
प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे
मंडला, (मध्य प्रदेश)
********************
मुलाकात तुझसे हुई, मुझको दिन याद।
तेरे मिलने ने किया, मुझे सदा आबाद।।
करो इरादा प्रेम का, तो मिलता है मीत।
जिससे अधरों पर सजे, खुशहाली का गीत।।
वादा करना सोचकर, फिर मत देना तोड़।
जिसको अपनाना उसे, देना कभी न छोड़।।
करो अगर इकरार तुम, फिर मत कर इनकार।
यही प्रेम की चेतना, यही प्रेम-आधार।।
सोच-समझ ही दो सदा, दिल का तो प्रस्ताव।
बात तभी जब अंत तक, रहे प्रेम का ताव।।
बंधन हो मजबूत जब, तभी बढ़ेगी शान।
करना नित ही प्रेम का, दिल से सब सम्मान।।
आया है देखो ‘शरद’, निकट आज मधुमास।
हर दिल में तो पर रहा आज प्रखर विश्वास।।
अंधकार को मारकर, देता जो उजियार।
कहता है सारा जगत, उसको ही तो प्यार।।
प्रेम ईश का रूप है, लगता है दिनमान।
जो भावों की श्रेष्ठता, शुभ-मंगल का गान।।
रखो हृदय को निष्कलुष, करो सदा निर्वाह।
तभी प्रेम की चेतना, पाती चोखी राह।।
जन्म : २५-०९-१९६१
निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश)
शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास)
सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय
प्रकाशित रचनाएं व गतिविधियां : पांच हज़ार से अधिक फुचकर रचनाएं प्रकाशित
प्रसारण : रेडियो, भोपाल दूरदर्शन, ज़ी-स्माइल, ज़ी टी.वी., स्टार टी.वी., ई.टी.वी., सब-टी.वी., साधना चैनल से प्रसारण।
संपादन : ९ कृतियों व ८ पत्रिकाओं/विशेषांकों का सम्पादन। एम.ए.इतिहास की पुस्तकों का लेखन
सम्मान/अलंकरण/ प्रशस्ति पत्र : देश के लगभग सभी राज्यों में ७०० से अधिक सारस्वत सम्मान/ अवार्ड/ अभिनंदन। म.प्र.साहित्य अकादमी का अखिल भारतीय माखनलाल चतुर्वेदी अवार्ड (५१०००/ रु.)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।









