
श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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आज के युग मे मानो
कलियुग प्रगट हो गया है,
लगता है कोई बुरा समय एक
आकर लेकर दुनिया पर छा गया है !
चारों ओर अशांति
विद्रोह और भय व्याप्त हो गया है,
विचारों में जहर और व्यवहार में
आक्रोश हृदय में घर कर गया है !
गलत को सही साबित
करने की कला आ गई है,
झूठ को सच का मुखौटा
पहनने का हुनर आ गया है !
पाप-पुण्य के मायने बदल गए हैं
हर इंसान स्वार्थी हो गया है !
कलयुग कोई तिथि या युग नहीं
जब अनाचार- मन और
विचारों में मे व्याप्त हो जाए,
वही कलयुग अवतरित हो जाता है !
ये मन के पापों की एक अवस्था है,
जो सब कुछ तहस नहस कर देता है,
पाप समाज में नहीं इंसान के भीतर
जन्म लेता है और वही विचार कर्म बनते है !
कलयुग की स्तिथि से हमको
स्वयं से ही बाहर निकलना होगा,
करुना और प्रेम का मार्ग पकड़ना होगा,
कोलाहल नहीं शांति को चुनना होगा!
एकांत रह साधना करनी होगी,
जहां सत्य और झूठ का
अन्तर समझना होगा !
सत्य मे ध्यान लगाना होगा,
ध्यान ही साधना है,
ध्यान ही युद्ध है जो
स्वयं से करना होगा !
ध्यान कोई क्रिया नहीं,
एक आग है जो मन के
विकारों को शुद्ध करती है,
जो साधक ध्यान की
साधना को साध लेगा,
कलयुग उसका कुछ
नहीं बिगाड़ पाएगा !!
परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी
जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी
शिक्षा : एम. ए., एम.फिल – समाजशास्त्र, पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार)
निवासी : लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “जीवदया अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
विशेष : साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के शौक ने लेखन की प्रेरणा दी और विगत ६-७ वर्षों से अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हैं।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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