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अंतर्मन का द्वंद्व

शिवदत्त डोंगरे
पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश)
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सबसे भयंकर युद्ध
सीमाओं पर नहीं लड़े जाते
वे मन के भीतर होते हैं
जहाँ कोई तालियाँ नहीं बजाता।

यहाँ दुश्मन यादें बनकर आता है,
कभी डर बनकर वार करता है
कभी उम्मीद बनकर उठाता है
और कभी तोड़कर छोड़ जाता है।

इस लड़ाई में खून नहीं बहता,
पर सपने रोज़ मरते हैं
चेहरा हँसता रहता है
पर अंदर हजारों चीखें होती हैं।

कभी मन हार मान लेता है
कभी आत्मा उठ खड़ी होती है
हर रात गिरती है
हर सुबह फिर लड़ती है।

यह युद्ध सब लड़ते हैं
पर कोई दिखाता नहीं
क्योंकि कमजोरी बताना
इस दुनिया में अपराध समझा जाता है।

भीतर की लड़ाई इंसान को थका देती है
पर खत्म नहीं करती
जो सह जाता है वही मजबूत बनता है
बाकी टूटकर खामोश हो जाते हैं!

परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक)
पिता : देवदत डोंगरे
जन्म : २० फरवरी
निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है।


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