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एक भूखा प्यासा मजदूर

ललित शर्मा
खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम)
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कामकाज में चतुर दक्ष
एक भूखा प्यासा मजदूर
निकला उपार्जन की तलाश में,
सुबह से शाम तक घूमता फिरता
रोजगार और काम की तलाश में,

बस खड़ा चौराहे पर
अपने औजार हथियार संग
निरखकर कह रहा अंर्तमन में
भूख से कराहता, बोला खुद से,
भूखे पेट निकला हूँ

मजदूरी करूं, उपार्जन करूँ
बैचैन भूख से हूँ, सिर में चक्कर
फिर भी काम के चक्कर में
विश्राम कैसे करूँ,

काम के तलाश में अडिग खड़ा हूँ,
मिल जाये मेहनत की मजदूरी
बस निकला हूँ भुख मिटा दूं,सबकी
निकला हूँ काम से,घर घर काम करूं
उपार्जन करूँ परिवार का पेट भरूँ

खून पसीना बहाकर,
दिनभर की थकावट में काम करूँ,
भूखे बिलखते पीड़ित बच्चों का
दुःख दर्द बस, दूर करूँ

अचानक मजदूर की, दुर्दशा को देख
स्वार्थी पूछकर, कहने लगा
आधे पैसे ले लो, मजदूरी आधी ले लो
निबटा दो समूचा काम,
भूख तुम्हारी पीड़ा तुम्हारी
मेहनत तुम्हारी मजदूरी तुम्हारी
भला हमारा क्या रिश्ता नाता
नहीं हमारी दोस्ती, रिश्तेदारी

आधे पैसे में मिटाकर दुःख
सोच लो क्या करोगे दिनभर काम ?
बेचारे न उठाया हथियार
निबटाया पसीना बहाकर काम
आधे राशन में, आधी भूख मिटाया
मजदूर बोला, यही वक्त
मजूबरी में मजदूरी
रोज का किस्सा
बेचारा मजूदरी कर
खर्चा घरपरिवार का उठाया

परिचय :- ललित शर्मा
निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम)
संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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