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नोहर की बदलती आबोहवा

इंद्रजीत सिहाग “नोहरी”
गोरखाना, नोहर (राजस्थान)
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भूल गए बिहानी का वैभव, भूला वो सम्मान यहाँ,
भगतसिंह के नाम पे सिसक रहा ईमान यहाँ।
परशुराम चौक की गरिमा, अब धुएं में खोई है,
नोहर की ये पावन माटी, आज अकेले रोई है।

वो गोल गटा कुआं जहाँ, जुटती थी टोलियां कभी,
आज वहां सट्टे की लत ने, छीनी सबकी खुशियां सभी।
शिवाजी स्टैंड की चौखट पर, कैसा ये मंजर आया है,
नोहर की गलियों के साये में, डोडों का व्यापार समाया है।

न लाज रही बुजुर्गों की, न खौफ रहा अब शासन का,
हर नुक्कड़ पर खेल चल रहा, नशीले उस राशन का।
जहाँ गूंजते थे नारे आज़ादी और क्रांति के,
वहां सौदा हो रहा है आज, समाज की शांति के।

घर की दहलीज लांघ कर, अब नारी भी कदम बढ़ाती है,
चंद रुपयों की खातिर वो, ज़हर घरों तक लाती है।
मैली हवा में हाथ धोना, अब दस्तूर बन गया,
जो शहर कभी था हीरा, वो आज नासूर बन गया।

उठो नोहर के रखवालों, अब अपनी सुध तो लो तुम,
नशे की इन जंजीरों को, हिम्मत से अब तोड़ो तुम।
पुरखों की उस विरासत को, मिट्टी में मत मिलने दो,
फिर से उसी सादगी को, नोहर में अब खिलने दो।

परिचय :-  इंद्रजीत सिहाग “नोहरी”
उपनाम : “नोहरी”
पिताजी का नाम : श्री भानीराम सिहाग
माताजी का नाम : कांता देवी
अर्धांगिनी का नाम : माया देवी
जन्म दिनांक : १३/०७/१९९१
सम्प्रति : शिक्षक
शिक्षा : दो बार स्नातकोत्तर, बीएड
निवासी : गोरखाना तहसील नोहर ज़िला- हनुमानगढ़ (राजस्थान)
प्रकाशित रचनाएं : “समरसता के अग्रदूत” साझा काव्य संकलन मुख्य सम्पादक, “सृजन सागर के मोती” साझा काव्य संकलन उपसंपादक, “इंद्र का जाल” प्रकाशन ज़ारी… वर्तमान में विश्व हिंदी सृजन सागर मंच के बतौर अध्यक्ष
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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