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मीराबाई

मीना भट्ट “सिद्धार्थ”
जबलपुर (मध्य प्रदेश)
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रत्नसिंह की थी सुता, मीराबाई नाम।
भोजराज पति नाम था, कृष्ण भक्ति था काम।।

मीरा जब विधवा हुई, थामा गिरधर हाथ।
मीरा माला जप रहीं, जुड़ीं कृष्ण के साथ।।

नैन साँवरे हैं बसे, देखो निश्छल प्रीत।
श्याम दर्श की धुन बनी, ढूँढे कान्हा मीत।।

प्रभु चरणों में नाचती, गाती मधुरिम गीत।
भक्ति बनी पहचान जब, लिया जगत को जीत।

मीरा जोगन श्याम की, तजी लोक की लाज।
सतत उपासक कृष्ण की, भूल गयी सब काज।।

प्रेम डोर मीरा बँधीं, नेह जगत आधार।
मीरा के कान्हा सदा, दिव्य लोक उपहार।।

पति गिरिधर को मानती, मीरा पावन प्रेम।
कृष्ण रंग चुनरी रँगी, भूले सारे नेम।।

इकतारा ले हाथ में, धर जोगन का वेश।
कृष्णमयी मीरा हुई, भूली अपना देश।।

मीरा से अब हो रही ,भक्तिकाल पहचान ।
प्रेम भक्ति को राह दी,सब करते गुणगान।।

गरल सुधा भी है बना, चमत्कार यह देख।
भजो कृष्ण का नाम तो, बदले विधि का लेख।।

प्राण द्वारिका में तजे, मनमोहन का धाम।
परमधाम मीरा गई, जहाँ रहे श्री श्याम।।

परिचय :- मीना भट्ट “सिद्धार्थ”
निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश)
पति : पुरुषोत्तम भट्ट
माता : स्व. सुमित्रा पाठक
पिता : स्व. हरि मोहन पाठक
पुत्र : सौरभ भट्ट
पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट
पौत्री : निहिरा, नैनिका
सम्प्रति : सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (मध्य प्रदेश), लोकायुक्त संभागीय सतर्कता समिति जबलपुर की भूतपूर्व चेयरपर्सन।
प्रकाशित पुस्तक : पंचतंत्र में नारी, काव्यमेध, आहुति, सवैया संग्रह, पंख पसारे पंछी
सम्मान : विक्रमशिला हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा, विद्या सागर और साहित्य संगम संस्थान दिल्ली द्वारा, विद्या वाचस्पति की मानद उपाधि, गुंजन कला सदन द्वारा, महिला रत्न अलंकरण, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “उत्कृष्ट न्यायसेवा अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित तथा कई अन्य साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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