
डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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बधाई हो… शर्मा जी आख़िरकार अंकल बन ही गए। मोहल्ले में आज यही बड़ी खबर है। कल ही गली में खेलती एक बच्ची ने मुस्कराकर उन्हें पुकारा “अंकल!” और शर्मा जी के जीवन में उम्र का यह प्रमोशन स्थायी रूप से दर्ज हो गया।
यह बात जैसे ही उनकी पत्नी तक पहुँची, वह हँसते-हँसते दोहरी हो गईं। बोलीं- “मैं तो कब से कह रही हूँ कि आपकी उम्र ‘भैया’ वाली नहीं रही, पर आप ही मानते नहीं।” शर्मा जी ने दर्पण में खुद को देखने की कोशिश की वही रंगी हुई मूँछें, गहरे श्याम रंग की डाई से रंजित बालों की अंतिम बस्ती खुले दालान के किनारे बसी हुई। मगर सच्चाई यह कि जवानी के रंग-रोगन का असर अब शरीर की दीवारों पर नहीं टिकता। समय अपने हस्ताक्षर छोड़ ही देता है।
उन्होंने जवानी को बचाए रखने के क्या-क्या जतन नहीं किए विदेशी डाई, घरेलू नुस्खे, कालिख से लेकर ‘कलर-रिटच’ तक। सिर पर इतने प्रयोग हुए कि कभी-कभी रंग बालों से ज्यादा उनके चेहरे पर दिखने लगता था। पर आश्चर्य यह काले किए बाल और भी तेजी से सफेद होकर लौट आते। इतनी शीघ्रता से तो काला धन भी सफ़ेद नहीं होता ल सफेद बाल तो बस संकेत हैं; समस्या सफेदपन से नहीं, उसे स्वीकार न कर पाने से है। सफेदी उजाला भी है, ईमान भी, साफ़गोई भी इसलिए शायद लोग उससे डरते हैं। और शर्मा जी? सफेद बाल देखते ही ऐसे उखाड़ते हैं जैसे किसी प्रमाण को मिटा देना चाहते हों। पर उम्र की पकड़ बालों से नहीं, मन से ढीली पड़ती है और यह पकड़ छूट चुकी है।
उधर मोहल्ले के बच्चे भी अपनी घोषणा कर चुके थे “अंकल, आपकी सफेदी दिख रही है।” उनकी यह मासूम टिप्पणी किसी मेडिकल रिपोर्ट से ज्यादा सटीक थी। शर्मा जी को लगा जैसे उम्र की अदालत से समन आ गया हो। अब बेचारे तरह-तरह के जड़ी-बूटियों, चूर्णों, शिलाजीतों और वैद्यों के द्वार पर भटक रहे हैं। जवानी में कभी स्वास्थ्य का खयाल नहीं किया, पर अब हर विज्ञापन उन्हें आशा की आख़िरी किरण लगता है। रोज
पूछते “भाई साहब, विदेशों में जो रिसर्च चल रही है, उससे कोई दवा निकली क्या?” मैंने समझाया “बुढ़ापा बीमारी नहीं है, अवस्था है। सरकार ने पेंशन से लेकर लाफ्टर क्लब तक कई सुविधाएँ दी हैं उन्हें अपनाइए।” पर शर्मा जी हैं कि विश्वास ही नहीं करते। मानो एक दिन बुढ़ापा थककर खुद ही बाहर चला जाएगा और वह फिर से बीस बरस के हो उठेंगे।
जीवन में आदमी हर चीज़ चाहता है पद, पैसा, प्रतिष्ठा बस बुढ़ापा नहीं। पर यह मेहमान बिना बुलाए आता है और आकर डेरा जमा लेता है। शर्मा जी का घर अब इसी मेहमान का स्थायी पता बन चुका है। उधर मोहल्ले वालों की अपनी योजनाएँ हैं। बीमा एजेंट, जो जवानी में उन्हें ‘जल्दी मरने के फायदे’ गिनाकर पॉलिसी कराने को कहते थे, अब “सिल्वर बेनिफिट प्लान” लेकर घर पर हाज़िर हैं। बाल उगाने वाला सेल्समैन भी उनके उजड़े हुए ‘चमन’ की हरियाली लौटाने के सपने बेच रहा है “अंकल जी, आख़िरी मौका है!”
पैथोलॉजी लैब वाले ‘जेरियाट्रिक हेल्थ पैकेज’ के साथ दरवाज़ा खटखटा रहे हैं। मोहल्ले की महिलाएँ, जो खुद को आंटी कहलाने से अभी बचाए हुए थीं, इस घोषणा से राहत में हैं अब शर्मा जी का खिताब बदल गया, तो रास्ता भी सुरक्षित लगता है। कहते हैं, दिल जवान रहता है पर शर्मा जी का दिल कब का ‘घुटने’ में उतर चुका है। शरीर के सभी जोड़ अब मिलकर प्रतिदिन शिकायत-पत्र दर्ज करते हैं कभी चरमराहट, कभी दर्द, कभी करवट लेते ही ध्वनि-प्रभाव। लगता है जैसे पूरा शरीर ‘सीनियर सिटीजन क्लब’ की वार्षिक बैठक कर रहा हो। रिश्तेदार अब सलाहें दे रहे हैं “बेटा-बेटियों के रिश्ते देखो, उम्र हो चली है।” पर शर्मा जी का भरोसा तो अभी भी उम्र पर नहीं, इलाज पर है। और इलाज भी वह जो अभी तक दुनिया ने खोजा ही नहीं। फिर भी, मोहल्ला आज शर्मा जी की नयी पहचान का जश्न मना रहा है। सबके बीच अनौपचारिक घोषणा हो
चुकी है
“शर्मा जी अब ऑफ़िशियली अंकल बन गए हैं।” और शर्मा जी? एक हल्की-सी मुस्कान, थोड़ी-सी खीझ, थोड़ा-सा स्वीकार मानो कह रहे हों “वो सब ठीक है मगर इस दिल का क्या करें ,ससुरा अंकल होने का नाम ही नहीं ले रहा।”
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन) किताबगंज प्रकाशन, गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित
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