Sunday, January 11राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

भालू और हम

राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
********************

हां हूं मैं भालू,
पर तुम इंसानों
जैसा नहीं हूं चालू,
ऐ मानव मेरी रहवास
क्यों खा जाते हो,
अपनी लालच में आकर
मेरी जंगल मिटाते हो,
हां भालू जी मैँ हूं शर्मिंदा,
तुम्हारे जीवन के कारण
इस दुनिया में मैं हूं जिंदा,
तुम्हारे आक्रामकता
का कारण मैं हूं,
सारे तुम्हारे समस्याओं
का निवारण मैं हूं,
प्रकृति के नियमों
को मैंने छेड़ा है,
अपनी सीमाओं को
लालच में मैंने तोड़ा है,
जरा सोचो जंगल से निकल
रहवास में हम क्यों आते हैं,
तुम पर हम क्रोधित
हो जाते हैं,
मत उजाड़ो मेरा आवास,
तुम गलत हो कैसे
दिलाऊं विश्वास,
अब आपको दिलाता हूं
मैं भरोसा,
सदा मिलजुलकर रहेंगे
नहीं दूंगा मैं धोखा,
यदि मैंने मर्यादा तोड़ा तो
तुम मुझे सबक सिखाना,
बना लेना मुझे दुश्मन मुझ पर
तान देना अपना निशाना।

परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी
निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *