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कर्मो का फल

पुष्पा खंगारोत
जयपुर (राजस्थान)
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ये वक़्त का फेर कहो या
कर्मो की गाथा क्योंकि,
जब समय है आता
तो ईश्वर भी नही बच पाता।।

ना राजा दशरथ कर्मो के
फल वश बाण चलाता,
ना मंथरा विष की वाणी घोलती
ना केकई राम को
वन का मार्ग दिखाती।।

ना युद्ध में कृष्ण ने छल किया होता
ना माँ गांधारी को क्रोध आता,
ना श्राप वश ईश्वर होने पर भी
मानव मृत्यु का दंश मिलता।।

ना भीष्म से नारी का अपमान होता
ना अंबा ने श्रीखंडी का रूप मांगा होता,
ना अर्जुन ने उनकी ओट ली होती
ना भीष्म को बाणो की शय्या मिलती।।

ना पिता की मृत्यु पर
अस्वथामा ने क्रोध किया होता
ना पांडवो के वंश को
निंद्रा मे चिर निंद्रा देते,
ना ज़ख़मो मे रिस्ते खून के संग
चिरंजीवी होके अकेले वनों मे
भटकने का श्राप मिलता।।

परिचय : पुष्पा खंगारोत
निवासी : जयपुर (राजस्थान)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।


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4 Comments

  • Ravindra Singh Jodha

    अद्भुत! यह कविता सिर्फ पंक्तियां नहीं, बल्कि जीवन का एक बड़ा दर्शन है। भीष्म, अश्वत्थामा और स्वयं कृष्ण के उदाहरण देकर तुमने यह साबित कर दिया कि नियति कितनी बलवान है। लिखते रहो मित्र, बहुत खूब।

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