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Tag: छत्र छाजेड़ “फक्कड़”

इतिहास बना है शिलालेख
कविता

इतिहास बना है शिलालेख

12आनंद विहार (दिल्ली) ******************** इतिहास बना है शिलालेख कब, किसने इससे सीखा है परमार्थ किया तभी तक जब तक उसमें स्वार्थ दिखा है दिन के घोर उजाले में तुम सदाचार समझाते हो धवल वस्त्रों तले छिपी रक्त-पिपासा कब दिखलाते हो शोषण की सीढ़ी पर चढ कर सुख के स्वप्न दिखाते हो रजनी के स्याह अंधेरों में संहारक तेवर अपनाते हो षड्यंत्रों का भोजपत्र मानव रक्त से लिखा है कहर तुम्हारा भुजंग बन मासूम यौवन को डसता हैं संस्कारों की चून्नर तले दरिया दर्द का रिसता है दुराचार के दावानल में अक्षत यौवन कुंभल रहा दो वक्त की रोटी खातर हुआ पतित कब संभल रहा रक्षक भक्षक बन बैठा समय वक्त पर चीखा है श्रम साध्य श्रमिक ने जीवन मंदाग्नि में झोंक दिया सूखी रोटी के दो कोरो पर स्वाभिमान को छोड़ दिया साधन के संधानो खातिर स्वर सतत मिमियाते रहे आकुल नादान नन्हे मुन्नों क...
नंगे को डर कैसा
कविता

नंगे को डर कैसा

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** प्रश्न उठा डर नहीं लगता उत्तर मिला कैसा डर... किससे डर... ये दुनिया है ही नंगों की नंगे को नंगे से डर कैसा..... ये तो हमाम है यहाँ सब नंगे हैं बस.. अंतर इतना सा कि कोई है छोटा नंगा तो कोई बड़ा नंगा कोई मात्र हेराफेरी से चलता है तो कोई सौदा कर लेता आत्मा का जैसा भी हो नंगा तो बस नंगा है नंगे को नंगे से डर कैसा..... क्यों सोचते हैं नंगे के पास आत्मा होगी जिसे अहसास हो जिसमें संवेदन हो... दर्द हो.. नंगा कब सचेत होता है कि जमीर जागता रहे नंगा कब अचेत होता है कि प्रतिहिंसा दफन हो कौन पड़े चेतन-अवचेतन के पंगे में नंगे तो सिर्फ नंगे होते हैं फिर नंगे को डर कैसा..... नंगे को तो मतलब है मात्र अपने मतलब से अपनी आकांक्षा से अपनी महत्वाकांक्षा से अगर कुछ होता और तो क्यों कहलाता नंगा...
मौसम की शरारत
कविता

मौसम की शरारत

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** मौसम ने की शरारत और बहारों ने पैगाम लिख दिया नभ से दूर चाँद आज देखो स्याह जुल्फों ने छिपा लिया पवन पालने झूले अरमान तारों को हँसना सिखा दिया बहना अल्हड़पन में झरनों को झरते नयनों ने सिखा दिया घंघरू खनक गजरे महक बहकना सुरों को सिखा दिया सतरंगी सपनों ने मन के हया में हिना का रंग मिला दिया खंजनी अखियों का जालिम वार हुश्न को कातिल बना दिया अधरों की छुअन से सरगम ने भँवरों को गाना सिखा दिया यौवन भार से झुकी देह ने शर्माना फूलों को सिखा दिया मिलना दिलों का चुपके-चुपके राज को राज रहना सिखा दिया पीहू पीहू करे प्रेम में मनवा प्रीत का उन्माद बढा दिया जमुना तट पर रास रचे फक्कड़ राधा माधव को मिला दिया दिन चढे चाहे रात ढले पल पल प्यार में बस गुजार दिया बिखरा रंग प्यार का ऐसा नफरत करना ...
तक दुम
कविता

तक दुम

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** तक दुम... तक दुम.... बीत गई रतिया आये न श्याम तुम.... तक दुम... तक दुम... गर्म सांसों का अहसास मन मोरा भटकाय रहा रमी श्याम तेरे सौरभ में जीवन मेरा महकाय रहा अधर चढे मुरलिया तो करे होश मेरे गुम.... तक दुम.... तक दुम.... रंग रसीला कान्हा मेरा लाया गोटे की अंगिया दिखा दूर से छेड़े मोहे बता कहाँ से ली अंगिया रास रचे जमना तट पे राधा नाचे ठुमक ठुम... तक दुम.... तक दुम.... नटखट नटवर छुप छेड़े दिल भी चुराये माखनचोर डपटे मात तो मन मुस्काये कान पकड़ मनाये चितचोर इक पल ना दिखे मोहन तो मनवा होवै गुम सुम.... तक दुम... तक दुम.... बीत गई रतिया आये न श्याम तुम.... तक दुम... तक दुम... परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़” निवासी : आनंद विहार, दिल्ली विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थ...
हक और शक
कविता

हक और शक

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** एक धोबी की आवाज़ पर बिना जाँच पड़ताल घर से निकाला माता सीता को मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने न जाने कैसी ये मर्यादा थी राम की या फिर था पुरुषोचित मन का शक.... भरे दरबार में स्वयंबर की आड़ में परम ज्ञानी, अति बलशाली प्रतापी भीष्म ने तलवार की नोक पर अम्बे, अम्बिका और अम्बालिका तीनों को इच्छा के विरुद्ध उठा लिया.... शायद... मर्यादा की छाँव में रहा हो पुरुषोचित हक..... सभी परिवार प्रमुखों के समक्ष धर्मराज कहे जाने वाले युधिष्ठिर ने द्यूत क्रीड़ा में स्व भार्या द्रोपदी को बिना उसकी मर्जी जाने लगा दिया दाव पर मन कहाँ समझ पाया कि स्वांग था मर्यादा का या फिर पांडवों का पुरुषोचित हक..... कौरवों के राज दरबार में नीति कुशल विदुर द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म जैसे अजेय व्यक्तित्वों के साम...
स्वप्न सुख
कविता

स्वप्न सुख

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** सपनों का अपना अहसास होता है इसीलिए ये असल से खास होता है रोकेगा कौन दिल को झूमने से रोकेगा कौन लबो के चूमने से हवायें चले या ना चले मगर मादकता का मन अहसास होता है कोई मौसम नहीं कलियाँ फूटने का कोई वक्त नहीं कोयल कूकने का जिस वक्त भी मन करे अपना सुर संगीत का आगाज होता है बिन मौसम बादल गरजते हैं गौरी खड़ी सामने वे बरसते हैं भिगो जाते प्रिये की कोमल काया संग भीगें, अंदाज अलग होता है मिल लेते हैं बेझिझक सपनों में मन खोया रहे प्रीत के सपनों में वास्तव में क्या होगा, कौन जाने यहां मन चाहा मिलाप होता है सुख ही सुख, कहां दुख सपनों में ना अलगाव की चर्चा है अपनो में हकीकत में नहीं, सपनों में ही सही अरमान पूराने का अहसास होता है परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़” निवासी : आनंद विहार, द...
मैं… कहाँ रह गया मैं…?
कविता

मैं… कहाँ रह गया मैं…?

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** मैं... मैं था कभी.. मेरा स्वाभिमान.. मेरा दंभ मगर... अब मै कहाँ रह गया हूँ मैं...... तरंग विहीन उमंग विहीन धड़कते स्पंदनों के घेरे से बाहर नाना रूपी विलग स्वरूपी संवेदनाओं से ऊपर उठ कर स्वप्न सागर में तैरने का अहसास लिए मैं हूँ पर प्रश्न है... क्या मैं हूँ...? मिचमिचाते तारों भरे नील गगन में मटमैले से प्रकाश में चंदा विहीन तारा पूरित नभ पर शायद अमावस्या है भाव विहीन भावों के गहन समंदर में तिरोहित भाव लिए मैं हूँ पर प्रश्न है... क्या मैं हूँ...? चलाचल के समागम में हरित वसुंधरा पर ढह गई मानवीय सोच सभ्यता और संस्कृति विरासत के गुण बह गये आडंबरीय सैलाब में भौतिकता की मोह धारा में चमकता मार्तंड जगाता है विश्वास पर कैसे मानूं... फिर भी अस्तित्व है मेरा पर प्रश्न है... क्य...
शक
कविता

शक

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** बिना आग का धुँआ होता है शक दम तो घुटेगा ही जब हो जाये मन धुँआ धुँआ येे शक कहते हैं होता है लाइलाज बस उठता है धुँआ ही धुँआ जलती मनाग्नि में घी का काम करता है इन्सान का अपना अहम्..... दायरे विशाल हैं दुसरे तो सदैव ही रहते हैं शक के दायरे में कभी आ जाते हैं खुद अपने ही शक के दायरे में मगर कभी कोई पनप पाया है इन शक के दायरों में.... वर्चस्व जहाँ हो शक का प्रश्न ही कहाँ उठता है किसी और के अधिकार या फिर उसके हक का बस सुलगता रहता है धुँआ शक का... सबसे कमजोर कड़ी होती है इन्सानी जज्बात और प्यार वहीं लटकी रहती है सदा शक की सुई सड़ांध लाशों की भी रह जाती है दब कर जहाँ उठती है महक शक की.... प्रताड़ित करते औरों को पर स्वयं भी तिल तिल मरते हैं जहाँ फैला हो दबदबा बेरहम शक का मिलती ...
आधुनिकता
कविता

आधुनिकता

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** तन सजा है मन प्यासा है भूखी रही सदा आत्मा तन की लिप्सा पूरी हो अभिप्सा नारी की शोख अदा बिक रही आह बिक रही धड़कने बिकती हैं शैया सलवटें बिक रहे स्वप्न बिकने को आतुर अस्मिता बिक रही मन की चाहतें जिधर उठे नजरें बाजार सजा है बिकने को परोसी गई आह से वाह तलक बिक जाती हैं मानवता सुलग रही मंजिल की चाह भूल गये मन अपनी राह.... कैसे लगे मोल पसीने की बूँदों का कैसे हो पहचान इन्सानी रक्तबीजों का सड़ रहा जो नाली में कैसा है धर्म इसका भाषा रह गई तौल-मोल की पैसा स्थापित हुआ इन्सानी धर्म सपने कैद राजमहलों में हँस मजबूर गाना चुनने व्यवसायीकरण होरहा लिप्सा का कव्वे आरहे बिकने हँस के मोल.. इस खतरनाक परिवेश आश्चर्य कहाँ और किसे बाजार में उतरे नारी बिकने को उपभोक्ता बन पुरुष बने भोक्ता निष्ठुर...
विभीषिका युद्ध की
कविता

विभीषिका युद्ध की

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** युद्ध होते आयें हैं इतिहास गवाह है होते आयें हैं युगों-युगों से युद्ध इतिहास का प्रत्येक पन्ना भरा है रक्त रंजित करते धरा को युद्धों से विध्वंस का द्योतक है युद्ध माना... कि... विध्वंस स्वयं में सृजक होता है मगर....भंयकर पीड़ा अपने में समेटे होता है युद्ध.... लाशें बिखरती है चहुँ और धरा पर इन सामरिक युद्धों में न जाने उजड़ते हैं कितने घर-परिवार खंडित होते हैं अनगिन रिश्ते युद्धों में रामायण... महाभारत... और न जाने कितनी परिचायक घटनायें युद्धों की.... मगर एक युद्ध और होता है कहलाता है मानसिक युद्ध यहाँ शत्रु नहीं होते बाहरी पर दुश्मन इंसान के होते हैं भीतरी स्वयं के विकार झूझती है आत्मा स्व-निर्मित वैचारिक जाल में माध्यम बनते हैं काम, क्रोध, लिप्सा, अहम् न तलवार, न गोली प...
विश्वास के रंग
कविता

विश्वास के रंग

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** जीवन क्या है..? जीवन का दूसरा नाम है विश्वास जब टूटता है विश्वास टूट जाता है स्वयं इन्सान और तोड़ता है विश्वास मन का शक मन का भ्रम मनगढंत गलतफहमियां शक जब सुलगाता है मन उठता है शक का धुंआ सोच लिपटी रहती है इस धुंए में पनपती है कुंठा जो पनपाती है अविश्वास.... जब पनपने लगे अविश्वास मन सोचता है हर गलत को सही और सही को गलत तब... बदलने लगती है सोच बदली सोच करती है मन भ्रमित भ्रमित मन बदलता चलने की दिशा और... बदल जाती है परिस्थितियां.... बदलते ही परिस्थितियां छाने लगते हैं बादल संकट के और... इन्हीं मेघों की बरसात कर देता है जीना दूभर कुतर्क पर उतर आते हैं मन और मष्तिष्क उलट जाते हैं कर्म जो उलट देते हैं परिणाम.... जीने के लिए जीतना होता है विश्वास कहीं किसी ने जीता है तर...
नीम का पेड़
कविता

नीम का पेड़

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** हर साल की तरह नवोदित हुई एक नई सुबह ले आई जीवन का एक नव वर्ष नव चिंतन, नव मनन ले नव आशाओं का दीप.... जलते ही आस-दीप मानो सिमट गये हों जीवन के अंधेरे मगर ये प्रकाश उघाड़ गया जीवन के प्रत्यक्ष-परोक्ष तन, मन पर लगे आघाती घावों को एक पल खुशी हुई अतीत के सुनहरे पल देख तो कभी व्यथित हुआ मन छद्म हंसी के दुशाले के आवरण में छिपे रेशा-रेशा, रिसते दर्दीले घावों को.... मगर मन ने आज जाना सच्चा साथी है कौन..? वो है मेरा हम उम्र दालान में खड़ा नीम का पेड़ जिसने पिया है छिप-छिप मेरे तिक्त आँसूओ का जल और.. बदलते कैलेंडर में भी मुस्कुराता रहा है और.. होने दिया खारा अपने ही अस्तित्व को मुस्कान स्वरूप रहा हरा-भरा... साक्षी था मेरे हर गुण-दोष रक्त के ढक लेता था सब अपने हरे पत्तों के जाल ...
मन के वैचारिक भूत
कविता

मन के वैचारिक भूत

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** रक्तरंजित माटी ले लहू का लाल रंग पल-पल करती आक्रोशित इंसानी मन चंचलता वश डोलता मन कभी करुण तो कभी क्रोधित अलग समय पर मन के भाव अलग मन बदले पल-पल ... हर बदलते पल राहें बदलती सोच की सब निर्धारित करता है अपना स्वयं का मन जब सोचता है सवार रहते हैं मन पर भांति-भांति के वैचारिक भूत चंद भूत बाहर निकल आते हैं अतीत के दड़बे से कुछ भूत घूमते रहते हैं इंसान के वर्तमान से और... चंद काल्पनिक भूत टपक जाते हैं भविष्य के ऐसे में उलझा रहता है इंसान इन्हीं भूतों के गठबंधन में फंसता जाता है पल-पल ... इंसानी कलेजे में भँवर सा घूमता है उफनती लहरों से रचता रहता है भूतों का अंतर्द्वन्द्व अपना कपोल-कल्पित संसार लोटपोट हो रहता अपने ही भावों के बवंडर में छटपटाता रहता है अद्भुत मगर भयंकर काल्पनिक...
एकाकीपन
कविता

एकाकीपन

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** अनमना सा बच्चा झांक रहा है खिड़की के पार करे भी तो क्या घर में होकर भी वह अकेला है बच्चा ... माँ को वक्त कहाँ है जी रही है आधुनिक परिवेश में व्यस्त है कभी कीट्टी में कभी किसी गोष्ठी में कभी किसी क्लब फंक्शन में तो कभी फैशन शो में वक्त बचता ही कहाँ है खबर लेने, संभालने बच्चा क्या चाहता है वह घर में निपट अकेला है वो मासूम बच्चा ... पिता उलझा है व्यवसायिक उलझनों में व्यवसाय हो या नौकरी समस्या बनी रहती है "कंपीटीटिव मार्केट" जिन्दगी भरी है भांति-भांति की व्यस्तताओं से येन-केन-प्रकारेण थका हारा घर पहुँचता है भान नहीं रहता अर्धरात्रि में सोई है आत्मा लेटता है काँटो भरी सुमन शैया पर वक्त बचता कहाँ जानने का वो चाहता है क्या घर में पड़ा निपट अकेला बच्चा ... टूट रहे संयुक्त परिव...
रिश्तों की अहमियत क्या है
कविता

रिश्तों की अहमियत क्या है

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** रिश्ते क्या है...? और, इनकी अहमियत क्या है..? रिश्तों में अहसास होता है यथार्थ का अनुभूति होती है अनुभव की प्रतीति होती है प्रेम की संवेदन होते हैं सेवा के.... रिश्तों में आवेग होता है प्रीत का उन्माद होता है सुश्रुषा का आशा होती है कर्म की अभिलाषा होती है अपनत्व की.. मगर.... रिश्ते खड़े हैं निजी महत्वाकांक्षा के सहारे आधार होता है अर्थ का सोच मिली होती है स्वार्थ की आवरण अवश्य है अपनेपन का... रिश्तों में तपिश है ईर्ष्या की ज्वालामुखी है प्रतिशोध का प्रकंपन है अविश्वास का संवाद है वर्चस्व का..... रिश्तों में रिसता है छद्म अपनेपन का विरोध खड़ा अपनों से अपनों का अजीब सा अंत होता है सपनों का अनुबंध है मिथ्या कथनों का.. ऐसे में.. अतीत भूल रहे हैं वर्तमान भटक रहा है भविष्य अ...
दृष्टि-दंश
कविता

दृष्टि-दंश

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** प्रश्न कौन करे..? प्रश्नवाचक तो होती हैं इंसानी दृष्टियां किसमें साहस है सत्य सुनने का और... कौन धुरंधर है जो मिथ्या भाषण कर न सके मित्रों..., कुछ तो होते हैं जन्म से दृष्टिहीन संभव है न देख पाते हों वे बाहरी दुनिया मगर... सजग होता है अंतर्मन पूरी समझ होती है अपने निजी स्वार्थ की जैसे थी ऐतिहासिक किरदार धृतराष्ट्र को ... कुछ होते हैं दृष्टिहीन आँखों के होते हुये भी जैस होते हैं वर्तमान में नेता ... पर... प्रलयंकारी होती है वेदनापूर्ण और मर्मांतक आम आदमी के लिए जिसके पास होती है कहने को दृष्टि मगर मूकदृष्टि केवल क्योंकि मुखर होता है अन्याय को सहना हनन होता है नीतियों का चयन होता है अयोग्य का चाहे बहाना कुछ भी हो आरक्षण या फिर सिफारिश ... संस्कार, परंपरा, अनुशासन पथ-प्रदर्...
प्रेम की आधुनिकता
कविता

प्रेम की आधुनिकता

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** 'लव', 'रोमांस', मस्ती और ताजा ताजा "लिव-इन-रिलेशनशिप" अंग बन चुके हैं इन्सानी जीवन के... सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही संस्कारों और परंपराओं से तकरार जीवन में... भारतीय संस्कृति में सदा महत्व रहा है सामाजिक बंधंनों और मर्यादाओं का ताना बाना मगर कहाँ मानती है आज की पीढ़ी राग अलापती है स्वेचछाचारिता और स्वच्छंदता निजी जीवन में... जुनूनी फितरत है प्यार में पागल होना पर क्या अच्छा है अँधा होना भूल जाता है सारे संबंध अपनत्व और रस्मोरिवाज जीवन में... कहाँ कुछ सोचता है उन्माद... आवेग... घुल जाता रक्त संग आवेश रम जाता है सिर्फ प्यार में बदल जाता है व्यवहार वासना कहाँ रह जाती वासना लगता सच्चा प्यार जीवन में... बदलते परिवेश में गलत हो जाते हैं सभी शुभचिंतक, यहाँ तक कि ...
मगर पता कब चला
कविता

मगर पता कब चला

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** समय को सब कुछ सहते देखा मजबूर सत्य को बहकते देखा मगर पता कब चला घर की दीवारों को... गिरने लगे तो फिर गिरते ही गये रास्ते पतन के अविरल बढते गये मगर पता कब चला विश्वास के आधारों को... कदम बढा भी दिये गये अब आगे स्वार्थ के लिए सिद्धांत ऊंचे टांगे मगर कब किसने देखा लौट कर आते सवारों को... हंस हंस कर जीवन जी ही लिया खुशियों को गम छूने ही ना दिया मगर कब किसने देखा नभ में रोते हुये तारों को... चांद के उजालों में रात रोते देखा पाप और धर्म को संग सोते देखा मगर कब किसने देखा खाली होती मजारों को... भाई ने भाई से मुंह फेर लिया संबंधों को सियासत घेर लिया मगर कब किसने देखा जात-धर्म के चटखारों को... नेताओं से डर को सहमते देखा कुर्सी हेतु धर्म को मिटते देखा मगर कब पता चला लुटने का अपने ह...
आँच अहसास की
कविता

आँच अहसास की

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** सुलग रहे मोरे अंग अंग सजना तड़पूं अकेली मनवा चैन न पाये बसंत बयार बहे, मौसम रंगीला तरसे जिया, काहे न पिया आये कूके कोयली, बोले पपीहा विरह-अगन मोरा जिया जराये विरह-अगन से जियरा धधके ननदिया जब शृंगार सजाये फूलवा महके, पाखी चहके देवरानी, जेठानी छेडछाड़ जाये मन ही मन मैं तरसूं घनी जो लहक लहक भाभी रंग उड़ाये देवर होले होले करे इशारे कैसे बचूँ, मोहे समझ न आये आय पिया मोहे उर से लगाओ रातें सर्दी की खाली न जाये चैन मिले जो दीदार करूँ मैं लंबी रतिया मोहे खूब सताये टेर उठे जो माधव मुरलिया की चीर, चीर जाये करजेवा मोरा झंकार उठे पग की पायलिया नयन तन्हा, छलक-छलक जाये सातों सुर हँस सजाये पवनिया इंद्रधनुष रंग नभ में सरसाये इंतज़ार में गौरी पूछे दरवजे से मनवा सरसे,कब पिया आये आँच अहसास ...
मृग नयना तेरे
कविता

मृग नयना तेरे

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** न रात हुई आज पहली बार ना तारे ही निकले पहली बार मगर... अहसास किया दिल नें ये तारे महज तारे कहाँ झाँक रहे हैं हर तारे से चंचल मृग नयना तेरे..... ना पाखी उड़े नभ पहली बार ना फूलों पे भँवरे डोले पहली बार मगर... तेरे मदहोश इशारों ने जगाये अल्लहड़ अरमान कमसिन कजरारे ये बंकिम मृग नयना तेरे...... ना आज बसंत आया पहली बार ना कोयलिया कूकी पहली बार मगर..... सरगम सी उठी झंकृत हुई पायलिया बजाये सुरीले सुर सुलोचन मृग नयना तेरे..... ना घिरी घटायें आज पहली बार ना ही चली पवनवा पहली बार मगर.... चून्नर के लहराने संग लहराये मधुर मीठे सपने भीगे भीगे से यौवन सिंधु में मृदमयी मृग नयना तेरे..... ना झरने झरे आज पहली बार ना भीगी लंबी लटें पहली बार मगर.... भीगी स्याह जुल्फों से शबनम के कणों सी ल...
सियासत
कविता

सियासत

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** सियासत जाल है मकड़ी का साम-दाम-दंड-भेद आधार स्तंभों पर टिका महल सियासत का..... पहला और अंतिम लक्ष्य है पाना सत्ता येन केन प्रकारेण बचाना है अस्तित्व ले कर सहारा सत्ता का..... कहीं छुप कर कहीं खुल कर नदी के दो पाट यहाँ कौन किसका सियासत में रिश्तों का आधार जुर्म सदा सहभागी सत्ता का.... सिद्धांत सदा ताक पर सलामत रहे सदा सत्ता कत्ल कर देते बाप-भाई का मात्र पाने को सत्ता हम हैं आपके कौन यही है मूल मंत्र सत्ता का.... कर दी गई है तुलना गणिका से.... मगर गणिकाओं के भी उसूल होते हैं सिद्धांत हीन होते सत्ता लोभी पूर्ण हो महत्वाकांक्षा यही सिद्धांत होता है सत्ता का...! परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़” निवासी : आनंद विहार, दिल्ली विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में प...
रोम-रोम में प्रीत रमी जब
कविता

रोम-रोम में प्रीत रमी जब

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** रोम-रोम में प्रीत रमी जब शब्दों में उतर छंद बन गई बिखरी जो अँधेरों में हंसी तो मोहक सा वो गीत बन गई अलकों से छलकी जब बूँदे बना मीठा मीसरा ग़ज़ल का नेह धार बही मृगनयनन तो आधार बन गई नज़्मों का गुलज़ार हुये साँसों के स्पंदन बिखर गये मुक्तक सपनों के महका जो चंदन बदन दमकता ढेर लग गया दहकते दोहों का पायल की रूनझुन से निकली बन कर झंकृत सी कुडंलियां वाणी से बहे सरिता शब्दों की खिली माँ शारदे की मनकलियां मन मर्ज़ी से लहके बहके कलम मदहोश चली हिरणी की चाल गीत, कवित्त, छंद मधुर मीत के मन करे फक्कड़ शर्म से लाल परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़” निवासी : आनंद विहार, दिल्ली विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में पद्य व गद्य दोनों विधा में लेखन, अब तक पंद्रह पुस्तकों का प्रकाशन, प...
क्या तब.. क्या अब.. ?
कविता

क्या तब.. क्या अब.. ?

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** मन सोच रहा है कैसे खोल दूँ लब एक अरसे से मूक रहे जो खुलेंगे किस लिए अब…… लबों पर चिन्हित है गहरी मुस्कान मगर जग क्या जाने क्यों सीये थे सुर्ख़ लबों को तब…… आज तलक पनपता रहा आक्रोश गहरी पर्त्तों में रिसता रहा पर्त दर पर्त पीता रहा बूँद बूँद भुलाकर मन की चाहते सब….. पर दबा ही तो रहा,ख़त्म हुआ कहाँ वह आक्रोश मन में सहता रहा,दूसरों की ख़ुशी के लिए होते रहे छेद जिगर में मूक मन उफ़ भी करी कब….. अब होना है अंत यही जब क्या कह दूँ मन की सब जानते हुये भी कि चाहते पूरी नहीं हुई क्या तब….क्या अब…? परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़” निवासी : आनंद विहार, दिल्ली विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में पद्य व गद्य दोनों विधा में लेखन, अब तक पंद्रह पुस्तकों का प्रकाशन, पांच ...
अनुभव
कविता

अनुभव

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** कहा गया है चलती का नाम है जिंदगी इंसान चलता है ता-उम्र पर... क्या सब को मिलती है मंजिल.... इंसान चलता है कदम दर कदम पर... मंज़िल दूर रहती है खिसकती रहती है राहें सिसकती रहती है डगर न जाने कितने चाहे-अनचाहे आते हैं उतार-चढाव जिंदगी की दुर्गम राहों में..... कहीं उपस्थित है उन्नत श्रृंग शिखर सी विकट समस्यायें कहीं उछल रहे हैं दंश मारने को आतुर फुँफकारते विपदा नाग कभी रजनी का स्याह तमस कभी आंनद ओतप्रोत उर्जावान दीप्त दिवाकर कहीं खुशियों के लहराते सागर..... समेटे है अपने आप में ये सर्पीली राहें पग पग कटींली राहें कभी मिलते हैं सुरभित उपवन तो कहीं उगे हैं सरल,गरल, तरल सलिल सींचित कैक्टस मिश्रित अहसास लिए साथ साथ दौड़ती राहें मगर... मंजिल से पहले बहुत कुछ समझाती है ये...
मुँडेर-मुँडेर बिखरी ख़ुशियाँ
कविता

मुँडेर-मुँडेर बिखरी ख़ुशियाँ

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** मुँडेर-मुँडेर बिखरी ख़ुशियाँ टिमटिमाये दीप क़तारों में मन प्रफुल्लित हुआ है आनंदित लक्ष्मी के आकार प्रकारों में झिलमिलाये दीपशिखा की लौ प्रीत जुड़ी प्रीत के तारों से रजनीगंधा सुमन सौरभ ले मुस्काये मधुर बहारों से महक उठे घर आँगन सारे ऋंगार, मिष्ठान, उपहारों से छिप-छिप चिहुंकै नव युगल बजे सरगम गुम सितारों से मन से मन कब मिलते हैं यहाँ स्वार्थ के स्वार्थी अभिसारों से भुल सभी गिले शिकवे पुराने गले मिलो अब निज प्यारों से जीवन दीप जले कोटि कोटि दिवाली मने दूर विकारों से ऋद्धि-सिद्धि बढ़े हो शुभ सब का वरदान मिले ईश अवतारों से परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़” निवासी : आनंद विहार, दिल्ली विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में पद्य व गद्य दोनों विधा में लेखन, अब तक पंद्रह पु...