
ललित शर्मा
खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम)
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मां सुबह से शाम,
बिन आराम
बच्चों का हरदम
रखती है ध्यान
खुद भूखी रहकर
बच्चो को पहले
कराती है जलपान
मां पहले बेटे को
खिलाकर भोजन
लेती चैन करती आराम
हिम्मत इतनी देती
थकने का नहीं लेती नाम
खुद आग के धुएं में
रोटी पकाकर
हाथों से सेंककर
बच्चो को खिलाती
बच्चों की दुःख विपदाओं में
मां पहले आगे आती
मां आंखों में आंसू
नहीं कभी झलकाती
मां होती है कितनी भोली
दुःख दर्द पीड़ा बच्चो की
सबसे पहले समझ जाती
बच्चों के जीवन की खुशियां
मां अन्तर्मन से खुशियां लाती
बच्चों के कष्टों के बादलों को
मां पल भर में चतुराई से
खुद कष्ट झेलकर हटाती
जीवन के सच्चे पाठ सिखलाती
जीवन की नैया पार लगाती
जीवन का जंजाल
मां स्वयं गले लगाती
बच्चो की खुशियां खातिर
सारी मोहमाया हटाती
बच्चों की खातिर
मां सुबह से शाम तक
बरामदे में बैठी ही रह जाती
बेटे को याद आये, या ना आये
मां मगर देर होते ही
आंसू बहाती
रोने लग जाती
क्या चीज है माँ
भावी पीढ़ी में
मां के कद्र, दुख दर्द की
बात समझ में नहीं आती
बच्चों भूलकर मां की
ममतामयी जिंदगी जैसी
हिम्मत ताकत,
संसार में अन्यत्र
किसी भी वस्तु से
कदापि मिल नहीं पाती
यही तो है, माँ कहलाती
निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम)
संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक
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