
श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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अजीब सी होती हैं गृहणियां,
समाज शास्त्र पढ़े बिना
संबन्धों को तिनके-तिनके
जोड़ती है ये गृहणियां
मनोविज्ञान पढ़े बिना ही
सभी की उलझने
सुलझाती हैं ये गृहणियां
होम साइंस ना हो
पढ़ा कभी ,फिर भी
पाक कला में निपुण
होती हैं गृहणियां,
दूध में साइटृक एसिड डाल
पनीर बनाती, सोडा बाइ कार्बोनेट से
स्वादिष्ट, स्पंजी केक बनाती,
नित नए प्रयोग कर कर,
सोडियम क्लोराइड का
सही नाप तोल समझाती,
खुद को वैज्ञानिक कभी नहीं
समझ पाती ये गृहणियां ,
मसालों के नाम पर
आयुर्वेदिक ख़ज़ाना भी
हैं रखती,
गमला, मिट्टी में, तुलसी,
गिलोय, पारिजात ,
बो बोकर रसोईघर में ही
औषधि बनाती,
फिर भी कुछ नहीं
करती ये गृहणियां
सुन्दर रंगोली बनाती,
चित्रकारिता में निपुण,
ढोलक की थाप पर नृत्य
और संगीत के मीठे सुर छेड़ती
खुद को केवल हाउस
वाइफ ही मान पाती ये गृहणियां ,
मंहगाई और सस्ताई के दौर मे
अर्थशास्त्री सी कुशलता
दिखाती ये गृहणियां
योग, ध्यान, व्रत-तप में
माहिर सकारात्मक ऊर्जा से
भरी सबके कल्याण के लिए
जीती गृहणियां!
आकाश का सीना चीर,
नित नई ऊँचाइयों को छूती
नदीश की गहराईयों को मापती,
खुद को अभिमान से दूर रख
असंतुष्टि में भी संतुष्ट
रह कर, आजीवन
साधारण या निम्न ही
बनी रह जाती,
विचित्र ही होती हैं गृहणियां …
परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी
जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी
शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार)
निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “जीवदया अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
विशेष : साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के शौक ने लेखन की प्रेरणा दी और विगत ६-७ वर्षों से अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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