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Tag: साक्षी लोधी

रात्रि का दृश्य
कविता

रात्रि का दृश्य

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** ओढ़ निशा को चपल चांदनी मन को आकर विचलित करती नीरवता की ध्वनि विकट है दृश्य गगन का अतुल मनोरम तारों की झिलमिल सेना के बीच खड़ा है ये मेरा मन शीतलता सी लिए हवाएं आएं जाएं जुगनू आकर आस-पास राहें चमकाएं तमस ने रंग के नील गगन को श्याम रंग कर डाला और गले में डाल सितारों की उज्जवल सी माला दुग्धमेखला बेणि बनकर नागिन सी लहराए चंद्रकिरण अपनी किरणों से और अधिक चमकाएं जगह जगह पे उमड़े घुमड़े बनकर मानो प्रहरी ये घन तारों की झिलमिल सेना के बीच खड़ा है ये मेरा मन परिचय :-  साक्षी लोधी निवासी : नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया ल...
राणा सांगा
कविता

राणा सांगा

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** वीरता की सीढ़ियों पर जन्म से जो चढ़ गए खेलने की उम्र में जो शत्रुओं से भिड़ गए मातृभूमि को जो अपनी लहू से ही सींचते आंख से ही सत्रुओं के प्राण आधे खींचते रक्तरंजित भाल जिसके, कंठ सबके सोखते नख प्रखर वीर महाराणा सांगा वीरता की सीढ़ियों पर जन्म से जो चढ़ गए खेलने की उम्र में जो शत्रुओं से भिड़ गए मातृभूमि को जो अपनी लहू से ही सींचते आंख से ही सत्रुओं के प्राण आधे खींचते रक्तरंजित भाल जिसके, कंठ सबके सोखते प्रखर नख से दुश्मनों कि छातियों को नोंचते जिनके वंशज शोर्य गाथा रक्त से ही गढ़ गए जो झुके नहीं सर भला कटे, धर ही जिनके लड गए बो वीर मेवाडी की जिसने युद्ध सो सो जय किए जिनका हर कण कण धरा का, शोर्य का गायन करे जिनकी गर्जना सुन भागते, दुश्मन भी उल्टे पाव लिए वो राणा सांगा चलते थे, छाती पर अ...
रानी पद्मनी
कविता

रानी पद्मनी

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** सजी रानियां दुल्हन सी, मृत्यु को अमर बनाने गुहिल वंश की आभा से, खिलजी के होश उड़ाने राजपूतानी तेवर ले, अंबर को आंख दिखाने बढ़ चलीं रानियां एक साथ, मिट्टी का कर्ज चुकाने मातृभूमि के जयकारे के, साथ किया उदघोष बढ़ीं गर्व से आगे को, भरकर छत्राणी जोश चलीं सिंहनी गाते गाते, जय-जय मात भवानी और धधकते अग्नि कुंड में, कूद पड़ी क्षत्राणि किया समर्पित अग्निदेव को, कंचन रूप निराला नतमस्तक धरती का कण-कण, नतमस्तक अग्नि ज्वाला इतिहास अमर कर माताएं, बलिदानी गाथा बना गईं सोलह हजार चित्तौड़ की सतियां, अग्नि कुंड में समां गईं उड़ी महकती भस्म कुंड से, चित्तौड़ी मिट्टी चमकाने बलिदानों की पावन भूमि को, राजस्थान बताने परिचय :-  साक्षी लोधी निवासी : नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती...
मंजिलों तक का सफर
कविता

मंजिलों तक का सफर

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** लम्हे गमों के अकेले बिताने पड़ते हैं कदम एक एक कर जमाने पडते हैं सीधे सीधे कुछ नहीं मिलता जमाने मैं काटों में भी रास्ते बनाने पडते हैं मिलते मिलते रह जाती हैं मंजिले मौके कई ऐसे भी गवाने पड़ते हैं रात दिन एक हुए किसने देखे सबूत कामयाबी के दिखाने पडते हैं मिली हैं मंजिलें जिनको पूछो जरा उनसे कितने जोखिम डर डर के उठाने पड़ते हैं ऐसे ही नहीं मिलता मुठ्ठी भर आसमां जमीं के ऐसे कई हिस्से गबाने पड़ते हैं हारने वाले तन्हा लड़ते रहते हैं खुद से जीतने बालों के साथ जमाने लड़ते हैं किनारों पे मोती मिलते नहीं अक्सर गहराइयों में गोते लगाने पड़ते हैं एक खुआब मुकम्मल करने के वास्ते शोक अपने सारे दफनानें पड़ते हैं परिचय :-  साक्षी लोधी निवासी : नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती ...
वीर अभिमन्यु
कविता

वीर अभिमन्यु

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** शकुनि ने चल दी, अनेतिक चाल आज केसे भी करके, बंदी बने गर धर्मराज हार पांडवों की, हो सुनिश्चित जाएगी सिंहासन दुरियोधन को , मिल जायेगी यहां चक्रवियू, गुरु द्रोण ने रच दिया अर्जुन को भेज, कुरुक्षेत्र से बाहर दिया पांडवो में घोर चिंता छा गई ये भयानक आज बिपदा आ गई व्यूह भेदन अर्जुन को केवल आता यहां पूछते हैं युधिष्ठिर आज अर्जुन हे कहां इतने में अभिमन्यु भी रण में आ गया पांडवों में आश बनकर छा गया मुझे दो आज्ञा में जाऊ युद्ध करने कुटिल नीति शत्रुओं की शुद्ध करने बोले युधिष्ठिर तुम अभी नादान बालक उस और भारी महारथी हैं व्यूह चालक हठ तुम्हारी व्यर्थ है ये छोड़ दो रथ को अपने पीछे तरफ को मोड़ दो अब लिखने का समय आ गया, अपनी अमर कहानी लोट गया जो समर छोड़ तो, फिर धिक्कार जबानी आज अपने रक्त से इतिहास लिखकर आऊंगा मार...
रास्तों से अपनी यारियां
कविता

रास्तों से अपनी यारियां

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** झूमते हवा से मनचले हम कहीं पे क्यों बसर करें ... रास्तों से अपनी यारियां मंजिलों की क्या फिकर करें ... क्या हे जिंदगी के फैसले.. चाहे गम हो साथ में चले मुस्कुराहटों को ओढ के हम तो अपनी धुन में लो चले ... रास्तों से अपनी यारियां मंजिलों की क्या फिकर करें निकले जब सफर के लिए मुडके आशियाना क्यों तकें हस्ते हस्ते काटना सफर फिर क्यों उदाशियां चुने रास्तों से अपनी यारियां मंजिलों की क्या फिकर करें मस्त हो हवाओं संग बहें बादलों को सरफिरा कहें ऊंची चोटियों पे एक दिन जाके आसमां को चूम लें ... रास्तों से अपनी यारियां मंजिलों की क्या फिकर करें परिचय :-  साक्षी लोधी निवासी : नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।...