
माधवी तारे
लंदन
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उत्तरवाहिनी नर्मदा की परिक्रमा करते हुए मन लहरों की तरह हिलोरें ले रहा था। हर आती जाती लहर के साथ स्मृतियां कौंध रही थी। १९९८ से मैंने पारिवारिक कारणों से जो विदेश यात्राएं शुरू की वह आज भी अनवरत जारी हैं। करीब इतने ही वर्षों से मैं मन में नर्मदा परिक्रमा का सपना लिये हुए थी। लेकिन इतने वर्षों में लंदन, पेरिस, बर्लिन जैसे अनेक मशहूर शहर और देश देखे लेकिन नर्मदा मैया अपने पास बुलाने को तैयार नहीं थी। कभी-कभी मन को निराशा घेर लेती कि शायद यह स्वप्न कभी पूरा नहीं होगा।
कभी यात्रा की तिथियां पता चलने से पहले ही फुल हो जातीं तो कभी किसी और कारण से जा नहीं पाती। इस बार फरवरी में फिर जाने का मौका लगा था लेकिन जब तक मैं हां कह पाती जगहें भर गई थी। फिर मैंने गुरु महाराज से कहा कि अब आप ही मेरा सपना पूरा करने में मेरी मदद कर सकते हो। यह कह कर मैंने महाराज के चरणों में सब सौंप दिया और यात्रा आयोजकों से कहा कि अगर कोई ऐन समय पर मना भी कर दे तो मुझे अवश्य बताएं।
नर्मदा के साथ मुड़ते हुए वो पल भी याद आया जब १९९८ में पहली बार विदेश से लौटने पर विद्यालय में मेरा सत्कार किया गया था। प्रधानध्यापिका मैडम ने मुझे पुष्पमाला पहना कर मेरा स्वागत किया था और स्कूल में भोज का आयोजन भी हुआ। उस समय ब्रिटेन के स्कूलों में जाकर उनके पढ़ाने का तौर-तरीका भी मैंने समझा था और विद्यार्थियों को अंग्रेजी माध्यम में संस्कृत पढ़ाने का मौका भी मुझे प्राप्त हुआ था। तबसे नर्मदा परिक्रमा का सपना लिये मैं जी रही थी। लोग तीन साल नर्मदा परिक्रमा करके आते और मेरा मन दुखी हो जाता कि अभी तक मुझे मौका नहीं मिल रहा है। परिक्रमावासियों को नर्मदा परिक्रमा के दौरान कई चमत्कारिक अनुभव आते जो मुझे यदाकदा सुनने को मिलते थे। मन में फिर परिक्रमण की इच्छा जागृत होती। कई बार नाथ मंदिर की ओर से विद्यालय की ओर से प्रदक्षिणा के आयोजन होते लेकिन किसी न किसी तरह मैं हमेशा रह जाती।
नर्मदा मैया के घर देर है लेकिन अंधेर नहीं … उत्तरवाहिनी नर्मदा की प्रदक्षिणा का मौका आया और संयोग से मेरे चचेरा बेटा बहु साथ हो लिये। मैंने अपने आप को भाग्यशाली मान कर, घर द्वार की फिक्र छोड़ पांच फरवरी को सुबह पांच बजे नर्मदा के आंचल में जाने के लिये तैयार हो गई। बहुप्रतीक्षित दिन सामने था और मन आनंद से भरपूर। भौगोलिक कारणों से पश्चिम की ओर बहने वाली नर्मदा गुजरात के कुछ इलाके में उत्तरवाहिनी हो जाती है, इस क्षेत्र की परिक्रमा का पुण्य भी नर्मदा परिक्रमा जितना ही है। आखिरकार मेरा नर्मदा मैया को नजदीक से देखने और उसकी परिक्रमा का सपना भी पूरा हो गया, क्योंकि-
सुलभ्य देश दुर्लभं महेश धाम गौरवं
पुनर्भवा नरानवै विलोकयन्ती रौरवं
जय नर्मदा मैया
परिचय :- माधवी तारे
वर्तमान निवास : लंदन
मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश)
अध्यक्ष : अंतर्राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच (लन्दन शाखा)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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