
अमित राव पवार
देवास (मध्य प्रदेश)
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जब विश्व की अनेक प्राचीन सभ्यताएँ समय के प्रवाह में विलीन हो गईं, तब भी भारत की संस्कृति आज उतनी ही जीवंत, जाग्रत और प्रेरणादायी बनी हुई है। इसका कारण केवल इसका प्राचीन इतिहास या विशाल भूभाग नहीं, बल्कि वह गहरी सांस्कृतिक चेतना है, जिसकी जड़ें मातृत्व, शक्ति और आध्यात्मिक मूल्यों में निहित हैं। भारतीय जीवन-दृष्टि में शक्ति का अर्थ केवल सामर्थ्य नहीं, बल्कि संरक्षण, करुणा, सृजन और संतुलन की वह शक्ति है जो समाज को दिशा देती है। यही कारण है कि भारत में शक्ति की उपासना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दर्शन है- और इसी दर्शन का विराट उत्सव है नवरात्रि।
भारतीय संस्कृति का मूल स्वर यदि किसी एक भाव में व्यक्त किया जाए तो वह है- मातृत्व और शक्ति का सम्मान। यहाँ मातृभूमि को केवल भूमि नहीं माना गया,बल्कि उसे माँ के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है- “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।” अर्थात् माँ और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी बढ़कर है। यह वाक्य भारतीय संस्कृति की उस गहरी भावना को व्यक्त करता है जिसमें मातृत्व और राष्ट्रभाव एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि भारतवासी अपनी भूमि को भारत माता कहकर संबोधित करते हैं और उसकी रक्षा व सम्मान को अपना सर्वोच्च कर्तव्य मानते हैं।
विश्व इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिन सभ्यताओं की नींव केवल सत्ता, वैभव और भौतिक उपलब्धियों पर टिकी थी, वे समय के साथ समाप्त हो गईं। किंतु भारत की सभ्यता आज भी जीवंत है,क्योंकि इसकी जड़ें आध्यात्मिक मूल्यों, नैतिक आदर्शों और सांस्कृतिक परंपराओं में निहित हैं। यहाँ समाज का आधार केवल व्यवस्था या शासन नहीं, बल्कि संस्कार और जीवन-दर्शन रहे हैं। यही कारण है कि हजारों वर्षों के आक्रमणों, संघर्षों और राजनीतिक परिवर्तनों के बावजूद भारत की सांस्कृतिक चेतना अक्षुण्ण बनी रही।
भारत का इतिहास ऐसे असंख्य बलिदानों से भरा पड़ा है जहाँ वीरों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का हँसते-हँसते बलिदान कर दिया। इन बलिदानों के पीछे केवल राष्ट्रभक्ति ही नहीं, बल्कि मातृभूमि के प्रति वही भाव था जो एक पुत्र अपनी माँ के प्रति अनुभव करता है। यही भाव इस राष्ट्र की शक्ति का वास्तविक स्रोत रहा है। इस महान परंपरा के निर्माण और संरक्षण में भारतीय नारी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। भारतीय समाज में स्त्री को केवल परिवार की आधारशिला नहीं माना गया, बल्कि उसे शक्ति, संस्कार और प्रेरणा का स्रोत माना गया है। इतिहास में अनेक ऐसी महान नारियाँ हुई हैं जिन्होंने अपने साहस, त्याग और दूरदर्शिता से राष्ट्र और समाज को नई दिशा दी। मराठा साम्राज्य के संस्थापक श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी माता राजमाता जीजाबाई के संस्कारों की निर्णायक भूमिका रही। उन्होंने बालक शिवाजी के मन में राष्ट्रप्रेम, स्वाभिमान और धर्मरक्षा की भावना का बीजारोपण किया। इसी प्रकार देवी अहिल्याबाई होलकर ने अपने शासनकाल में न्याय, धर्म और लोककल्याण का ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया, जो आज भी सुशासन की प्रेरणा देता है। भारतीय इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई का नाम अदम्य साहस और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने जिस वीरता और आत्मबल का परिचय दिया, वह आज भी भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। इसी प्रकार रानी दुर्गावती ने वीरता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया और सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा और सामाजिक सुधार के माध्यम से समाज में जागरूकता का दीप प्रज्वलित किया। इन सभी उदाहरणों में भारतीय नारी का वह विराट स्वरूप दिखाई देता है जिसमें ममता, करुणा, साहस और संकल्प का अद्भुत समन्वय है।
भारतीय दर्शन में शक्ति को सृष्टि का मूल तत्व माना गया है। शिव और शक्ति के समन्वय से ही सृष्टि की गति संभव मानी गई है। इसी दार्शनिक विचार को जीवंत करने वाला महान पर्व है नवरात्रि। यह केवल देवी की आराधना का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशक्ति के जागरण और जीवन मूल्यों के पुनर्स्मरण का अवसर है।
नवरात्रि के नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। ये स्वरूप केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि मानव जीवन के आदर्श मूल्यों- श्रद्धा, साहस, धैर्य, संयम, करुणा और न्याय- का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। इस प्रकार नवरात्रि हमें यह संदेश देती है कि वास्तविक शक्ति केवल बाहरी सामर्थ्य में नहीं, बल्कि चरित्र,संयम और आत्मबल में निहित होती है।
भारतीय परंपरा में नवरात्रि के साथ ही हिंदू नववर्ष का भी शुभारंभ होता है। देश के विभिन्न भागों में इसे अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में यह पर्व गुड़ी पड़वा के रूप में अत्यंत उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन घरों के बाहर स्थापित की जाने वाली गुड़ी विजय, समृद्धि और नई शुरुआत का प्रतीक मानी जाती है। यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि हर नया आरंभ आशा, विश्वास और सकारात्मकता के साथ होना चाहिए। आज के आधुनिक युग में भी नवरात्रि का यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक है। आज भारतीय नारी शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, राजनीति, खेल और उद्यमिता जैसे अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त कर रही है। वह नई संभावनाओं का निर्माण करते हुए राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। साथ ही वह परिवार और समाज की जिम्मेदारियों का संतुलन भी अत्यंत दक्षता के साथ निभा रही है। यही संतुलन उस वास्तविक शक्ति का प्रतीक है जिसकी उपासना भारतीय संस्कृति सदियों से करती आई है। भारत की एक और विशेषता उसकी विविधता में एकता है। विभिन्न भाषाएँ, धर्म, जातियाँ और परंपराएँ होते हुए भी भारत एक सांस्कृतिक सूत्र में बंधा हुआ दिखाई देता है। इसका कारण यह है कि यहाँ की संस्कृति का आधार मातृत्व, सहअस्तित्व और समन्वय का भाव है।
नवरात्रि का यह महापर्व हमें स्मरण कराता है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी संस्कृति, मूल्यों और परंपराओं में निहित होती है। जब समाज अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है, तब वह किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम नवरात्रि के इस आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संदेश को केवल उत्सवों तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। मातृशक्ति के सम्मान, राष्ट्रप्रेम और सामाजिक समरसता के आदर्शों को यदि हम अपने व्यवहार और संस्कारों में उतार सकें, तो यही इस पर्व की वास्तविक सार्थकता होगी। क्योंकि अंततः किसी राष्ट्र की महानता केवल उसकी आर्थिक प्रगति या भौतिक उपलब्धियों से नहीं मापी जाती, बल्कि उसकी संस्कृति, उसके मूल्यों और उसके समाज की चेतना से मापी जाती है। भारत की शक्ति उसकी सेना, संसाधनों या सीमाओं में ही नहीं, बल्कि उसके संस्कारों, उसकी मातृशक्ति और उसकी सनातन सांस्कृतिक चेतना में निहित है। यदि हम इन मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों तक सशक्त रूप में पहुँचा सके, तो निश्चय ही भारत की सांस्कृतिक ज्योति युगों-युगों तक इसी प्रकार उज्ज्वल और अविनाशी बनी रहेगी- और यही नवरात्रि का वास्तविक संदेश भी है।
निवासी : देवास (मध्य प्रदेश)
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