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निस्तब्धता

सुषमा शुक्ला
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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निस्तब्धता जब बोल न पाए, मन भीतर से टूट जाता है,
शब्दों के अभाव में पीड़ा का शोर और गूंज जाता है।

खामोशी की चादर ओढ़े, दर्द अकेला सोता है,
भीड़ में रहकर भी इंसान खुद से ही रोता है।

निस्तब्ध क्षणों में स्मृतियाँ तीखे तीर चलाती हैं,
अनकहे सवाल बनकर रातों की नींद चुराती हैं।

जहाँ संवाद थम जाए, वहाँ संबंध दम तोड़ते हैं,
निस्तब्धता में ही कई अपने पराए हो जाते हैं।

खामोशी का बोझ कभी-कभी शब्दों से भारी है,
यह भीतर-भीतर जलाती है, पीड़ा इसकी न्यारी है।

निस्तब्धता में मन खुद से ही लड़ जाता है,
हर मौन क्षण एक नया घाव दे जाता है।

बिना आवाज़ की पीड़ा भी गहरी चोट लगाती है,
निस्तब्धता अक्सर आत्मा को चुपचाप रुलाती है।

जब भावों को मार्ग न मिले, वे आँसू बन बहते हैं,
निस्तब्धता में ही कई सपने दम तोड़ते रहते हैं।

खामोश रहने की आदत भी कष्ट बन जाती है,
अनकहे जज़्बातों की आग भीतर सुलग जाती है।

निस्तब्धता सुकून नहीं, जब मन अशांत हो जाए,
यह सबसे बड़ा कष्ट बनकर जीवन को थकाए।

परिचय :- सुषमा शुक्ला
निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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