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हंसती हुई औरत

सुधा गोयल
बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश)
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हंसतीं हुई औरत
अच्छी लगती है
जैसे खिल गये हो गुलमोहर
फैल गई हो सुगंधित बयार
या सूरज की लालिमा
या हंस रहा हो चांद
समेट कर सारी धरती
को अपने आगोश में
असंख्य सितारे नभ
में जगमगा उठे हों
और दीपावली
के दीप सी लौ
अंधेरे को चीरकर
उजास फैलाने आ गई हो।
जब औरत हंसतीं है
हंसते हैं उसके कान के झुमके
मोतियों का कंठहार
मांग का सिंदूर
माथे की बिंदिया
गाल में पड़े गढ़्ढे
आंखों में प्यार के नगमे।
जब औरत हंसतीं है
हंसता है घर आंगन
द्वार और रिश्ते
हंसता है वक्त भी
उन नगमों के लिए
जिन्हें औरत
हंसते हुए छेड़ देती है।
स्तब्ध रह जाती है प्रकृति
उस गुनगुनाहट को सुनकर
इसलिए औरत जब हंसतीं है
धरा गगन भी
गुनगुनाने लगते हैं
तुमने देखा है
हंसतीं औरत को।
हंसतीं हुई औरत
अच्छी लगती है।

परिचय :– सुधा गोयल
निवासी : बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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