
कमल किशोर नीमा
उज्जैन (मध्य प्रदेश)
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सेवा निवृत्त होने पर मन अत्यंत प्रसन्न था। सुबह से शाम तक रोज़ाना की भागदौड़ से छुटकारा मिलने की ख़ुशी के साथ यह सोचते हुए घर लौट रहा था कि आज घर मे सब लोग बहुत ख़ुश होगे किन्तु रोज़ आफिस से घर लौटने पर चाय पानी से स्वागत करने वाले आज कोई भी चाय व पानी के लिये नहीं पूछ रहा था। घर का वातावरण एकदम शांत लगने पर मेने पत्नी से पूछा सब ठीक है, उसने भी हाँ मे अपना सिर हिला दिया।
ईश्वर कृपा से बच्चे शिक्षा पूरी कर अच्छे ओहदे पर नौकरी कर रहे थे। घर की समसत रुप से ज़िम्मेदारी पूरी कर भविष्य के जीवन यापन के लिये पर्याप्त धन संचय के साथ किसी प्रकार की चिंता फ़िक्र नहीं थी। समय के इस बदलाव के साथ सुबह देरी से उठना, अनियमित समय भोजन करना, टीवी के सामने दिन गुजारना व देर रात तक जागने के कारण स्वभाव मे चिड़चिड़ापन के साथ स्वास्थ्य भी कुछ ख़राब रहने लगा।
हमारा घर संभ्रांत लोगों की कालोनी के बीच मे था जहाँ अधिकांश लोग सेवा निवृत्त रहते थे, उनका अपना एक समूह घर से कुछ ही दूरी पर बगीचे मे प्रति दिन सुबह घुमने जाना, अपने अनुभव साझा कर हँसी मजाक करना व ताजी हवा मे व्यायाम करना उनकी दिनचर्या बन गई थी।
मेरी पत्नी उनको देखकर मुझे भी उनके साथ घूमने जाने के लिये प्रेरित करती थी लेकिन मुझे सुबह जल्दी उठने का मन नहीं करता था। मेरी पत्नी रोज़ मुझे दिन भर घर मे पड़े रहने का ताना देती रहती थी। एक दिन रोज़ रोज़ के ताने से तंग आकर मैंने कहा कल मुझे सुबह जल्दी उठा देना, मैं भी घूमने जाऊँगा, लगता है बस उसे इसी दिन का इंतज़ार था। दूसरे दिन भुनसारे ही मेरी रज़ाई खींच कर मुझे उठा दिया, नहीं चाहते हुए भी मुझे उठना पड़ा। सुबह की ठंडी कचोट रही थी फिर भी हिम्मत करके कपड़े पहने सर पर टोपी व शाल ओढ़कर किसी अभियान पर जाने की मुद्रा मे घर का दरवाज़ा खोल कर बाहर निकल आया। जैसे ही मैंने घर के बाहर ज़मीन पर क़दम रखा, घनघोर अँधेरा होने से आगे बढ़ने मे कठिनाई महसूस हो रही थी फिर भी कुछ दूरी पर शासकीय विद्युत बल्ब टिमटिमाते हुए अंधकार मे उजाले का एहसास करा रहा था, कुछ आगे बढ़ने पर सड़क के आवारा कुत्ते भों-भों करते हुए मेरी ओर लपके, मैं एक पल को चौंका फिर मुझे पास पड़ा एक पत्थर दिखाई दिया, उसे उठाकर कुत्ते को मारने के अभिनय के साथ हट-हट करते हुए बगीचे तक पहुँच गया। बगीचे में तरह-तरह के पुष्प खिले हुए थे। बगीचे के बीच मे एक छोटासा तालाब था। बहुत सारे पक्षियों की चहचहाहट से वातावरण अत्यंत मनोहारी लग रहा था। बगीचे मे बहुत से लोग घूम रहे थे, जहाँ मुझे दो तीन चिर परिचित लोगों से मुलाक़ात हुई, उन्होंने मेरा स्वागत की मुद्रा मे अभिवादन किया व मुझे अपने अन्य मित्रों से परिचय करवाया। इस प्रकार मैं बगीचे मे कुछ समय व्यतीत कर घर लौट आया। घर लौटने पर किसी विजेता की तरह मेरा चाय नाश्ते से स्वागत हुआ। घर के वातावरण में जैसे रौनक आ गई। मैं चाय नाश्ता कर बिस्तर पर जाकर लेट गया, और नींद की आग़ोश में समा गया। दूसरे दिन फिर मुझे सुबह घूमने जाने के लिए रज़ाई खींच कर उठा दिया। विवश हो तैयार होकर बगीचे मे घूमने जाने के लिये घर से बाहर क़दम रखते ही मुझे मोहल्ले के आवारा कुत्तो का ख़याल आ गया। मुझे घर के अंदर दीवार पर टंगीं बाबूजी की छड़ी की याद आ गई, मैं तुरंत अन्दर गया व बाबूजी की छड़ी हाथ में लेकर बगीचे मे जाने के लिये घर से निकल गया। कल जो कुत्ते भों-भों कर काटने को लपकते थे वे हाथ मे छड़ी देखकर कु कु कर दूर भागने लगे। इस तरह मैं नियमित रूप से घूमने जाने लगा व छड़ी मेरे हाथ का आभूषण बन गई।
परिचय :- कमल किशोर नीमा
पिता : मोतीलाल जी नीमा
जन्म दिनांक : १४ नवम्बर १९४६
शिक्षा : एम.कॉम, एल.एल.बी.
निवासी : उज्जैन (मध्य प्रदेश)
रुचि : आपकी बचपन में व्यायाम शाला में व्यायाम, क्षिप्रा नदी में तैराकी और शिक्षा अध्ययन के साथ कविता, गीत, नाटक लेखन मंचन आदि में गहन रूचि रही है।
व्यवसाय सेवा : आप सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग. सन् १९६४ से सन् १९७० तक एवं सन् १९७१ से सन् २००६ तक के उद्योग जगत के साथ काम करते रहे। सेवा निवृत्ति के बाद ईश्वर की प्रेरणा से पिछले पांच वर्षों से भगवान का भजन आरंभ हुआ है। वर्तमान में लगभग २० भजन लिखे गए हैं, जिनमें १६ भजन यू ट्यूब पर संगीतकार द्वारा संगीतबद्ध करवा कर प्रसारित किए गए हैं जिन्हें यू ट्यूब सनातनम भक्ति २एम स्टूडियो सर्च कर पृथक किया जा सकता है। अयोध्या में श्री राम मंदिर में श्री राम जी की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर टॉवर चौक पर भजन संध्या के अवसर पर आपके द्वारा लिखित भजनों की प्रस्तुति दी गई।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
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