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महासंत रविदास

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे
मंडला, (मध्य प्रदेश)
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महासंत रविदास जी, मानवता के सार।
फैलाकर के जो गए, एक नया उजियार।।

महासंत रविदास जी, थे समता के रूप।
अपने युग को दे गए, जो सूरज की धूप।।

हरिपूजा की श्रेष्ठता, धारण करके खूब।
रीति-नीति की दे गए, हमको पावन दूब।।

महासंत रविदास जी, गाकर के मृदुगीत।
बने मनुज की चेतना, के सच्चे मनमीत।।

महासंत रविदास जी, कहते थे जयराम।
सत्य, कर्म का रच गए, एक नवल आयाम।।

महासंत निश्छल रहे, करनी रही विशिष्ट।
जीवन सादा, निष्कलुष, सच्चाई थी इष्ट।।

दूर रहो हर ढोंग से, दिया हमें संदेश।
महासंत ने थे हरे, सबके सब ही क्लेश।।

महासंत रविदास जी, थे सच्चे युगबोध।
उनकी मानवता बनी, हर युग को नव शोध।।

परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे
जन्म : २५-०९-१९६१
निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश)
शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास)
सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय
प्रकाशित रचनाएं व गतिविधियां : पांच हज़ार से अधिक फुचकर रचनाएं प्रकाशित
प्रसारण : रेडियो, भोपाल दूरदर्शन, ज़ी-स्माइल, ज़ी टी.वी., स्टार टी.वी., ई.टी.वी., सब-टी.वी., साधना चैनल से प्रसारण।
संपादन : ९ कृतियों व ८ पत्रिकाओं/विशेषांकों का सम्पादन। एम.ए.इतिहास की पुस्तकों का लेखन
सम्मान/अलंकरण/ प्रशस्ति पत्र : देश के लगभग सभी राज्यों में ७०० से अधिक सारस्वत सम्मान/ अवार्ड/ अभिनंदन। म.प्र.साहित्य अकादमी का अखिल भारतीय माखनलाल चतुर्वेदी अवार्ड (५१०००/ रु.)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।

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