
छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
आनंद विहार (दिल्ली)
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‘लव’, ‘रोमांस’, मस्ती
और ताजा ताजा
“लिव-इन-रिलेशनशिप”
अंग बन चुके हैं
इन्सानी जीवन के…
सदियों से
पीढ़ी दर पीढ़ी
चलती आ रही
संस्कारों और परंपराओं से
तकरार जीवन में…
भारतीय संस्कृति में
सदा महत्व रहा है
सामाजिक बंधंनों और
मर्यादाओं का ताना बाना
मगर
कहाँ मानती है आज की पीढ़ी
राग अलापती है
स्वेचछाचारिता और स्वच्छंदता
निजी जीवन में…
जुनूनी फितरत है
प्यार में पागल होना
पर
क्या अच्छा है अँधा होना
भूल जाता है सारे संबंध
अपनत्व और रस्मोरिवाज
जीवन में…
कहाँ कुछ सोचता है
उन्माद… आवेग…
घुल जाता रक्त संग आवेश
रम जाता है सिर्फ प्यार में
बदल जाता है व्यवहार
वासना कहाँ रह जाती वासना
लगता सच्चा प्यार जीवन में…
बदलते परिवेश में
गलत हो जाते हैं
सभी शुभचिंतक, यहाँ तक कि
माँ, बाप, सखा
बन जाता है शत्रु
समस्त संसार जीवन में…
उदासीन हो जाता है
निज कर्म से
विमुख हो जाता है व्यापार से
भूल जाता है काम-धंधा
शायद इसीलिए कहा गया है
होता है प्यार अँधा जीवन में…
असल में
माँगता है प्यार
त्याग और बलिदान
मगर… इन कामांधो में
मिलता है
क्षणिक उफान वासना का
लेकर स्वरूप प्रेम का
व्यर्थ लगने लगते हैं
बंधंन, मर्यादा
मन मानने लगता है
उसका प्रेम और वह
सर्व समर्थ है जीवन में…
परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
निवासी : आनंद विहार, दिल्ली
विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में पद्य व गद्य दोनों विधा में लेखन, अब तक पंद्रह पुस्तकों का प्रकाशन, पांच अनुवाद हिंदी से राजस्थानी में प्रकाशित, राजस्थान साहित्य अकादमी (राजस्थान सरकार) द्वारा, पत्र पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में नियमित प्रकाशन, राजस्थानी लोक गीतों के लिए प्रसिद्ध कंपनी “वीणा कैसेटस” के दो एलबमों में सात गीत संगीतबद्ध हुये हैं।
सम्मान : “राजस्थानी आगीवान” सम्मान से सम्मानित
श्री गंगानगर के सृजन साहित्य संस्थान का सृजन साहित्य सम्मान व
सरदारशहर गौरव (साहित्य) सम्मान व अनेक अन्य सम्मानरा
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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