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मगर पता कब चला

छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
आनंद विहार (दिल्ली)
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समय को सब कुछ सहते देखा
मजबूर सत्य को बहकते देखा
मगर पता कब चला
घर की दीवारों को…

गिरने लगे तो फिर गिरते ही गये
रास्ते पतन के अविरल बढते गये
मगर पता कब चला
विश्वास के आधारों को…

कदम बढा भी दिये गये अब आगे
स्वार्थ के लिए सिद्धांत ऊंचे टांगे
मगर कब किसने देखा
लौट कर आते सवारों को…

हंस हंस कर जीवन जी ही लिया
खुशियों को गम छूने ही ना दिया
मगर कब किसने देखा
नभ में रोते हुये तारों को…

चांद के उजालों में रात रोते देखा
पाप और धर्म को संग सोते देखा
मगर कब किसने देखा
खाली होती मजारों को…

भाई ने भाई से मुंह फेर लिया
संबंधों को सियासत घेर लिया
मगर कब किसने देखा
जात-धर्म के चटखारों को…

नेताओं से डर को सहमते देखा
कुर्सी हेतु धर्म को मिटते देखा
मगर कब पता चला
लुटने का अपने ही सहारों से…

रह रह कर दर्द को हंसते देखा
सौरभ को सुमनों में सिमटते देखा
मगर कब किसे खबर
किया धरा ये सब बहारों का …

परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
निवासी : आनंद विहार, दिल्ली
विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में पद्य व गद्य दोनों विधा में लेखन, अब तक पंद्रह पुस्तकों का प्रकाशन, पांच अनुवाद हिंदी से राजस्थानी में प्रकाशित, राजस्थान साहित्य अकादमी (राजस्थान सरकार) द्वारा, पत्र पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में नियमित प्रकाशन, राजस्थानी लोक गीतों के लिए प्रसिद्ध कंपनी “वीणा कैसेटस” के दो एलबमों में सात गीत संगीतबद्ध हुये हैं।
सम्मान : “राजस्थानी आगीवान” सम्मान से सम्मानित
श्री गंगानगर के सृजन साहित्य संस्थान का सृजन साहित्य सम्मान व
सरदारशहर गौरव (साहित्य) सम्मान व अनेक अन्य सम्मानरा
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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