
छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
आनंद विहार (दिल्ली)
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मन ने
मन से पूछा
कौन पैदा होता है
अपने साथ
कामयाबी ले कर
प्रत्युत्तर भी दिया
मन ने सही है …
कोई पैदा नहीं होता
मगर …
पैदा होता है वो
अपने जन्म-जन्मांतरों के
शुभ-अशुभ कर्मों का
प्रारब्ध लेकर …
मन ने फिर कहा
क्यों उलझाते हो
शब्दों के मकड़जाल में
अनेकों को देखा है
शून्य है
परिश्रम के नाम पर
मगर … पाते हैं …
सुख-सुविधा अपरंपार
अकूत धन भंडार
तब … मन ने समझाया
अपने ही मन को
यही कहलाता है
पूर्व जन्म के
शुभ कर्मों का खेल
कहा जाता है प्रारब्ध …
मन अशांत
व्याप्त थी जटिल कुंठा
घूम रहे अनेकों प्रश्न
फिर मनु क्यों
करे पुरूषार्थ
तुरंत उत्तर आया
आवश्यक है पुरूषार्थ
अन्यथा
क्षीण हो जाता है प्रारब्ध
सात्विक हो पुरूषार्थ तो
सोने पर सुहागा
प्रारब्ध गुणित हो जाता है
और यदि हो तामसिक तो
समाप्त हो जाता है प्रारब्ध
पुरूषार्थ के बावजूद
कहाँ पाता है पहचान …
सनातन संस्कृति हो
या फिर … जैन दर्शन
मान्यता है
अतीत का प्रारब्ध
आज का पुरूषार्थ
मिल कर बनता है
भावी भाग्य
और …
जब होता है
संगम तीनों का तो
बन जाती है
इंसान की नियति …!!
परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
निवासी : आनंद विहार, दिल्ली
विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में पद्य व गद्य दोनों विधा में लेखन, अब तक पंद्रह पुस्तकों का प्रकाशन, पांच अनुवाद हिंदी से राजस्थानी में प्रकाशित, राजस्थान साहित्य अकादमी (राजस्थान सरकार) द्वारा, पत्र पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में नियमित प्रकाशन, राजस्थानी लोक गीतों के लिए प्रसिद्ध कंपनी “वीणा कैसेटस” के दो एलबमों में सात गीत संगीतबद्ध हुये हैं।
सम्मान : “राजस्थानी आगीवान” सम्मान से सम्मानित
श्री गंगानगर के सृजन साहित्य संस्थान का सृजन साहित्य सम्मान व
सरदारशहर गौरव (साहित्य) सम्मान व अनेक अन्य सम्मानरा
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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