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पौधे से बात

सरिता चौरसिया
जौनपुर (उत्तर प्रदेश)
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एक दिन अपने घर के
बरामदे में खड़ी
कुछ विचारों में डूबी देख रही थी,
गमले के पौधों को बड़े ही गौर से
जाने मन क्यूं खो गया
एक छोटा सा नन्हा सा पौधा
झांक रहा था मिट्टी के भीतर से
मुझे देखा उसने और मुस्कुराया
लगा कुछ कहना चाहता है,
पूछा मैंने क्यूं मुस्कुराए,
वो बोला, मैं आज
दुनिया को देख रहा हूं
कल मैं भी बड़ा हो जाऊंगा
फलदार वृक्ष बनूंगा,
हरा-भरा हो जाऊंगा
पर सोचा है कभी
मुझे यह तक कौन लाया?
एक बीज था मुझसे
पहले इस धरती पर
उसने खुद को मिटा दिया
सौंप दिया खुद को
इस मिट्टी के हाथों में
कि भले ही मैं ना रहूं
पर संभाल लेना
मेरी इस अमानत को
मेरा अस्तित्व नहीं मिटने देना,
मत जाने देना व्यर्थ
मेरा ये त्याग, समर्पण,
मैं जड़ बन कर भी
मिट्टी के भीतर से
उसको देखूंगा जो
है मेरी ही परछाईं।
पौधा फिर से बोला मुझसे
क्या अभिमान है
तुम्हे अपने आप पर,
मैं हंसा इसलिए,
तुम मैं और हम में डूबे हो
तुम हो क्या,
तुम्हे भी बनाने के लिए
मिटा है कोई
तो आज तुम यहां हो,
मुझे देखते हो गौर से
पर इतना जान लो
बहुत फर्क नहीं है
तुमने और मुझमें,
फर्क है तो बस इतना
कि तुम भूल गए हो
और मुझे अब भी याद है………।।

परिचय :- सरिता चौरसिया
पिता : श्री पारसनाथ चौरसिया
शिक्षा : एम. ए. हिंदी (बी.एड.)
जन्म स्थान : जौनपुर (उत्तर प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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