
कमल किशोर नीमा
उज्जैन (मध्य प्रदेश)
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बचपन से अब तक यह हमारी संस्कृति है सुनता आ रहा हूँ किन्तु हमारी संस्कृति क्या है यह आज तक समझ नहीं पाया हूँ। हमारी संस्कृति कोई कला, विज्ञान, वस्तु अथवा क़ानून है जिसके अनुसार हमें चलना चाहिए। संस्कृति के विषय में कोई ग्रन्थ या नियमावली हो तो उसका मुझे ज्ञान नहीं। संस्कृति के विषय मे विभिन्न धर्मों के मठाधीश, स्वयंभू संस्कृति बचाओ रक्षक व हमारे देश के कर्णधार नेताओं के द्वारा समय समय पर चलाए गए आंदोलन और हमारे देश के शुभचिंतक समाचार माध्यमों से पक्ष विपक्ष में कराई जाने वाली बहस के माध्यम से ही संस्कृति बारे में जानकारी प्राप्त होती है ।मैने एक परिचित बुजुर्ग व्यक्ति जो आध्यात्मिक विषय में अधिक रूचि रखते हैं ,उनसे जिज्ञासा वश पूछा संस्कृति क्या है? यदि कोई जानकारी हो तो बताएँ। उनके मतानुसार जो हमारे ऋषि मुनियों व पूर्वजों ने अतीत में हमारे जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए बताया है वही हमारी संस्कृति है, लेकिन बाहरी लोगों के आगमन व उनके साथ टकराव ने हमारी संस्कृति को तार तार कर दिया। आज पर भाषा, पर भाव, पर परिधान, दूसरों का अहित यही हमारा स्वभाव होता जा रहा है। इसलिए हमारी संस्कृति नष्ट हो रही है। मैंने उत्सुकता वश उनसे कहा मुझे कुछ समझ नहीं आया, कृपया विस्तार से बताएँ।
उन्होंने कहा राजा भागीरथी को देखिये उन्होंने जन कल्याण के लिये तपस्या कर माँ गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण करवाया। राजा हरिश्चंद्र महावीर स्वामी, गौतमबुद्ध, गुरु गोविन्द सिंह आदि राजाओं ने अपना राजपाट त्याग कर जन कल्याण के लिए क्या नहीं किया। भगवान राम ने अपने पिता के वचन का सम्मान करते हुए १४ वर्ष वनवास में व्यतीत किया । ऐसे कई उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है। मैंने उनके कथानुसार अतीत मे खोजने का प्रयास किया तो पाया कि रावण जैसे प्रकांड विद्वान ने पर स्त्री का हरण कर अपने सारे कुल को काल के गर्त मे धकेल दिया। माता सीताजी को अपने चरित्र की परीक्षा पृथ्वी मे समाहित हो कर देना पड़ी। द्रोपदी जैसी पतिव्रता स्त्री का शूरवीरों की सभा मे चीरहरण किया गया। राजा महाराजाओं ने अपनी शानो शौकत मे ऐशों आराम के लिए क़िले व महल बनवाये तथा जनता के धन से अपने ख़ज़ाने भरे।
जब मैं वर्तमान की ओर देखता हूँ तो लगता है प्रेम ईश्वर द्वारा प्रदत्त भावनात्मक गुण है जो मनुष्य में आपसी प्रेम, विश्वास और कर्तव्य संसार को गतिमान रखने के लिये आवश्यक है। यदि आपस मे प्रेम नहीं रहेगा तो समाज नहीं रहेगा और समाज के बिना संसार में दुष्परिणाम की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। प्रेम की मधुरता में दिये जाने वाले उपहार, गुलदस्ते एक दूसरे की निकटता को बढ़ाते है। समय समय पर तथा कथित संस्कृति रक्षक वास्तविकता से अनभिज्ञ स्वयं दंडित करने सड़कों पर उतर आते है, उनके अनुसार ऐसे लोगों से हमारी संस्कृति नष्ट होती है। जबकि चलचित्र के माध्यम से जो अंग प्रदर्शन हो रहा है, उससे हमारी संस्कृति का और उत्थान हो रहा है?
एक दिन चहलक़दमी करते हुए सड़क पर जा रहा था। मैंने देखा दो भिक्षा वृत्ति करने वाले एक विदेशी महिला का पीछा कर भीख के लिए परेशान कर रहे थे, मैंने उनको डांटते हुए कहा क्यों हैरान कर रहे हो, तुम्हें शर्म नहीं आती अपनी संस्कृति को लज्जित करवा रहे हो। उसने मुझे कहा साहब हम कोई संस्कृति नहीं जानते, पेट भरने के लिए यही एक काम है।
मैं अपना सा मुँह लिए घर लौटकर सोचता रहा मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये क्या कुछ नहीं कर रहा है। कोई भूखों का पेट भरने के लिये मदिरा बना रहा है, कोई रोज़गार देने के नाम पर बीयर बार और पब चला रहा है। हमारे देश के कर्णधार येन केन प्रकार चुनाव जीत कर धर्म, जाति, आरक्षण, प्रलोभन , भाषा व प्रदेश के बल पर अपनी राजनीति चला रहे है। जिसे पल की ख़बर नहीं अपने व परिवार के लिए जनता के धन से मुफ्त की सुविधाएं प्राप्त कर अपनी सात पुश्तों के लिए धन इकट्ठा कर रहे है। जो दीमक की तरह चाट-चाट कर देश को खोखला कर रहे है।क्या यही संस्कृति है?
परिवर्तन समय का नियम है ।फिर किसी युग पुरुष का अवतरण होगा जो संस्कृति का बोध करवाएगा।
परिचय :- कमल किशोर नीमा
पिता : मोतीलाल जी नीमा
जन्म दिनांक : १४ नवम्बर १९४६
शिक्षा : एम.कॉम, एल.एल.बी.
निवासी : उज्जैन (मध्य प्रदेश)
रुचि : आपकी बचपन में व्यायाम शाला में व्यायाम, क्षिप्रा नदी में तैराकी और शिक्षा अध्ययन के साथ कविता, गीत, नाटक लेखन मंचन आदि में गहन रूचि रही है।
व्यवसाय सेवा : आप सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग. सन् १९६४ से सन् १९७० तक एवं सन् १९७१ से सन् २००६ तक के उद्योग जगत के साथ काम करते रहे। सेवा निवृत्ति के बाद ईश्वर की प्रेरणा से पिछले पांच वर्षों से भगवान का भजन आरंभ हुआ है। वर्तमान में लगभग २० भजन लिखे गए हैं, जिनमें १६ भजन यू ट्यूब पर संगीतकार द्वारा संगीतबद्ध करवा कर प्रसारित किए गए हैं जिन्हें यू ट्यूब सनातनम भक्ति २एम स्टूडियो सर्च कर पृथक किया जा सकता है। अयोध्या में श्री राम मंदिर में श्री राम जी की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर टॉवर चौक पर भजन संध्या के अवसर पर आपके द्वारा लिखित भजनों की प्रस्तुति दी गई।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
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