
ललित शर्मा
खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम)
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कभी-कभी समझ में
नहीं आती बात
समझ के फेर में
उलझ जाती बात
कभी-कभी बिगड़ी बात
तिल का ताड बनकर
लाइलाज बन जाती
जीवन जीने की बात
बिगड़े काज
सुधार भी जाती
कुछ अच्छी बात
जीवनभर जुबान पर
कायम रहती अच्छी बात
सबसे भारी पड़ जाती
जीवन में कई कड़वी बात
बिना बुलावे अक्सर
कई कारणों में कई बार
जुबान पर चली आती है
कुछ चुभती बात
बीमारी सी हालात
कर देती है बात ही बात
कभी कभी मन को
बेचैन कर जाती
जीवन जीने की बात
फिर भी शांति
सगुन भरने की
समझ से परे रहती
जीवन जीने की बात
नहीं समझ आती
जीवन जीने की बात
कोई राह नहीं नजर आती
बात ही बात में
बिगड़ती जाती
बात में बात
तिल से ताड में
उलझ जाती
जीवन जीने
की तमाम बात
कभी कभी खुशियां
लाती बात
कभी मातम
ले आती बात
आती चली जाती
आती चली जाती
कभी कभी दुश्मनी
की दीवार खड़ी करती
उलझी बात ही बात
प्राणों पर भारी पड़ती
जानलेवा हमला
कराती बात
जीवन जीने में
भारी पड़ जाती
हरदम खतरा मोल
देती बात ही बात
न मंडराए अंदर से
कभी भी अनर्गल
फिजूल बात
बात ही बात में
सोचने में किसी को
कभी न करे आघात
कभी भी न कोई
तिल का ताड बनाये
बात कहने में रहे हरदम
खुद पे खुद बात
करे साफ-साफ
भाव विचार में
भरकर मिठास
जीवन में मधुरता रहे
बात बात में हम
रहे सच और बात में रहे
साफ-साफ
निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम)
संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक
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