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सत्रहवां संस्कार

डॉ. प्रताप मोहन “भारतीय”
ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी
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 सोलह संस्कारों का वर्णन हमारे वेदों में वर्णित है। जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य के जीवन में सोलह संस्कार किए जाते हैं। आप सोच रहे होंगे, ये सत्रहवां संस्कार कहाँ से आ गया, जिसको आज तक आपने सुना या देखा नहीं। “आवश्यकता अविष्कार की जननी है।” जो भी परम्पराएं समाज में स्थापित होती है, वो वक़्त और समाज की जरूरत के हिसाब से तय होती है।
वर्तमान में छात्र डॉक्टरी की पढ़ाई करते हैं। उसके लिए उन्हें मनुष्य के मृत शरीर अर्थात देह की आवश्यकता होती है, जिसके बिना वे मानव शरीर की बारीकियों का अध्ययन नहीं कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त शोध यानी रिसर्च के लिए भी मानव देह की आवश्यकता पड़ती है। वर्तमान में देश के मेडिकल कालेजों में जितनी देहों की आवश्यकता है, उस अनु‌पात में मिल नहीं पा रही है। मृत्यु के बाद हम अपने धर्म के अनुसार देह को या तो द‌फन करते हैं या अग्नि संस्कार करते हैं। यह संस्कार आदिकाल से चला आ रहा है।
वर्तमान में समय की आवश्यकता को देखते हुए हमें अपनी सोच में परिर्वतन लाना जरूरी है। तभी समाज का कुछ भला हो पाएगा। हम मृत्यु के बाद शरीर का अंतिम संस्कार न करवाकर अपनी देह का दान करें, जिससे मेडिकल शोध एवं डॉक्टरी पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों को सहुलियत हो। देहदान आपके निकटत‌म मेडिकल कालेज में किया जा सकता है। आप जीवित रहते ही देह दान का फार्म भर सकते हैं। और आपकी मृत्यु के बाद आपकी देह को आपके परिवार वाले मेडिकल कालेज में दे आएंगे। जब हमारी प्राकृतिक मृत्यु होती है, तो उस समय हमारी आँखें अन्य किसी व्यक्ति के काम आ सकती है। बाकी सारा शरीर मेडिकल छात्रों के काम आएगा। नेत्र दान से आप मृत्यु के बाद भी इस दुनिया को देख पाएंगे।
वक़्त की आवश्यकता को देखते हुए हमें अपनी देहदान का संकल्प लेना चाहिए, ताकि हम मृत्यु के बाद भी दुनिया देख सकें। सोलह संस्कार तो हमारे जीवन में आज तक होते आए हैं, अब उसमें देहदान को सत्रहवें संस्कार के रूम में शामिल करें। आप स्वयं भी देहदान का संकल्प लें, साथ ही साथ परिवार एवं समाज को इसके लिए प्रेरित करें और समाज में देहदान के प्रति जागृति फैलाएं। मैंने तो अपनी देहदान का संकल्प किया है। बस आपके संकल्प का इंतजार है।

परिचय : डॉ. प्रताप मोहन “भारतीय”
निवासी : चिनार-२ ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी
घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करता हूँ कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलिक है।


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