
छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
आनंद विहार (दिल्ली)
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बिना आग का
धुँआ होता है शक
दम तो घुटेगा ही
जब हो जाये मन धुँआ धुँआ
येे शक
कहते हैं होता है लाइलाज
बस उठता है
धुँआ ही धुँआ
जलती मनाग्नि में
घी का काम करता है
इन्सान का अपना अहम्…..
दायरे विशाल हैं
दुसरे तो सदैव ही रहते हैं
शक के दायरे में
कभी आ जाते हैं खुद
अपने ही शक के दायरे में
मगर कभी कोई पनप पाया है
इन शक के दायरों में….
वर्चस्व जहाँ हो शक का
प्रश्न ही कहाँ उठता है
किसी और के अधिकार या
फिर उसके हक का
बस
सुलगता रहता है धुँआ शक का…
सबसे कमजोर कड़ी होती है
इन्सानी जज्बात और प्यार
वहीं लटकी रहती है सदा
शक की सुई
सड़ांध लाशों की भी
रह जाती है दब कर
जहाँ उठती है महक शक की….
प्रताड़ित करते औरों को
पर स्वयं भी तिल तिल मरते हैं
जहाँ फैला हो दबदबा
बेरहम शक का
मिलती है हार
स्वयं हकीम लुकमान को
बस दिखे बिना
बिना लपट के
आँच सुलगती रहती है
अंदर ही अंदर
कर देती आत्मा जला कर राख
निर्लज्ज ये धुँआ शक का……
परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
निवासी : आनंद विहार, दिल्ली
विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में पद्य व गद्य दोनों विधा में लेखन, अब तक पंद्रह पुस्तकों का प्रकाशन, पांच अनुवाद हिंदी से राजस्थानी में प्रकाशित, राजस्थान साहित्य अकादमी (राजस्थान सरकार) द्वारा, पत्र पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में नियमित प्रकाशन, राजस्थानी लोक गीतों के लिए प्रसिद्ध कंपनी “वीणा कैसेटस” के दो एलबमों में सात गीत संगीतबद्ध हुये हैं।
सम्मान : “राजस्थानी आगीवान” सम्मान से सम्मानित
श्री गंगानगर के सृजन साहित्य संस्थान का सृजन साहित्य सम्मान व
सरदारशहर गौरव (साहित्य) सम्मान व अनेक अन्य सम्मानरा
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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