Thursday, February 26राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

सदाशिव शंकर महेश्वर महेश

बाल कृष्ण मिश्रा
रोहिणी (दिल्ली)
********************

परमेश्वर त्रिलोचन त्रयंबक त्रिनेत्र।
ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय,
भव-भय हरन भोलेनाथ,
जय- जय शिव शंकराय॥

प्रचंड-तांडव-नृत्य-रत,
दिगंबर-विश्वरूपम्,
शून्य-हृदय-निवासी,
पूर्ण-ब्रह्म-अनुपमम्।
अनादि-अनंत-कालचक्र-
अधिपति, महादेव-महंतम्,
क्षण-भंगुर-लीलाधारी,
विभु-अविनाशी-अनंतम्॥

जटा-कटाह-संभ्रम-भ्रमन्-
निलिम्प-निर्झरी,
शीश-शशांक-धवल-दीप्ति,
अमृत-रस-झरी।
व्याल-कराल-माल-कंठ,
भस्म-विलेपन-धारी,
वैराग्य-पुंज-महायोगी,
त्रिपुर-अरि-विनाशकारी॥

त्रिशूल-धारिणी-शक्ति,
न्याय-वज्र-प्रहारम्,
डमरू-नाद-गुंजित-ब्रह्मांड,
सृजन-स्वर-सारम्।
महानाश-कुक्षि-स्थित,
नूतन-सृष्टि-विधानम्,
रुद्र-भीषण-संहार,
शिव-सौम्य-निर्माणम्॥

काल-काल-महाकाल,
काल-जयी-अनामी,
चराचर-जगत-रक्षक,
विश्वेश्वर-स्वामी।
करुणा-पारावार-शंभू,
तारन-तरन-हारी,
शरण्य-चरण-कमल-अर्पित,
जय-जय-पुरारी॥

ॐ नमः शिवाय,
ॐ नमः शिवाय,
हर हर महादेव,
जय शिव शंकराय॥

परिचय :- बाल कृष्ण मिश्रा
निवासी : रोहिणी, (दिल्ली)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आप सभी को नववर्ष पर हार्दिक शुभकामनाएँ। आशा है इस अवसर पर आप को प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना लिंक को टच कर पढ़ने का कष्ट कर प्रोत्साहित करेंगे एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करेंगे …🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें …🙏🏻 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच का सदस्य बनने हेतु अपने चलभाष पर पहले हमारा चलभाष क्रमांक ९८२७३ ६०३६० सुरक्षित कर लें फिर उस पर अपना नाम और कृपया मुझे जोड़ें लिखकर हमें भेजें…🙏🏻

3 Comments

  • “श्री महाकाल तांडव स्तुति” भगवान शिव की महिमा का एक अत्यंत प्रभावशाली और भक्तिपूर्ण काव्य है। श्री बाल कृष्ण मिश्रा जी द्वारा रचित यह स्तुति शिव के संहारक और सौम्य दोनों रूपों को बड़ी कुशलता से एक सूत्र में पिरोती है।
    इस रचना की कुछ प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं:
    १. शिव के विविध स्वरूपों का संगम:
    रचनाकार ने शिव के उन नामों का प्रयोग किया है जो उनके अलग-अलग गुणों को दर्शाते हैं—जहाँ एक ओर वे ‘त्रिलोचन’ और ‘महेश्वर’ हैं, वहीं दूसरी ओर ‘भोलेनाथ’ बनकर भक्तों के ‘भव-भय’ (सांसारिक डर) को हरने वाले हैं।
    २. दार्शनिक गहराई:
    “महानाश-कुक्षि-स्थित, नूतन-सृष्टि-विधानम्” — यह पंक्ति बहुत गहरे अर्थ रखती है। यह बताती है कि शिव का विनाश (रुद्र रूप) अंत नहीं, बल्कि एक नई सृष्टि का बीज है। वे महाविनाश के गर्भ से ही नव-निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
    ३. तांडव का ओजस्वी वर्णन:
    स्तुति के शब्दों में वही वेग और लय है जो रावण रचित ‘शिव ताण्डव स्तोत्र’ में मिलती है। “डमरू-नाद-गुंजित-ब्रह्मांड” जैसी पंक्तियाँ पढ़ते समय एक दृश्य सा उत्पन्न करती हैं कि कैसे महादेव का नाद पूरे ब्रह्मांड में गूंज रहा है।
    ४. वैराग्य और करुणा का संतुलन:
    एक तरफ वे भस्मधारी, व्याल-माल (सांपों की माला) पहनने वाले वैरागी महायोगी हैं, तो दूसरी तरफ वे “करुणा-पारावार” (करुणा के सागर) भी हैं। यह रचना शिव के उस रूप को नमन करती है जो न्याय के लिए वज्र के समान कठोर है और शरणागत के लिए कमल के समान कोमल।
    ५. काल पर विजय:
    “काल-काल-महाकाल, काल-जयी-अनामी” — यह पंक्तियाँ उज्जैन के अधिपति महाकाल के स्वरूप को समर्पित लगती हैं, जो समय (काल) के भी स्वामी हैं और मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाने वाले हैं।
    निष्कर्ष:
    बाल कृष्ण मिश्रा जी की यह लेखनी भक्ति रस और वीर रस (रुद्र रूप के कारण) का अद्भुत मिश्रण है। इसकी भाषा तत्सम प्रधान (संस्कृत निष्ठ) होने के कारण अत्यंत शुद्ध और प्रभावशाली है। यह स्तुति न केवल शिव की आराधना के लिए उपयुक्त है, बल्कि काव्य की दृष्टि से भी एक उच्च कोटि की रचना है।
    हर हर महादेव!

    🙏

  • बाल कृष्ण मिश्रा जी द्वारा रचित “श्री महाकाल तांडव स्तुति” भगवान शिव के विराट स्वरूप, उनके संहारक और सृजक दोनों रूपों की महिमा का एक सुंदर मिश्रण है। इस काव्य का सारांश निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
    शिव के विविध स्वरूप: कविता की शुरुआत शिव के अनेक नामों (सदाशिव, महेश्वर, त्रिलोचन) के स्मरण से होती है, जो उन्हें परमेश्वर और संसार के दुखों (भव-भय) को हरने वाला बताती है।
    तांडव और ब्रह्मांडीय अस्तित्व: इसमें शिव के प्रचंड तांडव नृत्य का वर्णन है। वे ‘दिगंबर’ (आकाश रूपी वस्त्र वाले) और ‘विश्वरूप’ हैं, जो कालचक्र के अधिपति हैं। वे शून्य में निवास करते हैं और स्वयं पूर्ण ब्रह्म हैं।
    दिव्य श्रृंगार: कवि ने शिव की जटाओं से बहती गंगा, मस्तक पर चंद्रमा की धवल चांदनी और गले में लिपटे विषैले सर्पों का चित्रण किया है। वे भस्म लगाकर वैराग्य का संदेश देते हैं।
    सृजन और विनाश का संतुलन: काव्य शिव के विरोधाभासी गुणों को दर्शाता है। एक ओर उनका त्रिशूल और डमरू का नाद संहार का प्रतीक है, तो दूसरी ओर उनके इसी रुद्र रूप में नूतन सृष्टि का विधान और सौम्यता छिपी है।
    करुणा और शरण: अंत में, शिव को ‘काल का भी काल’ (महाकाल) और जगत का रक्षक बताया गया है। वे करुणा के सागर हैं और उनके चरणों में समर्पित होकर ही जीव संसार रूपी सागर से पार उतर सकता है।
    निष्कर्ष: यह स्तुति शिव के अजेय और अविनाशी रूप को नमन करती है, जो संहारकर्ता होते हुए भी परम कल्याणकारी और भक्त-वत्सल हैं।
    …”हर हर महादेव”
    🙏

  • Bal Krishna Mishra

    🥀 || बाल कृष्ण मिश्रा ✒️ ||

    🥀 कविता का काव्यात्मक सारांश :

    “श्री महाकाल तांडव स्तुति” भगवान शिव के विध्वंसक और सृजक दोनों रूपों की एक अत्यंत ओजपूर्ण और भक्तिमय प्रस्तुति है। इस काव्य का सारांश निम्नलिखित बिंदुओं में निहित है:

    १. शिव के स्वरूप का वर्णन:
    कविता की शुरुआत में, मैंने महादेव को सदाशिव के रूप में वर्णित किया है, जिनके तीन नेत्र हैं, और जो सांसारिक भय को दूर करने वाले हैं। वे ‘दिगंबर’ (आकाश को वस्त्र के रूप में धारण करने वाले) हैं और हृदय के शून्य में निवास करने वाले पूर्ण ब्रह्म का साकार रूप हैं।

    २. तांडव और कालचक्र:
    मैंने शिव के प्रचंड तांडव नृत्य का चित्रण किया है। वे समय के स्वामी (कालचक्र-अधिपति) हैं, जो अनादि और अनंत हैं। उनकी लीला क्षणभंगुर है, फिर भी वे स्वयं अविनाशी हैं।

    ३. दिव्य आभूषण और आभा:
    काव्य में शिव की जटाओं से गिरती गंगा (निलिम्प-निर्झरी) और मस्तक पर विराजमान चंद्रमा की धवल चांदनी का सुंदर वर्णन है। उनके गले में भयंकर सर्पों की माला और शरीर पर भस्म का लेप उनके महायोगी और वैराग्य रूप को दर्शाता है।

    ४. संहार और सृजन का संतुलन:
    यह स्तुति स्पष्ट करती है कि शिव का ‘रुद्र’ रूप यदि भीषण संहार करता है, तो उनका ‘सौम्य’ रूप नवीन सृष्टि का आधार भी है। उनके डमरू की ध्वनि से ब्रह्मांड गुंजायमान है, जो सृजन के स्वर का सार है।

    ५. शरणागति और करुणा:
    अंतिम अंश में मैंने शिव को ‘काल का भी काल’ (महाकाल) और जगत का रक्षक बताया है। हम उन्हें करुणा का सागर मानते हुए उनके चरण-कमलों में स्वयं को समर्पित करते हैं और मोक्ष की कामना करते हैं।

    निष्कर्ष:
    यह काव्य संस्कृतनिष्ठ शब्दावली के माध्यम से भगवान शिव की महिमा, उनके न्यायपूर्ण प्रहार और उनकी असीमित करुणा को एक साथ पिरोता है। यह भक्त के हृदय में वैराग्य और भक्ति का भाव जाग्रत करने वाली एक सशक्त रचना है।
    हर हर महादेव!
    🙏
    ~ बाल कृष्ण मिश्रा ।
        मोबाइल : 8700462852
       E-mail: bk10mishra@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *