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Tag: सुषमा शुक्ला

मन की मुराद
कविता

मन की मुराद

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मन की मुरादों में बसता प्रेम का मधुर उजास, जिससे महक उठता जीवन, जैसे सावन की मिठास। परिवार के स्नेह से सजता हर आँगन का द्वार, अपनों के संग ही मिलता जीवन को सच्चा प्यार। माँ की ममता, पिता का आशीष अमृत बन जाता, संस्कारों का दीप हृदय में उजियारा फैलाता। देशभक्ति की ज्योति जले तो मन वीर बन जाए, मिट्टी की सौंधी खुशबू जीवन का गौरव कहलाए। तिरंगे की शान हेतु जो सपनों को अर्पित करते, वही राष्ट्र के इतिहास में स्वर्णिम अक्षर भरते। मन की मुराद यही कि हर नारी को मान मिले, उसके श्रम, साहस और सपनों को सम्मान मिले। नारी केवल कोमलता नहीं, शक्ति की पहचान, उसके चरणों से ही खिलता जीवन का मधुबन महान। मन चाहे ऊँचाइयों का हर शिखर सरल हो जाए, मेहनत के हर पथ पर सफलता मुस्कुराए। सत्य, प्रेम और करुणा से जीवन का श्रृंगार...
कतरा-कतरा सागर का
कविता

कतरा-कतरा सागर का

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कतरा-कतरा सागर बनता, बूँद-बूँद में शक्ति समाई, छोटे-छोटे शुभ प्रयासों से जीवन ने मंज़िल पाई। हर अनुभव एक मोती बनकर मन की माला में जुड़ जाता, संघर्षों की हर छोटी लहर साहस का दीपक बन जाता। प्रेम, दया, करुणा के कतरे जब मानव-हृदय में खिलते हैं, सूखी धरती जैसे सावन पाकर हरियाली से मिलते हैं। ज्ञान की हर छोटी किरण अज्ञान का तम हर लेती है, सत्कर्मों की हर बूँद मिलकर जीवन-गंगा भर देती है। आओ हम भी कतरा-कतरा मानवता का सागर भर जाएँ, अपने शुभ कर्मों की लहरों से जग में प्रेम-सुगंध फैलाएँ परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथ...
मन का कुरुक्षेत्र
कविता

मन का कुरुक्षेत्र

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मन के भीतर रोज ही, छिड़ता नया संग्राम। अर्जुन-सा संशय खड़ा, कृष्ण बने सतनाम॥ लोभ-मोह की सेनियाँ, घेरे चारों धाम। विवेक धनुष जब तान दे, मिट जाए अंधियाम॥ क्रोध दुर्योधन बन गया, अहंकारी बलवान। प्रेम-सुदर्शन घूमकर, करे उसे निष्प्राण॥ ईर्ष्या की गांधारियाँ, बाँधे मन के नेत्र। सत्य सूर्य जब उग पड़े, जगमग हो कुरुक्षेत्र॥ कामनाओं के चक्र में, उलझे जीवन-तंतु। संयम बन अभिमन्यु जब, तोड़े सारे बंधु॥ धैर्य भीष्म-सा अटल हो, श्रद्धा बने कवच। विपदा कितनी भी बढ़े, न डिगे मन का रथ॥ सद्गुण पांडव बन खड़े, दुर्गुण कौरव जान। जीत उसी की अंत में, जो रखे धर्म विधानl मन का कुरुक्षेत्र है, जीवन का विस्तार। जो खुद को ही जीत ले, उसका हो उद्धार॥ परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध...
घूंघट की आड़
कविता

घूंघट की आड़

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** (श्रृंगार रस) घूंघट की आड़ में झुकीं वे मृगनयनी आँखें, लज्जा की चाँदनी में सजे अनगिनत मधुर सपने। पलकों की ओट में प्रेम का सागर लहराता, हर चितवन प्रियतम के मन में मधुर राग जगाता। सिंदूरी भोर-सा मुख, मुस्कानों का मधुमास, घूंघट की हर सिलवट में बसता जीवन का उल्लास। नयनों में नवजीवन के रंगीन चित्र सँवरे, हर धड़कन कहती- साथ रहें हम जन्मों-जन्म भरे। लाज से झुकी पलकें, अधरों पर मौन कहानी, मन में प्रीत के दीप जले, महकी जीवन-रानी। सपनों की डोली लेकर आई नव अनुरागिनी, स्नेह, समर्पण, विश्वास बनी घर-आँगन की रागिनी। घूंघट की आड़ नहीं, मन का अनुपम श्रृंगार, जहाँ प्रेम की भाषा बोले हर कोमल व्यवहार। जब उठे घूंघट की कोमल डोरी, मुस्काए सारा संसार, लज्जा, प्रेम और सौंदर्य मिल रच दें जीवन का मधुर त्योहार। परिचय :...
खुद अपना हॉलमार्क बनिए
कविता

खुद अपना हॉलमार्क बनिए

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** खुद अपना हॉलमार्क बनिए, पहचान उधार न लीजिए, सत्य, श्रम और संस्कारों से जीवन का श्रृंगार कीजिए। भीड़ के पीछे चलने से व्यक्तित्व नहीं निखरता है, अपने कर्मों की चमक से ही हर चेहरा सँवरता है। सोने की शुद्धता जैसी हो मन की निर्मलता आपकी, ऐसी छाप छोड़ जाइए कि मिसाल बने हस्ती आपकी। आंधियाँ लाख आएँ पथ में, धैर्य कभी मत खोइए, अपने आदर्शों की ज्योति से हर अंधियारा धोइए। खुद अपना हॉलमार्क बनिए, यही सफलता का सार, चरित्र की खुशबू से महके जीवन का हर द्वार। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेरणा से लेखन का कार्य शुरू...
कमियों सहित स्वीकार्यता
कविता

कमियों सहित स्वीकार्यता

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** पूर्ण कहाँ इस जगत में, मानव का आकार। गुण-अवगुण के संग बना, जीवन का संसार॥ अस्सी गुण हों यदि किसी, बीस रहें कमजोर। उन कमियों को मानकर, बढ़ता प्रेम का दौर॥ चालीस गुण यदि मिलें, साठ रहें अनजान। फिर भी उसमें ढूँढ़िए, मानवता की शान॥ दोष न गिनते रहिए सदा, गुण पर दीजै ध्यान। कमियों संग जो अपनाए, वही बड़ा इंसान॥ चाँद स्वयं निष्कलंक कब, दाग लिए मुस्काय। फिर मानव से पूर्णता, क्यों जग आशा लगाए॥ रिश्तों की मधुरता तभी, रहती सदा अटूट। जब कमियों को छोड़कर, गुणों से जाएँ छूट॥ स्वीकारों के फूल से, महके हर व्यवहार। त्रुटियाँ भी प्रिय लगें, जब हो सच्चा प्यार॥ शिव ही केवल पूर्ण हैं, शेष सभी अपूर्ण। कमियों सहित जो मान ले, उसका जीवन पूर्ण॥ परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निव...
रंगत से अधिक संगत को संभालिए
कविता

रंगत से अधिक संगत को संभालिए

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** रंगत तो पल में बदल जाए, संगत जीवन गढ़ जाती है, अच्छे लोगों की छाया में, किस्मत भी मुस्काती है। रंगत चेहरे की धूप-छाँव, समय के संग ढल जाती है, संगत सच्ची मिल जाए तो, राह नई बन जाती हैl रंगत बाहरी चमक-दमक, मन को कहाँ सजाती है, संगत सच्ची हो अगर, आत्मा भी महक जाती है। रंगत झूठी दिखावा है, जो क्षण भर में मिट जाती है, संगत सच्ची दीपक बन, हर अंधेरा हर जाती है। रंगत से मत धोखा खाना, यह तो आँख भरमाती है, संगत की पहचान करो, यही राह दिखलाती है। रंगत से रिश्ते ना जोड़ो, ये अक्सर टूट जाते हैं, संगत सच्ची निभ जाए तो, जीवन फूल खिलाते हैं। रंगत चाहे जैसी हो, दिल को क्या समझाती है, संगत अच्छी हो तो जीवन, खुशियों से भर जाती है। रंगत के पीछे भागे जो, अक्सर पछताते हैं, संगत सही चुनने वाले, मंजिल तक जाते हैं। रंगत त...
सशक्त लेखनी
कविता

सशक्त लेखनी

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** लेखनी जब सत्य की अग्नि में तपकर निकलती है, तो सोई हुई चेतना भी जागकर संभलती है। शब्दों की शक्ति तलवार से भारी होती है, सशक्त लेखनी ही समाज की प्रहरी होती है। कलम जब अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाती है, हर मौन आत्मा में नई हिम्मत जगाती है। लेखनी केवल अक्षरों का श्रृंगार नहीं होती, यह मानवता की राह दिखाने वाली ज्योति होती। जिसके शब्दों में संवेदना और सम्मान होता है, उसकी लेखनी से ही राष्ट्र का उत्थान होता है। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेरणा से लेखन का कार्य शुरू किया। धर्म...
उन्नति का दीप
कविता

उन्नति का दीप

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** उत्तरोत्तर उन्नति का दीप, संघर्षों से जलता है, प्रखर लेखनी का हर अक्षर, यश का पथ बनता है। काँटों वाली राहों में भी, जिसने हिम्मत थामी है, उसकी लेखनी ने जग में, अपनी छाप निभाई है। शब्दों में जब सत्य जगे, तब सम्मान स्वयं आता, संघर्षों की तपती धूप, यश का चंदन बन जाता। मेहनत की स्याही से जब, सपनों को आकार मिले, प्रखर विचारों की गाथा, हर मन को उपहार मिले। गिरकर फिर उठ जाना ही, उन्नति का आधार बना, लेखनी की दृढ़ता से ही, जीवन का विस्तार बना। यश की सीढ़ी चढ़ने को, धैर्य जरूरी होता है, संघर्षों का हर अनुभव, लेखन में मोती होता है। जिसने पीड़ा को शब्दों की, शक्ति बना कर गाया है, उसकी प्रखर लेखनी ने, जग में मान बढ़ाया है। उत्तरोत्तर उन्नति वहीं, जहाँ कर्म निरंतर हो, लेखनी में तेज वही, जिसमें संघर्ष समंदर हो ...
मन की मुराद
कविता

मन की मुराद

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** मन की मुरादों में बसता प्रेम का मधुर उजास, जिससे महक उठता जीवन, जैसे सावन की मिठास। परिवार के स्नेह से सजता हर आँगन का द्वार, अपनों के संग ही मिलता जीवन को सच्चा प्यार। माँ की ममता, पिता का आशीष अमृत बन जाता, संस्कारों का दीप हृदय में उजियारा फैलाता। देशभक्ति की ज्योति जले तो मन वीर बन जाए, मिट्टी की सौंधी खुशबू जीवन का गौरव कहलाए। तिरंगे की शान हेतु जो सपनों को अर्पित करते, वही राष्ट्र के इतिहास में स्वर्णिम अक्षर भरते। मन की मुराद यही कि हर नारी को मान मिले, उसके श्रम, साहस और सपनों को सम्मान मिले। नारी केवल कोमलता नहीं, शक्ति की पहचान, उसके चरणों से ही खिलता जीवन का मधुबन महान। मन चाहे ऊँचाइयों का हर शिखर सरल हो जाए, मेहनत के हर पथ पर सफलता मुस्कुराए। सत्य, प्रेम और करुणा से जीवन का श्रृंगार ह...
तलाक
कविता

तलाक

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** रिश्तों में संवाद का दीप जब धीमे-धीमे बुझ जाता है, तब साथ रहते हुए भी मन का आँगन सूना रह जाता है। अहंकार की ऊँची दीवारें दिलों के बीच खड़ी हो जाती हैं, "मैं" की जिद में "हम" की डोर अक्सर टूट सी जाती है। विश्वास की नींव हिलते ही घरौंदा बिखरने लगता है, शंका का एक बीज भी जीवन को ज़हर करने लगता है। समय की कमी और व्यस्तता रिश्तों को दूर कर देती है, पास रहकर भी दूरी, जीवन को मजबूर कर देती है। अपेक्षाओं का बोझ जब हद से ज्यादा बढ़ जाता है, तब प्रेम का कोमल पौधा भी मुरझा सा जाता है। धैर्य और सहनशीलता आज कम होती जा रही है, छोटी-छोटी बातों पर भी डोर टूटती जा रही है। (उपाय) यदि संवाद का दीप फिर से दोनों मिलकर जलाएं, तो बिखरे हुए रिश्ते भी मुस्कुराकर फिर जुड़ जाएं। (उपाय) अहंकार को त्याग कर यदि प्रेम को स्थान द...
सुभद्रा कुमारी चौहान
कविता

सुभद्रा कुमारी चौहान

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** वीरत्व की ज्वाला से दहकती, वाणी में था हुंकार, जन-जन में जागृत करतीं वे, स्वाधीनता का संचार। कलम बनी जब शस्त्र उनका, शब्द बने रणभेरी, रानी की गाथा गाकर, भर दी हिम्मत अनेरी। नारी शक्ति का रूप प्रखर, साहस जिनका आभूषण, अंग्रेजी सत्ता से टकराईं, लेकर स्वाभिमान का वचन। झांसी की वीरांगना का, गाया अमर गान, आज भी गूंजे भारत में, उनका ओजस्वी सम्मान। ऐसी वंदनीय कवयित्री को, शत-शत नमन हमारा, वीर रस की वह अमिट ज्योति, जग में रहे उजियारा। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेरणा से लेखन क...
बोलती आंखें
कविता

बोलती आंखें

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** बोलती आँखें कहानियाँ सुनाएँ, बिना शब्द सब कह जाती, चमकती आँखों की रौशनी में, हर भावना झिलमिलाती। गहराई वाली आँखों में, सागर सा राज छिपा होता, जो डूबे इनकी लहरों में, वो खुद से भी मिल जाता। पनीली आँखों की नमी में, दर्द भी मोती बन जाता, हर आँसू चुपके से दिल का, कोई राज बता जाता। कवियों ने इन आँखों को, चाँद-सितारों से सजाया, कभी काजल की धारा बोली, कभी इश्क़ का रंग चढ़ाया। कभी इन्हें नयन-कमल कहा, कभी प्रेम का दीपक माना, कभी विरह की अग्नि बताई, कभी स्नेह का मधुर तराना। इनकी भाषा अनोखी होती, शब्दों से परे ये बोलें, कभी हँसी के फूल खिलाएँ, कभी दुख के बादल घोलें। आँखें ही दिल का आईना, हर सच्चाई दिखलाती, जो छिप जाए लबों से, वो चुपके से कह जाती। बोलती, चमकती, गहरी, पनीली-हर रूप निराला होता, आँख...
अंजनीसुत कुलदेव हमारे
भजन

अंजनीसुत कुलदेव हमारे

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** कुलदेव हमारे अंजनीसुत, संकट हरने वाले, भक्ति-दीप से सजे थाल में प्रेम-सुमन हम ढाले। घी-गुड़, चूरमा, लड्डू लेकर भावों का श्रृंगार, अर्पित करते चरणों में हम, मिटे सकल संताप अपार। भोग नहीं बस अन्न मात्र, यह श्रद्धा का उजियारा, हर कण में बसता विश्वास, हर कण में है सहारा। रुई-सी कोमल भावना से सजी हुई हर थाली, जैसे मन की सरल प्रार्थना पहुँचे उनकी ड्योढ़ी प्यारी। बजरंगबली के चरणों में जब अर्पित हो अन्न, तब मिट जाते दुःख सभी, हो जाता जीवन धन्य। सिंदूर सजा, चोला दमके, गूंजे जय-जयकार, भोग के संग झूम उठे मन, हो जाए मंगलाचार। कुलदेव की कृपा से ही तो घर में सुख का वास, उनकी छाया में कटता है जीवन का हर त्रास। एक लड्डू में छिपा हुआ आशीषों का सागर, जो ग्रहण करे श्रद्धा से, हो जाए भव से पार। हे पवनसुत, स्वीकार करो यह प्र...
रंगत से अधिक संगत को संभालिए
कविता

रंगत से अधिक संगत को संभालिए

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** रंगत तो पल में बदल जाए, संगत जीवन गढ़ जाती है, अच्छे लोगों की छाया में, किस्मत भी मुस्काती है। रंगत चेहरे की धूप-छाँव, समय के संग ढल जाती है, संगत सच्ची मिल जाए तो, राह नई बन जाती हैl रंगत बाहरी चमक-दमक, मन को कहाँ सजाती है, संगत सच्ची हो अगर, आत्मा भी महक जाती है। रंगत झूठी दिखावा है, जो क्षण भर में मिट जाती है, संगत सच्ची दीपक बन, हर अंधेरा हर जाती है। रंगत से मत धोखा खाना, यह तो आँख भरमाती है, संगत की पहचान करो, यही राह दिखलाती है। रंगत से रिश्ते ना जोड़ो, ये अक्सर टूट जाते हैं, संगत सच्ची निभ जाए तो, जीवन फूल खिलाते हैं। रंगत चाहे जैसी हो, दिल को क्या समझाती है, संगत अच्छी हो तो जीवन, खुशियों से भर जाती है। रंगत के पीछे भागे जो, अक्सर पछताते हैं, संगत सही चुनने वाले, मंजिल तक जात...
सिलेंडर भैया
कविता

सिलेंडर भैया

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** सिलेंडर भैया आजकल बड़ी किल्लत मचाए, रसोई में जैसे सन्नाटा सा छाए। चूल्हे की हंसी अब कहीं खो सी गई, बिना तुम्हारे रसोई भी रो सी गई। भूखे से बर्तन खामोश पड़े हैं, जैसे सब सपने कहीं दूर खड़े हैं। आटे की लोई भी इंतजार में है, तवा भी जैसे किसी पुकार में है। रसोई की रानी अब उदास बैठी है, आंच बिना हर खुशबू रूठी है। चाय की चुस्की भी अधूरी लगती, सुबह की रौनक भी फीकी सी लगती। तुम बिन हर स्वाद अधूरा लगता, हर पकवान अब बेसूरा लगता। जल्दी आओ, रसोई में रंग भर दो, हर चेहरे पर फिर से उमंग भर दो। सिलेंडर भैया, अब देर न लगाओ, रसोई की खुशियों को फिर से लौटाओl परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश...
सफेद पोश
कविता

सफेद पोश

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** आज समाज के सभागारों में खामोशी का साम्राज्य क्यों है, सफेदपोश चेहरों पर सन्नाटा, अंतरमन में आज भी राज क्यों है। जब अन्याय की आंधी चलती है, दीपक भी कांपने लगते हैं, पर विचारों के सूर्य होकर भी, ये लोग मौन में ढलने लगते हैं। भीष्म, पांडव, विदुर की तरह सब दृश्य निहारते रह जाते हैं, सत्य सामने रोता रहता, ये कर्तव्य से नज़र चुराते हैं। कलम जिनकी तलवार थी, आज म्यान में सोई क्यों है, विवेक की आवाज़ होते हुए भी, अंतरात्मा खोई क्यों है। सम्मानित मस्तिष्कों का मौन, समाज को पीड़ा देता है, जब प्रहरी ही सो जाए तो, अन्याय खुलकर जीता है। उठो, तुम्हारी वाणी में ही परिवर्तन का सार छिपा है, मौन तो केवल बंधन है, सत्य बोलना ही असली तप है। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मू...
लाला लाजपत राय : चरित्र की शिल्पशाला
कविता

लाला लाजपत राय : चरित्र की शिल्पशाला

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** पंजाब की माटी ने जिस दीप को थामा, त्याग की लौ में तपकर वह सूरज बन जाना। वाणी में वेदना, दृष्टि में निर्भीक राय, चरित्र की शिल्पशाला थे लाला लाजपत राय। जहाँ राष्ट्र प्रथम, वहाँ स्वार्थ का अंत हुआ, न्याय की कसौटी पर हर भय स्वयं झुक हुआ। कर्म ही उपासना, संघर्ष ही उनका मार्ग, आत्मबल से गढ़ा उन्होंने जीवन का सुदृढ़ शिल्पकार्ग। साइमन की लाठियाँ जब देह पर बरसीं घोर, अभिमान नहीं टूटा, बढ़ा स्वाधीनता का शोर। रक्त की स्याही से लिखी आज़ादी की गाथा, मौन शहादत बनकर भी बोल उठी उनकी व्यथा शिक्षा, समाज, स्वराज-तीनों का समन्वय भाव, विचारों की कार्यशाला, कर्मों का उज्ज्वल प्रभाव। युवक को साहस सिखाया, जन-जन को दिया विश्वास, चरित्र की गढ़ाई में था उनका प्रत्येक प्रयास। आज भी समय की भट्टी में जब मूल्य पिघलते जाएँ, लाला जी क...
हिंदी आत्मा में बस्ती
कविता

हिंदी आत्मा में बस्ती

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** हिंदी आत्मा में बस्ती है, संस्कारों की उजली हस्ती है। माँ की लोरी, पिता का विश्वास, मिट्टी की सोंधी खुशबू-सी पास- हर धड़कन में इसकी मस्ती है। यह भाषा केवल शब्द नहीं, यह भावों की निर्मल सरिता है। आँसू बनकर भी चुपके बहती, मुस्कान बन ओठों पर ठहरती- हिंदी जीवन की स्वर गीत है। तुलसी की चौपाइयों में धर्म, मीरा के पदों में प्रेम पुकारे। रसखान की भक्ति में डूबी हुई, कबीर की वाणी में सत्य जली- हिंदी युग-युग तक पथ रहे भली। यह खेतों की हरियाली बोले, यह श्रमिक के पसीने की गंध। यह पर्वों की थाली सजाए, यह त्याग, तपस्या का संदेश- जन-जन की आशा की है कंध। जब तक आत्मा में प्राण बसे, हिंदी का दीप जलता रहेगा। समय बदले, दुनिया बदले, पर संस्कृति का यह अमिट स्वर- हृदय-हृदय में पलता रहेगा। परिचय :- सुषमा शुक्ला ...
मन की नम् माटी
कविता

मन की नम् माटी

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** मन की नम मिट्टी में जब भावों का बीज गिराया, आँखों की कोरों ने चुपके से जल बरसाया। पीड़ा की हल्की धूप में सपनों ने अंगड़ाई ली, आशा की कोमल कोंपल ने फिर मुस्कान सजाया। मन की नम मिट्टी में श्रद्धा का दीप जले, विश्वास की खुशबू से जीवन के आँगन पले। संघर्षों की धूल भले ही राहों में बिखर जाए, धैर्य की फसल उगे तो भाग्य के द्वार खुले। मन की नम मिट्टी में रिश्तों के फूल खिलें, ममता की सरिता बहे, प्रेम के मोती मिलें। अंतर की करुणा जब बन जाए हरियाली, सूखे से जीवन में फिर सावन झूमे खिलें। मन की नम मिट्टी में संस्कारों की जड़ हो, सत्य की धूप मिले, मर्यादा का अंकुर हो। लोभ की आँधी आए तो भी न डिग पाए, नीति का वटवृक्ष बने, आदर्शों का स्वर हो। मन की नम मिट्टी में ईश्वर का नाम पले, भक्ति का अंकुर फूटे, आत्मा के दीप जले। ...
रामायण सार
कविता

रामायण सार

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** (१) आदर्शों की अयोध्या में जन्मा मर्यादा का उजास, राम बने धर्म-दीप, जिनसे जग ने सीखा विश्वास। राजा दशरथ की वाणी, वचन बना पथ का शूल, त्याग की कसौटी पर चढ़ा, राजसिंहासन का मूल। (२) वन-पथ पर संग सीता, लक्ष्मण बने छाया-सार, कांटों में भी खिला कुसुम, प्रेम रहा आधार। शबरी के बेरों में मिला भक्ति का निर्मल स्वाद, साधारण हृदय में बसता, ईश्वर का संवाद। (३) अहंकार के रथ पर चढ़ा, लंका का वह अभिमान, सीता-हरण से काँप उठा, मानव-मूल्य विधान। अशोक-वाटिका में धैर्य, दीपक-सा जलता रहा, नारी-सम्मान का शिखर, इतिहास लिखता रहा। (४) हनुमान बने सेतु-स्वप्न, शक्ति का संयम रूप, वानर-सेना ने बाँधा, आशा का दृढ़ अनूप। राम-रावण संग्राम में, नीति ने पाई जीत, अधर्म ढहा, धर्म उठा, सत्य हुआ प्रतिष्ठित। (५) अयोध्या लौटा उजियारा, दीपों...
कोई पूछे तो धन्यवाद ना पूछे तो प्रसाद
कविता

कोई पूछे तो धन्यवाद ना पूछे तो प्रसाद

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** कोई पूछे तो धन्यवाद, ना पूछे तो समझो प्रसाद, सेवा का सच्चा सुख मिले, बस इतना ही है इराद। मनुष्य जिए अपने लिए, स्वस्थ रहे, सुखी रहे, दिखावे की चादर ओढ़े क्यों, सच मन में ही रुके रहे। सेवा यदि की निस्वार्थ भाव से, फल उसका तुम पाओगे, तालियाँ चाहे कम मिलें, भीतर दीप जलाओगे। प्रशंसा की प्यास छोड़ दो, कर्म को ही साथी मान, जो बोओगे वही उगेगा, यही है जीवन का विधान। जो करते हो स्वयं के सुख को, वही सच्चा उत्सव है, बिना दिखावे का जीवन ही, सबसे बड़ा अनुभव है। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेर...
एक सिक्के के दो पहलू समस्या और समाधान
कविता

एक सिक्के के दो पहलू समस्या और समाधान

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** जीवन एक सिक्का है, दो पहलू संग लाता है, एक तरफ़ समस्या खड़ी, दूजा राह दिखाता है। छाया संग धूप चले, यह जग का है विधान, दुख की काली रात में ही, जागे सुख की पहचान। काँटों से घबराए जो, फूलों तक ना पहुँच पाए, जो ठोकर को समझे पाठ, वही मंज़िल को अपनाए। हर उलझन एक पहेली है, जो हल माँगती जाती, धैर्य अगर साथी बन जाए, राह स्वयं बन जाती। समस्या जब सिर उठाए, मन थोड़ा घबराता है, समाधान वहीं छुपा होता, जहाँ डर सताता है। आंधी से जो टकराएगा, वही दीप बन पाएगा, हिम्मत की लौ जलाकर ही, अंधियारा हट पाएगा। शिकायत से कुछ न मिले, बस मन बोझिल होता है, प्रयासों की चाबी से ही, हर ताला फिर खुलता है। ठहराव नहीं जीवन में, संघर्ष ही पहचान, गिरकर फिर से उठ जाना, यही असली सम्मान। सिक्का जब तक चलता है, कीमत वही बताता, रुक जाए जो ...
हिंदी आत्मा में बस्ती
कविता

हिंदी आत्मा में बस्ती

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** हिंदी आत्मा में बस्ती है, संस्कारों की उजली हस्ती है। माँ की लोरी, पिता का विश्वास, मिट्टी की सोंधी खुशबू-सी पास हर धड़कन में इसकी मस्ती है। यह भाषा केवल शब्द नहीं, यह भावों की निर्मल सरिता है। आँसू बनकर भी चुपके बहती, मुस्कान बन ओठों पर ठहरती हिंदी जीवन की स्वर गीत है। तुलसी की चौपाइयों में धर्म, मीरा के पदों में प्रेम पुकारे। रसखान की भक्ति में डूबी हुई, कबीर की वाणी में सत्य जली हिंदी युग-युग तक पथ रहे भली। यह खेतों की हरियाली बोले, यह श्रमिक के पसीने की गंध। यह पर्वों की थाली सजाए, यह त्याग, तपस्या का संदेश जन-जन की आशा की है कंध। जब तक आत्मा में प्राण बसे, हिंदी का दीप जलता रहेगा। समय बदले, दुनिया बदले, पर संस्कृति का यह अमिट स्वर हृदय-हृदय में पलता रहेगा। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म ...
निस्तब्धता
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निस्तब्धता

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** निस्तब्धता जब बोल न पाए, मन भीतर से टूट जाता है, शब्दों के अभाव में पीड़ा का शोर और गूंज जाता है। खामोशी की चादर ओढ़े, दर्द अकेला सोता है, भीड़ में रहकर भी इंसान खुद से ही रोता है। निस्तब्ध क्षणों में स्मृतियाँ तीखे तीर चलाती हैं, अनकहे सवाल बनकर रातों की नींद चुराती हैं। जहाँ संवाद थम जाए, वहाँ संबंध दम तोड़ते हैं, निस्तब्धता में ही कई अपने पराए हो जाते हैं। खामोशी का बोझ कभी-कभी शब्दों से भारी है, यह भीतर-भीतर जलाती है, पीड़ा इसकी न्यारी है। निस्तब्धता में मन खुद से ही लड़ जाता है, हर मौन क्षण एक नया घाव दे जाता है। बिना आवाज़ की पीड़ा भी गहरी चोट लगाती है, निस्तब्धता अक्सर आत्मा को चुपचाप रुलाती है। जब भावों को मार्ग न मिले, वे आँसू बन बहते हैं, निस्तब्धता में ही कई सपने दम तोड़ते रहते हैं। खा...