही राह पर चलते धर्म-कर्म निभाते, उम्र के इस पड़ाव पर अपना वज़ूद ढूंढते हैं, और एक दिन इस दुनिया से कूच कर जाते हैं!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार च...
अंतरिक्ष से बेटी वापस आई है
कविता

अंतरिक्ष से बेटी वापस आई है

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** अंतरिक्ष में एक भारतीय बेटी, सितारों के बीच उड़ान भरती, आज धरती पर वापस आई है ! चुनौतियाँ ही जीवन को रोचक बनाती हैं , उनपर विजय पाना ही जीवन को सार्थक बनाता है जहां को ये संदेश देती है! उसकी मनमोहक मुस्कान से विश्व भर मे खुशियाँ छाई हैं ! ९ महीने लंबे अंतराल के बाद धरती माँ की गोद में रौनक आई है ! धैर्य- सहनशीलता-आत्मविश्वास की परिभाषा बन चुकी है, सृष्टि के प्रति समर्पण और अदम्य साहस से गौरवशाली इतिहास लिख रही है ! जीवों को प्रेम करने वाली, आज दुनिया की मुस्कान बनी है ! आकाश से सूरज का तेज, सितारों की चमक, और चांद की शीतलता साथ लाई है , आज धरती माँ की बेटी माँ की गोद में वापस आई है!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १...
टूटे दिल के टुकडे
कविता

टूटे दिल के टुकडे

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** रौनक भरे शहर में धुआं-धुंआ सा क्यूँ है इंसानों की भीड़ में हर शख्स अकेला सा क्यूँ हैं! एहसास यहां सोये हुए से क्यूँ हैं आदमी बुत और दिल पत्थर से क्यूँ है! इस भीड़ के कोलाहल में हर कोई वजूद सा ढूंढता है, मानो टूटे दिल का कोई टुकड़ा ढूंढता हो! अधूरी सी कहानी है टूटे दिल की गीली पलकों पर नमी आंसुओं की! रूह में घुलता खालीपन सा क्यूँ है हर दिल मे सूनापन सा क्यूँ है! प्यार मोहब्बत यहां दम तोड़ देते हैं इंसानी दिल टूट के बिखर जाते हैं! सोचा ना था जिंदगी में कभी ऐसे फंसाने होंगे टूटे दिल के टुकड़े भी समेटने होंगे !! भटकता है मन अजीब सुनसान राहों पर इधर-उधर, काश मिल जाए कोई दिल मुस्कराहट से तर-बतर!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी...
होली
कविता

होली

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** संस्कृति की धरोहर है होली, संस्कारों की विरासत होली, प्रकृति का शृंगार है होली, जीवन का उपहार है होली, हम सबका गर्व है होली!! हर जीवन में रंग है भरती, चेहरों पर मुस्कान सजाती, स्नेह सौहार्द की धारा है होली रंगों की बौछार है होली !! शीत ऋतु की हो रही विदाई ग्रीष्म ऋतु की आहट आई, ज़न-जीवन मे उल्लास है भरती भूले बिसरों की याद है होली! प्रकृति की अनमोल धरोहर, हर रंग के जीव जानवर, इनपर भी हम प्यार लुटाए, प्रेम रंग से इन्हें सजाएं, मिलजुल कर त्यौहार मनाएं, आई होली आई होली!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार) निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश) सम्मान : राष्ट...
इंतजार
कविता

इंतजार

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** माँ के हाथ की लकीरों में क्यूँ सिर्फ होता है "इंतजार" माँ बनने का इंतजार, बच्चे के स्कूल जाने, उनके वापस आने का इंतजार बड़े होकर घर से बाहर निकलना उनके वापसी का इंतजार अपने हाथों से पका ममता के स्वाद से भरा भोजन खिलाने का इंतजार, बच्चों के प्यार, रूसने, मान जाने का इंतजार बूढे होते थक चुके माँ के शरीर को, प्यार से गले लगाने का इंतजार बंद कमरे के कोने मे दुबकी निढाल माँ को किसी कदमों की आहट का इंतजार, दर्द से कराहती काया को किसी के दुलार का इंतजार, कमजोर बूढे होते शरीर को मजबूत लाठी का इंतजार अखिर कब तक करे माँ इंतजार क्या उसका भाग्य है "इंतजार??? माँ की झिल्लीयां पुरानी हो जाती है पर उसका प्यार कभी पुराना और बूढ़ा नहीं होता माँ की उम्मीद की इमारत को धराशायी मत होने दो, म...
अंतिम ईच्छा
कविता

अंतिम ईच्छा

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** अंतिम ईच्छा एक जीव एक जीवन की सुनो अगर कभी जो सुनना चाहो मेरे दबे छुपे शब्दों की आवाज, गहराई में डूबी सी ध्वनि का आभास! मैंने कभी कुछ नहीं चाहा तुमसे, ना कभी माँगा तुम सलामत रहना इस सृष्टि के होने तक मेरे दिल मे मेरी आत्मा मे मेरी अठखेलियों में मेरी पवित्रता भरी मुस्कराहट में मेरी आँखों की नमी में मेरी उठती गिरती सांसो में जिनमे हर पल तुम्हारा नाम लिखा होगा मेरी पीड़ा मेरी सिसकियों में जो मैं नहीं समझ सका, किसने और क्यों दिए ?? ना जाने कितने घाव छुपे हैं इनमे! मेरी अन्तरात्मा में एक द्वंद चल रहा, नहीं जानता कब से, क्यूं प्रताडित होता रहा जीवन भर?? क्यों मेरा अस्तित्व प्रश्न चिन्ह सा बना रहा सदैव?? मेरे होने मेरे ना होने पर , सब कुछ परमात्मा में विलीन हो जायेगा स...
जीव से प्रेम
कविता

जीव से प्रेम

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** जीवों से मेरा प्रेम, मानो मन का वृंदावन हो जाना, उनके मौन से मुखरित होना मानो प्रभुमय हो जाना, उनसे भावों से जुड़ना मानो हृदय करुणामय हो जाना! उनके कष्ट से जुड़ना मानो आत्मा का जागृत हो जाना!! निमित्त बनना मानो प्रभु का आशीर्वाद मिलना!! उन से जुड़ना उतना ही सरल है जितना कृष्णा की मुरली में संगीत का होना उनसे प्रेम ना होना उतना ही कठिन है, जितना राम के लिए मन में शुद्धता का ना होना!! प्रेम असीमित है, अथाह है, जितना हो कम है निःस्वार्थ प्रेम, ईश्वर की आराधना है प्रेम, मनुष्य से प्रेम, पशुओं से प्रेम पक्षियों और पेड़ पौधों से अथाह प्रेम, प्रकृति से प्रेम, सृष्टि से प्रेम , यही हैं अनन्त, अविनाशी प्रेम परमात्मा से प्रेम अंतहीन, नाथों के नाथ......पशुपतिनाथ से प्रेम!! परिचय :...