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Tag: सुषमा शुक्ला

अंजनीसुत कुलदेव हमारे
भजन

अंजनीसुत कुलदेव हमारे

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** कुलदेव हमारे अंजनीसुत, संकट हरने वाले, भक्ति-दीप से सजे थाल में प्रेम-सुमन हम ढाले। घी-गुड़, चूरमा, लड्डू लेकर भावों का श्रृंगार, अर्पित करते चरणों में हम, मिटे सकल संताप अपार। भोग नहीं बस अन्न मात्र, यह श्रद्धा का उजियारा, हर कण में बसता विश्वास, हर कण में है सहारा। रुई-सी कोमल भावना से सजी हुई हर थाली, जैसे मन की सरल प्रार्थना पहुँचे उनकी ड्योढ़ी प्यारी। बजरंगबली के चरणों में जब अर्पित हो अन्न, तब मिट जाते दुःख सभी, हो जाता जीवन धन्य। सिंदूर सजा, चोला दमके, गूंजे जय-जयकार, भोग के संग झूम उठे मन, हो जाए मंगलाचार। कुलदेव की कृपा से ही तो घर में सुख का वास, उनकी छाया में कटता है जीवन का हर त्रास। एक लड्डू में छिपा हुआ आशीषों का सागर, जो ग्रहण करे श्रद्धा से, हो जाए भव से पार। हे पवनसुत, स्वीकार करो यह प्र...
रंगत से अधिक संगत को संभालिए
कविता

रंगत से अधिक संगत को संभालिए

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** रंगत तो पल में बदल जाए, संगत जीवन गढ़ जाती है, अच्छे लोगों की छाया में, किस्मत भी मुस्काती है। रंगत चेहरे की धूप-छाँव, समय के संग ढल जाती है, संगत सच्ची मिल जाए तो, राह नई बन जाती हैl रंगत बाहरी चमक-दमक, मन को कहाँ सजाती है, संगत सच्ची हो अगर, आत्मा भी महक जाती है। रंगत झूठी दिखावा है, जो क्षण भर में मिट जाती है, संगत सच्ची दीपक बन, हर अंधेरा हर जाती है। रंगत से मत धोखा खाना, यह तो आँख भरमाती है, संगत की पहचान करो, यही राह दिखलाती है। रंगत से रिश्ते ना जोड़ो, ये अक्सर टूट जाते हैं, संगत सच्ची निभ जाए तो, जीवन फूल खिलाते हैं। रंगत चाहे जैसी हो, दिल को क्या समझाती है, संगत अच्छी हो तो जीवन, खुशियों से भर जाती है। रंगत के पीछे भागे जो, अक्सर पछताते हैं, संगत सही चुनने वाले, मंजिल तक जात...
सिलेंडर भैया
कविता

सिलेंडर भैया

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** सिलेंडर भैया आजकल बड़ी किल्लत मचाए, रसोई में जैसे सन्नाटा सा छाए। चूल्हे की हंसी अब कहीं खो सी गई, बिना तुम्हारे रसोई भी रो सी गई। भूखे से बर्तन खामोश पड़े हैं, जैसे सब सपने कहीं दूर खड़े हैं। आटे की लोई भी इंतजार में है, तवा भी जैसे किसी पुकार में है। रसोई की रानी अब उदास बैठी है, आंच बिना हर खुशबू रूठी है। चाय की चुस्की भी अधूरी लगती, सुबह की रौनक भी फीकी सी लगती। तुम बिन हर स्वाद अधूरा लगता, हर पकवान अब बेसूरा लगता। जल्दी आओ, रसोई में रंग भर दो, हर चेहरे पर फिर से उमंग भर दो। सिलेंडर भैया, अब देर न लगाओ, रसोई की खुशियों को फिर से लौटाओl परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश...
सफेद पोश
कविता

सफेद पोश

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** आज समाज के सभागारों में खामोशी का साम्राज्य क्यों है, सफेदपोश चेहरों पर सन्नाटा, अंतरमन में आज भी राज क्यों है। जब अन्याय की आंधी चलती है, दीपक भी कांपने लगते हैं, पर विचारों के सूर्य होकर भी, ये लोग मौन में ढलने लगते हैं। भीष्म, पांडव, विदुर की तरह सब दृश्य निहारते रह जाते हैं, सत्य सामने रोता रहता, ये कर्तव्य से नज़र चुराते हैं। कलम जिनकी तलवार थी, आज म्यान में सोई क्यों है, विवेक की आवाज़ होते हुए भी, अंतरात्मा खोई क्यों है। सम्मानित मस्तिष्कों का मौन, समाज को पीड़ा देता है, जब प्रहरी ही सो जाए तो, अन्याय खुलकर जीता है। उठो, तुम्हारी वाणी में ही परिवर्तन का सार छिपा है, मौन तो केवल बंधन है, सत्य बोलना ही असली तप है। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मू...
लाला लाजपत राय : चरित्र की शिल्पशाला
कविता

लाला लाजपत राय : चरित्र की शिल्पशाला

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** पंजाब की माटी ने जिस दीप को थामा, त्याग की लौ में तपकर वह सूरज बन जाना। वाणी में वेदना, दृष्टि में निर्भीक राय, चरित्र की शिल्पशाला थे लाला लाजपत राय। जहाँ राष्ट्र प्रथम, वहाँ स्वार्थ का अंत हुआ, न्याय की कसौटी पर हर भय स्वयं झुक हुआ। कर्म ही उपासना, संघर्ष ही उनका मार्ग, आत्मबल से गढ़ा उन्होंने जीवन का सुदृढ़ शिल्पकार्ग। साइमन की लाठियाँ जब देह पर बरसीं घोर, अभिमान नहीं टूटा, बढ़ा स्वाधीनता का शोर। रक्त की स्याही से लिखी आज़ादी की गाथा, मौन शहादत बनकर भी बोल उठी उनकी व्यथा शिक्षा, समाज, स्वराज-तीनों का समन्वय भाव, विचारों की कार्यशाला, कर्मों का उज्ज्वल प्रभाव। युवक को साहस सिखाया, जन-जन को दिया विश्वास, चरित्र की गढ़ाई में था उनका प्रत्येक प्रयास। आज भी समय की भट्टी में जब मूल्य पिघलते जाएँ, लाला जी क...
हिंदी आत्मा में बस्ती
कविता

हिंदी आत्मा में बस्ती

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** हिंदी आत्मा में बस्ती है, संस्कारों की उजली हस्ती है। माँ की लोरी, पिता का विश्वास, मिट्टी की सोंधी खुशबू-सी पास- हर धड़कन में इसकी मस्ती है। यह भाषा केवल शब्द नहीं, यह भावों की निर्मल सरिता है। आँसू बनकर भी चुपके बहती, मुस्कान बन ओठों पर ठहरती- हिंदी जीवन की स्वर गीत है। तुलसी की चौपाइयों में धर्म, मीरा के पदों में प्रेम पुकारे। रसखान की भक्ति में डूबी हुई, कबीर की वाणी में सत्य जली- हिंदी युग-युग तक पथ रहे भली। यह खेतों की हरियाली बोले, यह श्रमिक के पसीने की गंध। यह पर्वों की थाली सजाए, यह त्याग, तपस्या का संदेश- जन-जन की आशा की है कंध। जब तक आत्मा में प्राण बसे, हिंदी का दीप जलता रहेगा। समय बदले, दुनिया बदले, पर संस्कृति का यह अमिट स्वर- हृदय-हृदय में पलता रहेगा। परिचय :- सुषमा शुक्ला ...
मन की नम् माटी
कविता

मन की नम् माटी

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** मन की नम मिट्टी में जब भावों का बीज गिराया, आँखों की कोरों ने चुपके से जल बरसाया। पीड़ा की हल्की धूप में सपनों ने अंगड़ाई ली, आशा की कोमल कोंपल ने फिर मुस्कान सजाया। मन की नम मिट्टी में श्रद्धा का दीप जले, विश्वास की खुशबू से जीवन के आँगन पले। संघर्षों की धूल भले ही राहों में बिखर जाए, धैर्य की फसल उगे तो भाग्य के द्वार खुले। मन की नम मिट्टी में रिश्तों के फूल खिलें, ममता की सरिता बहे, प्रेम के मोती मिलें। अंतर की करुणा जब बन जाए हरियाली, सूखे से जीवन में फिर सावन झूमे खिलें। मन की नम मिट्टी में संस्कारों की जड़ हो, सत्य की धूप मिले, मर्यादा का अंकुर हो। लोभ की आँधी आए तो भी न डिग पाए, नीति का वटवृक्ष बने, आदर्शों का स्वर हो। मन की नम मिट्टी में ईश्वर का नाम पले, भक्ति का अंकुर फूटे, आत्मा के दीप जले। ...
रामायण सार
कविता

रामायण सार

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** (१) आदर्शों की अयोध्या में जन्मा मर्यादा का उजास, राम बने धर्म-दीप, जिनसे जग ने सीखा विश्वास। राजा दशरथ की वाणी, वचन बना पथ का शूल, त्याग की कसौटी पर चढ़ा, राजसिंहासन का मूल। (२) वन-पथ पर संग सीता, लक्ष्मण बने छाया-सार, कांटों में भी खिला कुसुम, प्रेम रहा आधार। शबरी के बेरों में मिला भक्ति का निर्मल स्वाद, साधारण हृदय में बसता, ईश्वर का संवाद। (३) अहंकार के रथ पर चढ़ा, लंका का वह अभिमान, सीता-हरण से काँप उठा, मानव-मूल्य विधान। अशोक-वाटिका में धैर्य, दीपक-सा जलता रहा, नारी-सम्मान का शिखर, इतिहास लिखता रहा। (४) हनुमान बने सेतु-स्वप्न, शक्ति का संयम रूप, वानर-सेना ने बाँधा, आशा का दृढ़ अनूप। राम-रावण संग्राम में, नीति ने पाई जीत, अधर्म ढहा, धर्म उठा, सत्य हुआ प्रतिष्ठित। (५) अयोध्या लौटा उजियारा, दीपों...
कोई पूछे तो धन्यवाद ना पूछे तो प्रसाद
कविता

कोई पूछे तो धन्यवाद ना पूछे तो प्रसाद

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** कोई पूछे तो धन्यवाद, ना पूछे तो समझो प्रसाद, सेवा का सच्चा सुख मिले, बस इतना ही है इराद। मनुष्य जिए अपने लिए, स्वस्थ रहे, सुखी रहे, दिखावे की चादर ओढ़े क्यों, सच मन में ही रुके रहे। सेवा यदि की निस्वार्थ भाव से, फल उसका तुम पाओगे, तालियाँ चाहे कम मिलें, भीतर दीप जलाओगे। प्रशंसा की प्यास छोड़ दो, कर्म को ही साथी मान, जो बोओगे वही उगेगा, यही है जीवन का विधान। जो करते हो स्वयं के सुख को, वही सच्चा उत्सव है, बिना दिखावे का जीवन ही, सबसे बड़ा अनुभव है। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेर...
एक सिक्के के दो पहलू समस्या और समाधान
कविता

एक सिक्के के दो पहलू समस्या और समाधान

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** जीवन एक सिक्का है, दो पहलू संग लाता है, एक तरफ़ समस्या खड़ी, दूजा राह दिखाता है। छाया संग धूप चले, यह जग का है विधान, दुख की काली रात में ही, जागे सुख की पहचान। काँटों से घबराए जो, फूलों तक ना पहुँच पाए, जो ठोकर को समझे पाठ, वही मंज़िल को अपनाए। हर उलझन एक पहेली है, जो हल माँगती जाती, धैर्य अगर साथी बन जाए, राह स्वयं बन जाती। समस्या जब सिर उठाए, मन थोड़ा घबराता है, समाधान वहीं छुपा होता, जहाँ डर सताता है। आंधी से जो टकराएगा, वही दीप बन पाएगा, हिम्मत की लौ जलाकर ही, अंधियारा हट पाएगा। शिकायत से कुछ न मिले, बस मन बोझिल होता है, प्रयासों की चाबी से ही, हर ताला फिर खुलता है। ठहराव नहीं जीवन में, संघर्ष ही पहचान, गिरकर फिर से उठ जाना, यही असली सम्मान। सिक्का जब तक चलता है, कीमत वही बताता, रुक जाए जो ...
हिंदी आत्मा में बस्ती
कविता

हिंदी आत्मा में बस्ती

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** हिंदी आत्मा में बस्ती है, संस्कारों की उजली हस्ती है। माँ की लोरी, पिता का विश्वास, मिट्टी की सोंधी खुशबू-सी पास हर धड़कन में इसकी मस्ती है। यह भाषा केवल शब्द नहीं, यह भावों की निर्मल सरिता है। आँसू बनकर भी चुपके बहती, मुस्कान बन ओठों पर ठहरती हिंदी जीवन की स्वर गीत है। तुलसी की चौपाइयों में धर्म, मीरा के पदों में प्रेम पुकारे। रसखान की भक्ति में डूबी हुई, कबीर की वाणी में सत्य जली हिंदी युग-युग तक पथ रहे भली। यह खेतों की हरियाली बोले, यह श्रमिक के पसीने की गंध। यह पर्वों की थाली सजाए, यह त्याग, तपस्या का संदेश जन-जन की आशा की है कंध। जब तक आत्मा में प्राण बसे, हिंदी का दीप जलता रहेगा। समय बदले, दुनिया बदले, पर संस्कृति का यह अमिट स्वर हृदय-हृदय में पलता रहेगा। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म ...
निस्तब्धता
कविता

निस्तब्धता

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** निस्तब्धता जब बोल न पाए, मन भीतर से टूट जाता है, शब्दों के अभाव में पीड़ा का शोर और गूंज जाता है। खामोशी की चादर ओढ़े, दर्द अकेला सोता है, भीड़ में रहकर भी इंसान खुद से ही रोता है। निस्तब्ध क्षणों में स्मृतियाँ तीखे तीर चलाती हैं, अनकहे सवाल बनकर रातों की नींद चुराती हैं। जहाँ संवाद थम जाए, वहाँ संबंध दम तोड़ते हैं, निस्तब्धता में ही कई अपने पराए हो जाते हैं। खामोशी का बोझ कभी-कभी शब्दों से भारी है, यह भीतर-भीतर जलाती है, पीड़ा इसकी न्यारी है। निस्तब्धता में मन खुद से ही लड़ जाता है, हर मौन क्षण एक नया घाव दे जाता है। बिना आवाज़ की पीड़ा भी गहरी चोट लगाती है, निस्तब्धता अक्सर आत्मा को चुपचाप रुलाती है। जब भावों को मार्ग न मिले, वे आँसू बन बहते हैं, निस्तब्धता में ही कई सपने दम तोड़ते रहते हैं। खा...
बसंत पंचमी
कविता

बसंत पंचमी

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** पीताम्बर ओढ़े धरा आज मुस्काई है, आँगन-आँगन में बसंत की छवि छाई है। कोपलों की हँसी, पत्तों की हरियाली, ऋतुओं की रानी बन आई खुशहाली। वीणा की झंकार में सरस्वती आईं, ज्ञान, कला, वाणी को संग लाईं। अक्षर-अक्षर में दीपक सा उजियारा, अज्ञान तमस से जग को उबारा। सरसों के खेतों में सोना लहराए, भौंरे, तितलियाँ राग नए गुनगुनाएँ। मंद पवन की चंचल-सी तान, जीवन में भर दे नव आशा, नव प्राण। मन के आकाश में रंग घुले पीले, स्वप्न नए हों, संकल्प हों नुकीले। सृजन की धारा बहे अविराम, हर हृदय गाए बसंत का गान। बसंत पंचमी, नव आरंभ की बेला, श्रद्धा, सौंदर्य का मधुर मेला। ज्ञान-पथ पर बढ़ें, लेकर उजास, जीवन बने सुरभित, सार्थक, उल्लास। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य...
सात अधोलोक
कविता

सात अधोलोक

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** हिंदू पुराणोंके अनुसार कुल मिलाकर सात अधोलोक हैं अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल। अतल की गहराइयों में इच्छाओं का वास है, जहाँ माया मुस्काती है, भोगों का प्रकाश है। वहाँ सत्य भी छल बन जाए, ऐसा उसका जाल, मनुष्य अपने ही मन में खो दे विवेक का हाल। वितल में वैभव रहता, स्वर्ण समान चमकता, लोभ की चकाचौंध में हर विवेक है भटकता। धन ही देव बन बैठा, कर्म हुआ है मौन, जहाँ सुख क्षणिक लगते हैं, शांति रहती कौन? सुतल वह तल है जहाँ बलि का शासन गाया, अहंकार को त्याग जहाँ विष्णु ने सिखलाया। दमन नहीं, मर्यादा है वहाँ का विधान, त्याग से ऊँचा होता है सच्चा इंसान। तलातल और महातल, भय और विष के धाम, असुरों की आकांक्षाएँ, अंधकार का नाम। क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष यहाँ साँसों में पलते, मानव मन के राक्षस भी यहीं आकर ढलते। ...
माता अहिल्या
कविता

माता अहिल्या

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** माता देवी अहिल्या मालव प्रांत की महारानी, न्याय की प्रतिमूर्ति और जीवनदायिनी प्रशासनिक मामलों में रुचि दिखाई और इतिहास में जगमगाई देवी अहिल्या ने युद्ध का नेतृत्व किया, वे साहसी योद्धा थी और तीरंदाज भी। हाथी की पीठ पर चढ़कर लड़ती थी, और प्रजा राज्य को सुरक्षित रखती थी रानी ने पवित्र महेश्वर में अहिल्या महल बनवाया, पवित्र नर्मदा के किनारे डेरा जमाया एक बुद्धिमान तीक्ष्ण सोच की शासक थी, जो प्रजा के हृदय में जीती थी इंदौर को समृद्ध बनाने में अहम भूमिका निभाई न्याय की प्रतिमूर्ति बनकर सामने आई शत शत कोटि प्रणाम ऐसी माता को धन्य है ऐसी इंदौर की धाता को परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल...