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आज क्यों

मीना भट्ट “सिद्धार्थ”
जबलपुर (मध्य प्रदेश)
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बात पर, आज क्यों, बंधु देखो अड़े।
दुश्मनी, है बढ़ी, प्राण लेने खड़े।।

है चकित, यह धरा, शांत आकाश है।
रो रहे, खग सभी, हो रहा नाश है।।
वीर जो, थे बहुत, पार्थ साथी थके।
मित्र के, सारथी, क्रुद्ध होके रुके।।
स्वार्थ में, क्रूर हो, वीर योद्धा लड़े।

नित्य बम, फेंकते, दुष्ट शैतान हैं।
ताकतें, चीख कर, ले रहीं जान हैं।।
लक्ष्य है जीत का, बंध सब टूटते।
उर चुभे, शूल हैं, बंधु हैं छूटते।।
आज तो, शर्म से, वीर सारे गड़े।

है नियति, यह निठुर, पार्थ भी जानते।
भाग्य में, जो लिखा, वो हुआ मानते।।
धर्म ही, कर्म है, युद्ध पर काल है।
कौरवों, पाँडवों, का बुरा हाल है।।
मर रहे, युद्ध में, आज छोटे बड़े।

शक्ति पर, गर्व है, युद्ध थोपा नया।
नाश है, त्रास दें, मूढ़ भूले दया।।
रोक दो, युद्ध को, श्याम आधार हो।
हो विजय, सत्य की, झूठ की हार हो।।
गिर गये, हैं मुकुट, भ्रात मोती जड़े।

युद्ध की, त्रासदी, भोगते लोग सब।
धैर्य सब, खो दिया, मौत का योग अब।।
संधि की, दूर सब, देख संभावना।
चैन की, लोग बस, कर रहे याचना।।
ये कदम, क्यों भला, युद्ध के हैं पड़े।

यह धरा, तो बनी, देख श्मशान है।
धूल में, है मिला, राष्ट् का मान है।।
युद्ध है, हल नहीं, शांति की बात हो‌।
विश्व को, शांति की, कृष्ण सौगात हो।।
रो रही, है प्रजा, प्रण लिए क्यों कड़े।

परिचय :- मीना भट्ट “सिद्धार्थ”
निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश)
पति : पुरुषोत्तम भट्ट
माता : स्व. सुमित्रा पाठक
पिता : स्व. हरि मोहन पाठक
पुत्र : सौरभ भट्ट
पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट
पौत्री : निहिरा, नैनिका
सम्प्रति : सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (मध्य प्रदेश), लोकायुक्त संभागीय सतर्कता समिति जबलपुर की भूतपूर्व चेयरपर्सन।
प्रकाशित पुस्तक : पंचतंत्र में नारी, काव्यमेध, आहुति, सवैया संग्रह, पंख पसारे पंछी
सम्मान : विक्रमशिला हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा, विद्या सागर और साहित्य संगम संस्थान दिल्ली द्वारा, विद्या वाचस्पति की मानद उपाधि, गुंजन कला सदन द्वारा, महिला रत्न अलंकरण, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “उत्कृष्ट न्यायसेवा अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित तथा कई अन्य साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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