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वो बंद कमरें

दुर्गादत्त पाण्डेय
वाराणसी
********************

(१)
जी हाँ! जेहन में आज भी
जीवित हैं, वो बंद कमरें
जहाँ दीवारों के कान,
इंसानों के कानों से ज्यादा
समर्थ हैं, सुनने में
वो ख़ामोश आवाज,
ह्रदय को विचलित
कर देने वाला
असहनीय शोर
इन यादों को आज भी
संजोये रखें हैं,
वो बंद कमरें

(२)
परिस्थितियों को अपने अनुकूल
मोड़ देने कि उम्मीद लिए,
आज भी वो लड़के खूब लड़ते हैं,
खुद से, इस समाज से अपने
वर्तमान से अपने वर्तमान के लिए
लेकिन इन हालातों को जब वो,
कुछ पल संभाल न पाते हैं
तो फिर इन लड़कों को,
संभालते हैं, वो बंद कमरें

(३)
दरअसल मैं एक बात स्पष्ट कर दूं
वो बंद कमरें, कोई साधारण कमरें नहीं हैं,
वो इस जीवन कि प्रयोगशाला हैं
जहाँ टूटने व बिखरने से लेकर
सम्भलने व संवरने तक के
अध्याय, इनमें समाहित हैं

(४)
मुझे संकोच नहीं हैं कहने में
वो बंद कमरें भी एक,
विश्वविद्यालय हैं, जहाँ
अध्यापन का कार्य,
वो मजबूत दीवारें करती हैं
जहाँ मार्गदर्शन, उन
कमरों में लगे दरवाज़े करते हैं
और इस अध्यापन का
सम्पूर्ण अध्याय,
ग्रहण करने के बाद
फिर नए इंसानों के
इंतजार में रहते हैं,
वो बंद कमरें!!

परिचय : दुर्गादत्त पाण्डेय
सम्प्रति : परास्नातक (हिंदी साहित्य ) डीएवी पीजी कॉलेज, बनारस यूनिवर्सिटी वाराणसी
निवासी : वाराणसी

घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।


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